क्या सिर्फ चुनाओं के समय बढ़ती महंगाई पर ध्यान देती है सरकार?

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भारत कई गंभीर समस्याओं से गुजर रहा हैं। खास कर भारतीय अर्थव्यवस्था बेतहाशा महंगाई और आय असमानता का सामना कर रही है। सरकार पहले कीमतों में बेतहाशा वृद्धि करती हैं और फिर चुनाव के समय उसी में से कुछ रुपए घटा कर महंगाई विरोधी का मुखौटा लगा लेती हैं।

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हम सब जानते हैं की कैसे देश में महंगाई बढ़ी है? हर वो जरूरी चीजों के दाम बढ़े हैं, जिन्हे लोग रोज अपने दैनिक जीवन में उपयोग करते हैं।

देश के नागरिक और बढ़ती महंगाई पर सरकार का रवैया क्या है ? वो इस बात पर देखा जा सकता हैं की, जिस सरकार ने पिछले कई सालों से जिस एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि कि, आज उसी वृद्धि का कुछ हिस्सा कम करके खुद को महंगाई विरोधी साबित करने पर तुली हैं।

बताते चले की हाल ही में केंद्र की मोदी सरकार ने घरेलू एलपीजी की कीमतों में दो सौ रुपये की कटौती करने की घोषणा की थी। लेकिन इसके बाद भी एलपीजी सिलेंडर महंगी हैं।

बताते चले की इसी भाजपा सरकार के कार्यकाल में मार्च, दो हजार बाईस में भारत में क्रय शक्ति समानता के आधार पर एलपीजी की कीमतें दुनिया में सबसे अधिक थीं। जबकि पेट्रोल की कीमतें दुनिया में तीसरी सबसे अधिक और डीजल की कीमतें आठवीं सबसे अधिक थीं।

बताते चले की, भारत एक विकट आर्थिक संकट से गुज़र रहा है। बेरोज़गारी चरम पर है। आंकड़ों पर गौर करे तो अगस्त, दो हजार तेईस में खुदरा मुद्रास्फीति छह दशमलव आठ तीन (6.83) प्रतिशत पर थी।

जबकि रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) का लक्ष्य है की, मुद्रास्फीति को चार प्रतिशत तक सीमित रखा जाए। लेकिन पिछले उनतीस (29) महीनों यानी लगभग ढाई साल में मुद्रास्फीति आरबीआई के चार प्रतिशत के लक्ष्य स्तर से ऊपर रही है।

रिपोर्ट के मुताबिक खाद्य महंगाई जुलाई, दो हजार तेईस में दस फीसदी और अगस्त, दो हजार तेईस में नौ फीसदी पार कर गई थी।

बताते चले की सरकार अक्सर देश की बढ़ती मंहगाई को वैश्विक समस्या बताती है और यह तर्क देती है की महंगाई से विकसित देश भी पीड़ित है। लेकिन अन्य देशों में बढ़ती मंहगाई और भारत जैसे देश में बढ़ती मंगाई का प्रभाव बिलकुल अलग अलग हैं।

अगर किसी विकसित देश में महंगाई बढ़ती हैं तो उन्हें अपने जीवन के मूलभूत आवश्यकताओं से समझोता करना नही पड़ता हैं। जबकि भारत में बढ़ती मंहगाई लोगो के एक वक्त की रोटी छीन लेती हैं।

दो हजार तेईस की शुरुआत के एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि दूध की बढ़ती कीमतों के कारण चालीस प्रतिशत परिवारों ने या तो दूध का सेवन कम कर दिया या इसे पूरी तरह से बंद कर दिया।

रिपोर्ट के मुताबिक, खाद्य पदार्थों का महंगा होना बढ़ते कुपोषण और भूख सूचकांक में देश की खराब स्थिति का कारक बनता है।

वही हाल ही में जब टमाटर की कीमतें सौ रुपये प्रति किलोग्राम पार कर गईं, तो अधिकांश परिवारों ने इसकी खपत में भारी कटौती की थी।

जबकि विकसित देशों में या पश्चिमी उपभोक्ता खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ने से उसकी खपत में कोई कमी नहीं करते हैं। क्योंकि उनकी आय और भारत के लोगो की आय में काफी अंतर देखने को मिलती हैं।

इसलिए किसी भी मापदंड पर भारतीय और पश्चिमी उपभोक्ताओं की तुलना करना बेकार और अपनी नाकामियों को छुपाना हैं।

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