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एक तरफ भारत के मुख्य न्यायाधीश वकीलों की ड्रेस कोड को बदलने विचार कर रहे हैं, दूसरी तरफ देशभर हाईकोर्टों में 60 लाख केस पेंडिग है, तीसरी तरफ पुरे देश में जिला स्तर और उससे निचली अदालतों में करीब 4.5 करोड़ मामले लंबित है। अब और एक खबर तेजी से फ़ैल गयी है जिससे हम सभी सोचने पर मजबूर हो जाएंगे। देश के हाईकोर्ट में पिछले पांच वर्षों में 537 जजों की नियुक्ति हुयी उनमें से 79 प्रतिशत अर्थात करीब 424 जज यह ऊँची जाती से ताल्लुख रखते है। जिहां 79 प्रतिशत अर्थात 424 प्रतिशत, यह सरकारी आंकड़ा है।
हाल ही में केंद्र सरकार के कानून मंत्रालय ने सुशिल मोदी की अध्यक्षता वाली कानून और न्याय पर संसदीय स्थायी समिति के सामने एक प्रेसेंटेशन किया। जिसमें जो जानकारी दी गयी है वह वाकई गभीर है।
बिते कुछ दिनों से केंद्र सरकार विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति को लेकर टकराव दिखाई दे रहा है। लेकिन स्वयं बीजेपी सरकार के कार्यकाल के बीतें 5 वर्षों में देश के विभिन्न हाईकोर्ट में जिन 537 जजों की नियुक्ति की गयी है उनमें 424 केवल और केवल जनरल कैटेगरी अर्थात ऊँची जातियों के है। जहाँ तक ओबीसी का सवाल है 537 जजों में से मात्र 57 जज ओबीसी वर्ग से नियुक्त हुए हैं, अल्पसंख्यक वर्ग के 14, वहीँ अनुसूचित जाति से 15 और अनुसूचित जनजाति से 7 जज नियुक्त हुए हैं। साथ ही 20 जजों की सामाजिक पृष्ठभूमि का पता कानून मंत्रालय नहीं लगा सका है।
हालाँकि केंद्र सरकार के कानून मंत्रालय के अनुसार इसकी जिम्मेदारी सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम और हाईकोर्ट कोलेजियम की है। मंत्रालय ने इस संसदीय समिति को बताया की सरकार सुप्रीम कोर्ट कर हाई कोर्ट में केवल उन व्यक्तियों को अपॉइंट करती है जिन्हें उच्चतम न्यायालय के कोलेजियम द्वारा रेकमेंड किये जाते हैं।
केंद्रीय मंत्रालय द्वारा यह भी कहा गया कि न्यायिक नियुक्तियों में आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है इसलिए उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों और भारत के मुख्य न्यायाधीश से सामजिक विविधता सुनिचित करने के लिए हाशिये के समाज से योग्य उम्मीदवारों पर विचार करने का अनुरोध किया गया है.
भले ही केंद्र सरकार यह जिम्मेदारी सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट पर दाल रही होगी लेकिन बीजेपी सरकार ने पिछले 5 वर्षों में जिन नियुक्तियों को मंजूरी दी है उनमें 79 प्रतिशत ऊँची जाती के लोग कैसे है? क्या उन्हें पहली ही सूची में यह समझ में नहीं आया था कि सूचित किये नामों में हाशिये के समाज के उम्मीदवार नहीं है?
आपको बता दें कि इस देश की न्यायिक व्यवस्था पर ओबीसी, एससी, एसटी वर्ग द्वारा कई बार आपत्तियां व्यक्त की है। आरक्षण सम्बंधित कई मामलों में ओबीसी, एससी, एसटी को तकलीफ पहुंचानेवाले निर्णय आये हैं। जिसको लेकर ख़ास करके ओबीसी वर्ग नाराज है।
जिन वर्गों का प्रतिनिधित्व सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में न के बराबर है उनकी जनसंख्या इस देश में 85 फीसदी से ऊपर है और जिनकी जनसंख्या 10 से 15 प्रतिशत है उस वर्ग के लोगों की न्यायिक व्यवस्था में संख्या अधिक है। ऐसे न हो इसलिए कई वर्षों से नेशनल जुडिशल अपॉइंटमेंट कमीशन की मांग हो रही है लेकिन सरकार की तरफ से इस पर कोई एक्शन नहीं ली जा रही है। अगर नेशनल जुडिशल अपॉइंटमेंट कमीशन हो जाता है तो सरकार को जजों की नियुक्तियों में ओबीसी, एससी, एसटी, अल्पसंख्यक और महिलाओं का ध्यान रखना ही होगा।
सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में ऊँची जाती के जजों की संख्या आज ही नहीं बढ़ी है, यह शुरू से है। साथियों जाते जाते आपको यह भी बता दें कि अभी इस प्रकार की भी खबरें आ रही है कि सुप्रीम कोर्ट और कई हाई कोर्ट में पिछले 70 वर्षों से लंबित मामलों की जानकारी बाहर आ रही है। अर्थात ऐसे मामले है जिनको लेकर न्यायालय में पिछले 70 सालों में निर्णय नहीं हुआ है।
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