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महिला सशक्तिकरण का एक मात्र रास्ता भारत का संविधान ?
महिलाओं के प्रति मनुस्मृति की सोच।
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आज 03 जनवरी के दिन ही भारत की प्रथम प्रधानाध्यापिका माता सावित्री बाई फुले का जन्म हुआ था। राष्ट्रीयपिता ज्योतिबा फुले और माता सावित्री बाई फुले ने सबसे पहले इस देश मे लड़कियों को शिक्षित करने का काम किया। लेकिन वही दूसरी तरफ मनुस्मृति ने महिलाओं की तुलना जानवरो से की हैं।
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महिलाओं के बिना इस सृष्टि की कल्पना नहीं की जा सकती है ! लेकिन फिर भी इस मनुवादी व्यवस्था ने इस देश की महिलाओ के साथ जानवरो जैसा सुलूक किया ! ठीक वैसे, जैसे इस जैस के मूलनिवासियो के साथ किया !
असमानता और अन्याय के प्रतिक मनुस्मृति ने देश की आधी आबादी को सिर्फ अपनी जरुरत के अनुसार इस्तेमाल किया है ! महिलाओं के लिए मनुस्मृति ने क्या कहा है? जरा गौर कीजियेगा!
मनुस्मृति के तीसरे अध्याय में लिखा गया है की , “जब ब्राह्मण भोजन करे तब उन्हें किसी सूअर, मुर्गे , या फिर कुत्ते या हिजड़े या ऐसी महिलाये जो रजस्वला हो या महावारी में हो उसको देखना भी नहीं चाहिए !”
शायद ही दुनिया का कोई इंसान होगा जो अपनी माँ के गर्व से न निकला हो ! हम सबकी माएं नौ-नौ महीने गर्व में पालकर हमे इस संसार में जन्म देती है, लेकिन मनुस्मृति ने स्त्रियों की तुलना तो कुत्ते , मुर्गे और सूअर से कर दी है ! क्योंकि इसके अनुसार तो लोग मां के गर्व से नहीं बल्कि माथे, भुजाओं, जंघाओं और पैरों से निकलते हैं।
मनुवादियों ने मूलनिवासियों के साथ साथ इस देश की महिलाओं के साथ भी खूब अत्याचार किया है ! लेकिन जब हम अपने महापुरुषों की बात करते है तो उन्होंने अक्सर महिलाओं के हित के बारे में सोचा है ! चाहे वो राष्ट्रीयपिता ज्योतिबा फुले हो या फिर बाबा साहेब ! चाहे मान्यवर कांशीराम साहब हो या फिर वर्तमान में बामसेफ संगठन।
हमारे महापुरुषों ने हमेसा महिला शसक्तीकरण पर जोर दिया है ! और वे जानते थे की यह सिर्फ और सिर्फ शिक्षा से ही संभव है ! इसीलिए तो राष्ट्रीयपिता ज्योतिबाफुले ने सबसे पहले अपनी पत्नी यानी माता सावित्रीबाई फुले को शिक्षित किया। उन्होंने उस समय महिला शिक्षा पर जोर दिया जब महिलाओ का पर्दे के बहार आना भी पाप माना जाता था ! ज्योतिबा फुले ने सिर्फ माता सावित्रीबाई फुले को पढ़ाया ही नहीं बल्कि लड़कियों के लिए पहला स्कूल भी दोनों ने मिलकर सन 1848 में खुलवाया और इस तरह माता सावित्री बायीं फुले इस देश की प्रथम प्रधानाध्यापिका बनी !
बाबा साहेब भी जानते थे की जिस तरह हजारो सालो से इस देश के अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछडो का शोषण हुवा है ठीक उसी तरह मनुवादी व्यवस्था ने सभी वर्गों की महिलाओं का भी खूब शोषण किया है ! इसी लिए तो उन्होंगे स्त्री और पुरुष में जरा सा भी भेदभाव किये संविधान की रचना की ! यही नहीं महिलाओ को अधिकार दिलाने की ज़िद्द में उन्होने अपने कानून मंत्री के पद का भी त्याग कर दिया था !
हालाँकि बाद में सबको समझ आया की महिलाओं के लिए बाबा साहेब का “हिन्दू कोड बिल” कितना महत्वपूर्ण था। बाद में इसे लागू किया गया, लेकिन तब तक बाबा साहेब हमे छोड़ कर जा चुके थे !
आज इस आधुनिक युग में भी कुछ महिलाये सिर्फ घर के कामकाजो को ही अपनी ज़िम्मेदारी मानती है ! वे आज भी सोचती है की लड़कियों का पढ़ना, बहार जाके नौकरी करना, अपने सपने पूरा करना पाप है । लेकिन शायद वे इस बात से अंजान है की उनको जिन बेड़ियों से मनुस्मृति ने बांध रखा था उन बेड़ियों को संविधान ने 26 जनवरी 1950 में ही खोल कर उन्हें आजाद कर दिया है !
इसीलिए हर वर्ग की महिलाओ को संविधान के बारे में जानना चाहिए ! विशेष कर “हिन्दू कोड बिल” के बारे में पढ़ना चाहिए ! संविधान में उनके हितो के प्रति क्या क्या प्रावधान किये गए है? उसके बारे में पढ़ना चाहिए !
कुल मिलाकर हम यह कह सकते है की, “संवैधानिक शिक्षा से ही महिलाओं का सशक्तिकरण संभव है!”







