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बीते उन्नीस फरवरी, दो हजार चौबीस को अपनी विभिन्न मांगो को लेकर मूलनिवासी संघ, जिला इकाई देहरादून ने महामहिम राष्ट्रपति को ज्ञापन भेजा हैं। जिसमे मुख्य रूप से श्रम कानून दो हजार बीस को रद्द करने और ईवीएम को बंद करके बैलेट पेपर से निर्वाचन करने जैसी मांगे शामिल हैं।
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मूलनिवासी संघ, जिला इकाई देहरादून के कार्यकर्ताओं द्वारा बीते उन्नीस फरवरी, दो हजार चौबीस को जिला मजिस्ट्रेट देहरादून के माध्यम से महामहिम राष्ट्रपति जी को ज्ञापन सौंपा गया।
ज्ञापन मुख्यतः श्रम कानून दो हजार बीस को रद्द करने तथा देश में जाति आधारित जनगणना करवाने एवं ईवीएम को बंद करके बैलेट पेपर से निर्वाचन हेतु ज्ञापन दिया गया।
ज्ञापन देने से पूर्व मूलनिवासी संघ के जिला अध्यक्ष मूलनिवासी चंद्रपाल सिंह जी ने उपस्थित साथियों को ज्ञापन के बारे में विस्तार से बताया।
उन्होंने कहा कि, वर्ष उन्नीस सौ बयालीस ईसवी (1942 ई०) से पूर्व भारत में मजदूरों की समस्याएं बहुत अधिक थी। जैसे बाल मजदूरी, बन्धुआ मजदूरी, बारह से अठारह घंटे काम इत्यादि।
मजदूरों की इन समस्याओं को बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने वर्ष उन्नीस सौ बयालीस में श्रम कानून मंत्री रहते हुए भारत में श्रमिकों अर्थात कामगारों के लिए कानून बनाकर खत्म किया था।
उन्होंने बताया की, नये श्रम कानून दो हजार बीस, जिसे पहली जुलाई, दो हजार इक्कीस से लागू किया गया है। यह कानून, मजदूरों के कार्य अवस्था में अनवरत संघर्ष से जो कुछ सुधार हुआ था उसे एकदम पलटने जैसा है।
उन्होंने बताया की, श्रमिकों से आठ घंटे की जगह अब बारह घंटे काम लेकर उनका मानसिक, शारीरिक, और आर्थिक शोषण करने का षड्यंत्र प्रतीत होता है, जहां पहले मजदूरों को अपने अधिकारों का हनन होने पर पंद्रह दिन पहले सूचना देकर धरना या विरोध करने का अधिकार था वहीं अभी सूचना की अवधि को पंद्रह दिन से बढाकर साठ दिन कर दिया गया है और कंपनी को किसी कर्मचारी को हटाने की समय अवधि तीस दिन किया गया है। जिससे कंपनी को धरना या प्रदर्शन से पूर्व ही कर्मचारियों को निकाल सकने का अधिकार देकर कर्मचारियों का आर्थिक और शारीरिक शोषण किया जाएगा ।
मूलनिवासी चंद्रपाल सिंह जी ने कहा की, जहां एक तरफ आज भी प्राइवेट कंपनियां आठ घंटे की जगह बारह घंटे काम लेती है उसे रोकने के बजाय उसे कानूनी रूप से अमली जामा पहनाया गया है।
उन्होंने कहा की, बारह घंटे कार्य अवधि को बढ़ाना लेकिन उसके वेज भुगतान की शर्त ना बताना खुद में ही संदिग्ध है, जो आर्थिक शोषण का इशारा करती है । भारतीय संविधान की प्रस्तावना तथा अनुच्छेद अड़तीस(38), उनतालिस (39) , तियालिस (43) तथा तियालिस ए (43ए) का खुला उल्लंघन है ।
सिंह ने कहा की, एक राष्ट्र तभी मजबूत बन सकता है जब उस राष्ट्र की नीति बनाने वाली संस्थाओं में सभी वर्गों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व हो। देश की पचासी फीसदी आबादी के अधिकार छीनकर कोई राष्ट्र विकास नहीं कर सकता।
उन्होंने कहा की, मुद्दा सिर्फ जाति आधारित जनगणना का नहीं है बल्कि राष्ट्र निर्माण का मुद्दा है और किसी भी राष्ट्र निर्माण के लिए एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में अनुपातिक भागीदारी का होना बहुत जरूरी है।
