==========
भारत एक लोकतांत्रिक देश हैं। लेकिन कुछ वर्षों से भारत में लोकतंत्र के स्तर में गिरावट देखी गई हैं। अंतराष्ट्रीय रिपोर्ट्स भी यही बताती हैं की भारत पिछले कुछ सालों से तानाशाही की ओर बढ़ा हैं। जिसमें भाजपा के हिंदू राष्ट्र एजेंडा और देश में लगातार मानवाधिकारों का हनन शामिल हैं।
==============
क्या भारत तानाशाही की ओर बढ़ रहा हैं? यह सवाल देश के हर वो नागरिक अपने आप से पूछे जो इस बार वोट देने के लिए योग्य हैं।
अगर इस सवाल का जवाब हां आता हैं तो फिर ये सोचिए की इसका जिम्मेदार कौन हैं? बेशक सत्ता में बैठी राजनीतिक पार्टी, लेकिन इस अपराध में कहीं न कहीं हिस्सेदारी आपकी भी हैं, क्योंकि देश की जनता ही वोट देकर सरकार चुनती हैं।
आगामी लोकसभा चुनाव में आपके पास मौका हैं, अपने प्रतिनिधि को चुनने का। तो इस बार बिना गलती किए शिक्षित, सामाजिक और अपराधमुक्त प्रत्याशियों को अपना अपना बहुमूल्य वोट दे।
लेकिन अगर आपको लगता हैं की हमारा देश पहले से काफी अच्छी स्थिति में हैं और देश में अभी भी लोकतंत्र जिंदा हैं, तो आप पूरी तरह सही नहीं हैं। आइए कुछ राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय आंकड़ों पर बात करते हैं और जानने का प्रयास करते हैं की देश में लोकतंत्र का स्तर क्या हैं?
पिछले कुछ सालों से देश में ऐसी कई घटनाएं हुई हैं जिसने देश के लोकतांत्रिक स्तर को गिराने का काम किया हैं। जैसे जांच एजेंसियों का दुरुपयोग कर विपक्ष के नेताओं को जेल में भेजना और उन्हें डराना, जनता से प्रोटेस्ट का अधिकार छीन लेना, इलेक्ट्रोल बॉन्ड्स के जरिए अपनी फंडिंग को छुपाना और इलेक्शन में फ्रॉड करके अपने उम्मीदवार को जिताना।
ऐसे एक या दो नहीं बल्कि कई उदाहरण हैं जो इस बात का संकेत देती हैं की सरकार तानाशाही की ओर बढ़ रही हैं।
कुछ लोगों के मन में सवाल आता होगा की कोई सरकार तभी सत्ता पर बैठती हैं जब देश की जनता चुनती हैं। लेकिन आश्चर्य की बात हैं की, जिस पार्टी के खिलाफ देश के युवा, सरकारी कर्मचारी, सेवानिवृत कर्मचारी, महिलाएं, विभिन्न सामाजिक संगठनों के सदस्य हो वो पार्टी लोकसभा चुनाव में चार सौ सीट पार करने का दावा कैसे कर सकती हैं?
इसका सबसे बड़ा कारण हैं, चुनाव आयोग पर पूर्ण नियंत्रण और देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव न होना।
निर्वाचन आयोग देश में चुनाव करवाती हैं। लेकिन पिछले कुछ सालों से भारतीय निर्वाचन आयोग भी कई आरोपों के घेरे में रहीं हैं।
वर्तमान समय में संपूर्ण भारत में ईवीएम यानी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन से चुनाव कराए जाते हैं। जिसकी विश्वसनीयता पर भी कई बार सवाल उठाए जा चुके हैं।
साल दो हजार इक्कीस में असम से यह खबर आई की भाजपा नेता के गाड़ी से ईवीएम मशीन मिला। जिसके बाद चुनाव आयोग को दोबारा चुनाव कराना पड़ा।
हाल ही में फरवरी दो हजार चौबीस में पुणे से यह खबर आई की, कुछ अज्ञात लोगो ने ईवीएम की कंट्रोल यूनिट ही चुरा ली। जबकि हाल ही में चंडीगढ़ के मेयर चुनाव में निर्वाचन अधिकारी ने वोटो की हेरफेर कर भाजपा को जीत दिला दी। जो सीसीटीवी फुटेज में रिकॉर्ड हो गई।
जिसके बाद इस मामले में सुप्रीम कोर्ट को सामने आना पड़ा और फैसला सुनाते हुए चीफ जस्टिस ने इसे मर्डर ऑफ डेमोक्रेसी यानी लोकतंत्र की हत्या बताया।
ये वो मामले हैं जो पकड़े गए। न जाने ऐसे कई मामले हम और आप तक पहुंचे ही न हो।
क्या इसके बाद भी आपको लगता हैं की देश में जो इलेक्शन हो रहे हैं वो स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से हो रही हैं?
निर्वाचन आयोग को देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की जिम्मेदारी हैं। लेकिन इन घटनाओं से निर्वाचन आयोग की स्थिति का पता चलता हैं की कैसे यह संस्था सरकार की कटपुतली की तरह काम कर रहीं हैं।
इन घटनाओं के कारण अंतराष्ट्रीय स्तर में भी देश की स्थित काफी चिंताजनक हैं।
साल दो हजार बाईस में जारी की गई वी-डेम यानी वेराइटीज ऑफ डेमोक्रेसी संस्थान की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत विश्व के उन शीर्ष दस देशों में शुमार है जहां निरंकुश राज्यसत्ता का शासन है।
रिपोर्ट में कहा गया था कि, दो हजार चौदह में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा के जीतने के बाद से भारत में लोकतंत्र के स्तर में गिरावट आई है।
इससे पिछले साल यानी साल दो हजार इक्कीस की रिपोर्ट में भी भारत को चुनावी तानाशाही वाले देश के रूप में वर्गीकृत किया गया था, साथ ही हालात और अधिक बिगड़ने का अनुमान भी लगाया गया था।
रिपोर्ट का दावा हैं कि, पिछले दशक में अफगानिस्तान, बांग्लादेश, कंबोडिया, हांगकांग, थाईलैंड और फिलीपींस के साथ भारत में तानाशाही रवैये की स्थिति बदतर हुई है।
रिपोर्ट बताती हैं की, तानाशाही के मामले में शीर्ष देशों में से कम से कम छह देशों में बहुलतावाद का विरोध करने वाले दल शासन चला रहे हैं। ये छह देश, ब्राजील, हंगरी, भारत, पोलेंड, सार्बिया और तुर्की हैं।
रिपोर्ट में कहा गया था की इन देशों में सत्ताधारी पार्टी और उनके नेताओं में अल्पसंख्यकों के मौलिक अधिकारों के प्रति असम्मान की भावना है। साथ ही राजनीतिक विरोधियों को दबाने को बढ़ावा देते हैं और राजनीतिक हिंसा का समर्थन करते हैं।
ये सत्तारूढ़ दल राष्ट्रवादी-प्रतिक्रियावादी होते हैं और उन्होंने तानाशाही के एजेंडा को आगे बढ़ाने के लिए सरकारी शक्तियों का इस्तेमाल किया है।








