यूपी में हर महीने औसतन दो लोगो की पुलिस एनकाउंटर में मौत।

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उत्तर प्रदेश की सरकार प्रशासन की खामियों, महिला अपराध के खिलाफ दर्ज मामलो और अन्य घटनाओं के कारण आलोचना का कारण बनती हैं। इन सब के अलावा राज्य में पुलिस एनकाउंटर या मुठभेड़ में मारे या घायल हुए लोगो की संख्या काफी अधिक हैं। जिससे सरकार पर लगातार मानवाधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगते आया हैं।

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पिछले कई सालो से उत्तर प्रदेश में घटी घटनाओं से हम राज्य की शासन प्रशासन की कुव्यस्था का अंदाजा लगा सकते हैं।

कई मामलो में राज्य की पुलिस पर कई गंभीर आरोप लगते आए हैं और एक बार फिर सत्ताधारी भाजपा के साथ साथ राज्य की पुलिस भी आलोचनाओं के घेरे में हैं।

आंकड़ों के मुताबिक दो हजार सत्रह में योगी सरकार के सत्ता में आने के बाद से यूपी पुलिस के एनकाउंटर में एक सौ नब्बे लोगों की मौत हुई है।

मार्च दो हजार सत्रह से सितंबर दो हजार तेईस तक यानी मुख्यमंत्री का पद संभालने के बाद से अब तक यूपी पुलिस की कथित मुठभेड़ की घटनाओं में एक सौ नब्बे लोगों की मौत के अलावा ऐसी घटनाओं में पुलिस ने पांच हजार पांच सौ इक्यानवे ( 5,591) लोगों को गोली मारकर घायल किया है।

मार्च दो हजार सत्रह के बाद से पुलिस ने प्रतिदिन औसतन दो दशमलव चार ( 2.4) व्यक्तियों को गोली मारकर घायल किया है। जबकि हर महीने औसतन दो दशमलव चार (2.4) व्यक्तियों की गोली मारकर हत्या की है।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, पुलिस एनकाउंटर में हुई मौतों का यह आंकड़ा अखिलेश की सरकार के समय से चार गुना अधिक है।

आंकड़े देखे तो साल दो हजार सत्रह – अठारह से दो हजार इक्कीस – बाइस की अवधि में ‘पुलिस कार्रवाई’ में कुल एक सौ बाइस व्यक्ति मारे गए थे, जबकि दो हजार बारह से दो हजार सत्रह तक इकतालीस (41) लोगों की जान गई थी।

प्रदेश में लगातार हो रहे एनकाउंटर और सरकार की बुलडोजर नीति की राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लगातार आलोचना होती रही हैं।

जहां सरकार इन मुठभेड़ में हुई हत्याओं और गोलीबारी को अपराध के खिलाफ अपनी नीति बताती रही है वही, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने लगातार इस तरह के कार्यवाई पर सवाल उठाए हैं।

इन मामलो में पुलिस का दावा है कि वे केवल आत्मरक्षा में लोगों पर जवाबी गोलीबारी करती है, हालांकि कई मामलों में अपने दावों पर पुलिस भी सवालों के घेरे में आती दिखी हैं।

लोगो का यह भी आरोप है की, भाजपा सरकार द्वारा कथित अपराधियों के खिलाफ उत्तर प्रदेश गैंगस्टर्स और असामाजिक गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1986 (उन्नीस सौ छियासी ) के प्रावधानों का बेलगाम इस्तेमाल किया गया है।

विपक्षी दल और कई एक्टिविस्ट अक्सर सरकार पर राजनीतिक प्रतिशोध, विरोधियों को डराने और आम नागरिकों को परेशान करने के लिए इस कानून का इस्तेमाल करने का आरोप लगाते रही हैं।

भाजपा सरकार इसे लगातार न केवल माफिया के बतौर नामजद लोगों के खिलाफ बल्कि विपक्षी पार्टी के विधायकों और नेताओं के खिलाफ इस्तेमाल करती आई है।

आंकड़ों के मुताबिक योगी आदित्यनाथ के सत्ता में आने के बाद से प्रशासन ने उन्हत्तर हजार तीन सौ बत्तीस (69,332) लोगों के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट और आठ सौ सतासी (887) लोगों के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी रासुका लगाया है।

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