इन पूर्व अपेक्षाओं के आधार पर आज जाति आधारित जनगणना करना आवश्यक हो गया है । जिसके बिना राष्ट्र निर्माण संभव नहीं है ।
उन्होंने कहा की, जाति आधारित जनगणना का इतिहास अंग्रेजों द्वारा शुरू किया गया था जो उन्नीस सौ इकतीस (1931) में अंतिम जनगणना के साथ बंद हो गया । इस जनगणना के समय पिछड़े वर्गों की जाति आधारित जनगणना की गई थी लेकिन उसके बाद केंद्र में सत्तारूढ़ ब्राह्मणवादी सरकारों ने पिछड़े वर्गों की जाति आधारित जनगणना की अनुमति नहीं दी।
उन्होंने कहा की, जब भी सरकार में ओबीसी के उचित भागीदारी का मुद्दा उठता है तो सरकार, उच्च न्यायपालिका हमेशा उन्नीस सौ इकतालीस (1941) तक का डाटा उपलब्ध नहीं होने का रोना रोती है।
मूलनिवासी चंद्रपाल सिंह ने बताया की, प्रत्येक जनगणना में जाति आधारित जनगणना होती थी। हमारे पास उन्नीस सौ इकतीस (1931) तक के आंकड़े हैं। उन्नीस सौ इकतालीस (1941) में द्वितीय विश्व युद्ध के कारण जनगणना नहीं हो सकी इसलिए जब भी भारत में जातिवा आंकड़े मांगे जाते हैं तो सभी आयोग और संस्थान उन्नीस सौ इकतीस (1931) के आंकड़ों का हवाला देते हैं और जब भी मामला अदालत में जाता है तो न्यायाधीश उनसे नए आंकड़े लाने को कहते हैं।
उन्होंने बताया की, आजादी के बाद उन्नीस सौ इक्यावन (1951) की जनगणना में जाति को शामिल नहीं किया गया था। शायद इसलिए की आजादी के बाद जाति खत्म हो जाए लेकिन जाति नहीं जाती इसलिए जाति बनी रही और जातिवाद भी।
जाति आधारित जनगणना को रोक दिया गया और भारतीय समाज की वास्तविकता को छुपा दिया गया । प्रथम पिछड़ा वर्ग आयोग यानी काका कलेल कर आयोग और दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग मंडल आयोग ने सरकार से जाति के नए आंकड़े मांगे लेकिन सरकारों ने इस सवाल से बचने का काम किया । सरकार को जातिगत जनगणना करानी चाहिए, जिससे सभी वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व मिल सके।
उन्होंने भारत में होने वाली चुनाव को लेकर लोगो से चर्चा किया। उन्होंने कहा की, भारत में लोकतंत्र मजबूत करने के लिए और लोकतंत्र में विश्वास बनाए रखने के लिए सबसे आवश्यक है निष्पक्ष एवं पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया का होना। परन्तु जब से भारत में बैलट पेपर के स्थान पर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन से चुनाव संपन्न होने लगा है तब से विभिन्न राजनीतिक दलों सहित आम जनता में इसके प्रति विश्वास कम होता जा रहा है और अधिकतर नागरिकों का यह मत है कि ईवीएम के साथ छेड़छाड़ हो रही है और जानबूझकर किसी विशेष पार्टी को चुनाव जिताया जा रहा है, इसलिए ईवीएम को बंद कर बैलट पेपर से चुनाव कराया जाए।
बताते चले की ज्ञापन देते समय मूलनिवासी संघ जिला इकाई देहरादून के कई सदस्य व पदाधिकारी उपस्थित रहें। जिसमे जिला प्रभारी मूल निवासी संघ मूलनिवासी गीता सागर जी , जिला उपाध्यक्ष मूलनिवासी मगन सिंह जी, मूलनिवासी शिवचरण जी, जिला महासचिव मूलनिवासी नरेंद्र सिंह गौतम जी, जिला कोषाध्यक्ष मूलनिवासी पलटू राम जी , मूलनिवासी अर्जुन सिंह जी , मूलनिवासी जयपाल सिंह जी, मूलनिवासी रमेश चंद जी, मूलनिवासी शेफाली रानी जी, मूलनिवासी उषा देवी जी , और मूल निवासी बहुजन समाज के सैकड़ो साथी उपस्थित रहे।







