एनआरसी, कॉमन सिविल कोड आदि मुद्दे चुनाव के वक्त क्यों चर्चा में आते हैं?

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अभी मीडिया में एनआरसी, कॉमन सिविल कोड आदि मुद्दों पर भारी चर्चा हो रही है। हाल ही में दिल्ली हाई कोर्ट ने देश में समान नागरिक संहिता की आवश्यकता का समर्थन किया है और केंद्र सरकार से इस मामले में जरूरी कदम उठाने को कहा है।समान नागरिक संहिता पर सुप्रीम कोर्ट ने समय-समय पर अपने विचार रख चुका है।

आपको बता दें कि आनेवाले वर्ष में यूपी, पंजाब समेत राज्यों के चुनाव होने जा रहे हैं। इन चुनावों के पूर्व पुनः यह मुद्दा चर्चा में आया है। ऐसा नहीं है कि कोर्ट में इसी प्रकार के मसलों पर मामले होते हैं। लेकिन मीडिया में चुनाव के पूर्व अक्सर उन मुद्दों पर ज्यादा चर्चा होती है जिससे सामाजिक-धार्मिक ध्रुवीकरण हो।  

आपको बता दें नागरिकों का वर्तमान सरकार के प्रति क्या रूख है इसपर न केवल सत्ता पक्ष बल्कि मीडिया वाले भी पड़ताल कर रहे हैं। जैसे ही चुनाव की प्रक्रिया को दस बारह महिने रह जाते हैं सत्ता पक्ष विभिन्न मुद्दे सामने रखकर नागरिकों की रूख भांपने की कोशिश करते हैं। इसमें अनुच्छेद 340, आयोध्या मंदिर, तीन तलाक, जनसंख्या नियंत्रण आदि मुद्दे उपस्थित किए जाते हैं।  इसी के साथ कॉमन सिविल कोड और एनआरसी जैसे मुद्दे भी इसी समय चर्चा में लाए जाते हैं । खास करके भाजपा की तरफ से इन मुद्दों पर अधिक चर्चा होती है।  

देश के सजग नागरिक यह सवाल उठा रहे हैं कि जब चुनाव सामने होता है तब संविधान के मौलिक अधिकार और नीति निदेशक तत्वों के अनुसार सत्ता पक्ष की जो जिम्मेदारियां होती है उसपर सरकार से हिसाब किताब लिया जाना चाहिए। लेकिन राजनीतिक दल इसपर चर्चा न करते हुए सामाजिक धार्मिक ध्रुवीकरण करने के लिए जनसंख्या नियंत्रण, कॉमन सिविल कोड और एनआरसी जैसे मुद्दे चर्चा में लाते हैं, इससे नागरिक संभ्रम में फंस जाते हैं।

कई सामाजिक संगठनों का कहना है कि ओबीसी की जातिआधारित जनगणना की मांग पिछले कई दशकों से हो रही है लेकिन उसपर राजनीतिक दल कोई बात करते हुए नहीं दिखाई देते। ओबीसी के रिजर्वेशन इन प्रमोशन का मुद्दा, भूमिहीनों को जमीन के पट्टे देने का मुद्दा, निजीकरण का मुद्दा आदि मुद्दों पर चर्चा नहीं होती। किसान संगठनों द्वारा तीन कृषि कानूनों पर उठाए गए मुद्दों पर भी चुनाव में चर्चा होनी चाहिए।  

आपको बता दें, सामाजिक संगठनों का कहना है कि कोरोना की पहली और दूसरी लहर के दौरान केंद्र सरकार की तरफ से जो ढिलाई हुई उससे भी नागरिकों को कई परेशानियां हुई।

आपको बता दें कि एक तरफ सत्तादल और उसका चहेता प्रचार प्रसार माध्यम जनसंख्या नियंत्रण, कॉमन सिविल कोड और एनआरसी जैसे मुद्दों पर चर्चा करना चाहता है और नागरिक संगठन सरकार की संवैधानिक नीतियों पर और नागरिकों की हो रही हकमारी पर चर्चा करना चाहता है। देखना यह है कि लोगों तक कौन कितना तेजी से पहुंचता है।

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