लघु और मध्यम उद्यमों में ओबीसी केवल 29 प्रतिशत।

लघु उद्यम 63 प्रतिशत और 71 प्रतिशत मध्यम उद्यम जनरल वर्गों के हाथों में। लघु उद्यमों में एससी व एसटी 5.5 व 1.65 प्रतिशत। एमएसएमई की रिपोर्ट प्रकाशित।

संविधान लागू होने के 70 वर्षों के बाद भी यह स्थिति क्यों ?

भारत सरकार का एक मंत्रालय है, सूक्ष्म लघु और माध्यम उद्यम मंत्रालय। इस मंत्रालय द्वारा हाल ही में वर्ष 2021-2022 की एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई है। उसके आँकड़े चौकाने वाले हैं। आंकड़े एससी, एसटी, ओबीसी के बारे में हैं। आकडे बताते हैं कि लघु और माध्यम उद्यमों पर गैर ओबीसी, एससी, एसटी का कब्जा है अर्थात जनरल वर्ग के लोगों का कब्जा है। देखिए यह रिपोर्ट।

भारत सरकार अर्थात केंद्र सरकार के बहुचर्चित मंत्रालय MINISTRY OF MICRO, SMALL AND MEDIUM ENTERPRISES जीसे शॉर्ट फॉर्म में एमएसएमई मंत्रालय भी कहा जाता है। इसका वर्ष 2021-2022 का बजट था 15699 करोड़ रुपये। इस मंत्रालय की रिपोर्ट प्रकाशित हुई है। उसे आप भी एमएसएमई की वेबसाइट पर पढ़ सकते हैं। इस रिपोर्ट से आप समझ सकते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था किन लोगों के हाथों में है।

दर असल इस देश की कूल जन संख्या का करीब 85 प्रतिशत हिस्सा ओबीसी, एससी, एसटी का है। इस हिसाब में देश के हर क्षेत्र में उनकी भागीदारी कम से कम जनसंख्या के अनुपात में होनी चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं है।

एमएसएमई के कूल पंजीकृत उद्यमों में केवल 29 प्रतिशत ओबीसी, 7 प्रतिशत एससी और मात्र 2 प्रतिशत एसटी है।

अगर हम माइक्रो, स्मॉल, मीडीअम और सभी क्षेत्रों का परसेंटेज देखते हैं तो पाते हैं कि माइक्रो में ओबीसी का प्रतिशत 49.83 प्रतिशत है, अनुसूचित जाति का 12.48 प्रतिशत है और अनुसचित जनजाति का 4.11 प्रतिशत है। इसमें 39.79 प्रतिशत जनरल का है। सरकारी अधिसूचना 1 जून 2020 के अनुसार सूक्ष उद्यम वह है जिसमें संयंत्र और मशीनरी तथा उपस्कर में एक करोड़ से अधिक का निवेश नहीं होता और पांच करोड़ से अधिक का कारोबार नहीं होता। यहां आपको लगता होगा की ओबीसी का प्रतिशत अधिक है। लेकिन स्मॉल एंड मीडीअम स्केल इंडस्ट्रीज में इसका उलट होते हुए दिखाई देता है।

स्मॉल स्केल स्केल में ओबीसी की हिस्सेदारी 29.64 प्रतिशत है तो एससी की हिस्सेदारी 5.5 प्रतिशत व एसटी की हिस्सेदारी मात्र 1.65 प्रतिशत अर्थात पूरे दो प्रतिशत भी नहीं। समाल स्केल अर्थात लघु उद्यम वह है संयंत्र और मशीनरी तथा उपस्कर में दस करोड़ से अधिक का निवेश नहीं होता और पचास करोड़ से अधिक का कारोबार नहीं होता।

अब नजर डालते हैं मीडीअम स्केल माध्यम क्षेत्र के उद्यमों पर। इसमें ओबीसी की हिस्सेदारी 23.85 प्रतिशत है तो एससी एसटी की हिस्सेदारी 5.35 प्रतिशत मात्र है। इसमें एससी से ज्यादा एसटी का प्रतिशत है। माध्यम उद्यम वह है जहां संयंत्र और मशीनरी तथा उपस्कर में पचास करोड़ से अधिक का निवेश नहीं होता और दो सौ पचास करोड़ से अधिक का कारोबार नहीं होता।

जब हम बड़े उद्योगों की बात करते हैं तो हम यही पाते हैं कि इसमें कुछ ही उद्योग घरानों की मालिकी है। उनके अधीन जितनी भी कंपनियां या इस्टेबलिशमेंट हैं उनमें भी अधिकतर ऊंची जाति के लोग है। ओबीसी, एससी, एसटी के लोग न के बराबर है।

एमएसएमई मंत्रालय की इस रिपोर्ट में और भी कई आँकड़े हैं लेकिन उनमें कई जगह उलझन हैं। जैसे सरकार देश में कूल उद्यमों के जो आंकड़े दे रही है वह 2015-16 के हैं। यह वर्ष 2022 चल रहा है सरकार के पास क्या यह नए आँकड़े नहीं है? सवाल उठता है कि अगर नहीं है तो क्यों नहीं है? अगर हैं तो उसे क्यों सामने नहीं लाया गया।

साथियों भारत का संविधान आर्थिक क्षेत्र में समानता की बात कहता है। संविधान में प्रतिपादित राज्य की नीति के दिशा निदेशक तत्वों के अनुसार सरकार को ओबीसी, एससी, एसटी के आर्थिक हिस्सेदारी की योजना बनानी चाहिए। लेकिन इन आंकड़ों को देखते हैं तो आपको लगता है कि क्या ऐसा हो रहा है? संविधान लागू होने के 70 वर्षों के बाद भी यह स्थिति क्यों है?

एमएसएमई के नामपर सरकार आज भी खादी और ग्रामोद्योग के इर्द गिर्द ही चक्कर काटते दिखती है। केंद्र सरकार कहती है कि एमएसएमई मंत्रालय द्वारा देश भर में स्थापित 18 प्रौद्योगिकी केंद्रों ने वर्ष 2020-21 में 1,33,301 प्रशिक्षुओं को प्रशिक्षण दिया। साथियों इसका मतलब यह कतई नहीं है कि इतने लोगों ने उद्यम शुरू किए या इन्होंने रोजगार पाया। यह केवल प्रशिक्षण के आंकड़े हैं।

इसी प्रकार से हमें एमएसएमई विभिन्न इकाइयों और प्राधिकरणों द्वारा आबंटित धन को भी जाँचने की आवश्यकता है। सरकार आँकड़े साफ है की इस देश की सभी प्रकार के आर्थिक क्षेत्र में ओबीसी, एससी, एसटी का नहीं बल्कि अन्य का कब्जा है।

ओबीसी, एससी, एसटी के कई संगठनों द्वारा सरकार से बार बार मांग की जा रही है कि एससी, एसटी के स्पेशल बजट की तरह ओबीसी का भी सपेरेट बजट का प्रावधान हों। योजनाएं साफ और सटीक हो। जिसे बनाते वक्त सामाजिक संगठनों का भी सहभाग लिया जाएं।

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