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बामसेफ के बैनर तले बीते अठारह जून, दो हजार चौबीस से बाईस जून, दो हजार चौबीस (18 जून, 2024 से 22 जून, 2024) तक महिला प्रशिक्षण शिविर का आयोजन नागपुर के रिंगनाबोडी में किया गया। जिसमें विभिन्न राज्यों की महिलाओं ने हिस्सा लिया।
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नागपुर के रिंगनाबोडी में स्थित डी० के० खापर्डे मेमोरियल ट्रस्ट में पांच दिवसीय महिला प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया गया जो सफलतापूर्वक संपन्न रहा।
यह कार्यक्रम बीते अठारह जून, दो हजार चौबीस से बाईस जून, दो हजार चौबीस (18 जून, 2024 से 22 जून, 2024) तक चली, जिसमे देश भर के विभिन्न राज्यों की महिलाओं ने हिस्सा लिया।
बामसेफ द्वारा आयोजित इस पांच दिवसीय महिला प्रशिक्षण शिविर में उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, उत्तराखंड और झारखंड की महिलाओं ने सहभाग किया।
इस कार्यक्रम में विचारों के प्रचार प्रसार को कैसे समाज में गतिमान करना हैं? कैसे मूलनिवासी समाज की महिलाओं को उनकी जिम्मेदारी का अहसास कराना हैं? वे कौन मूलनिवासी महामानव हैं जिनके कारण आज हम संविधान रूपी वृक्ष के फल खा रहें हैं? जैसे विषयों पर चर्चा की गई।
इसके साथ ही, समाज में महिलाओं की स्थिति क्या हैं? और कैसे महिलाओं की जीवन की गरिमा को समतावादी दृष्टिकोण द्वारा सुधार किया जा सकता हैं? इस तरह के कई विषयों पर महिलाओं को प्रशिक्षित किया गया।
इस पांच दिवसीय महिला प्रशिक्षण शिविर का आयोजन अठारह जून, दो हजार चौबीस की सुबह ध्वजारोहण और राष्ट्र गान के साथ शुरू हुई।
प्रशिक्षण के रूप में उपस्थित बामसेफ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मूलनिवासी संजय इंगोले जी द्वारा ” भारतीय समाज व्यवस्था की समझ ” इस विषय पर महिलाओं को प्रशिक्षित किया।
इस विषय पर समझाते हुए मूलनिवासी संजय इंगोले ने मुख्य रूप से वर्णव्यवस्था पर चर्चा की। उन्होंने बताया की कैसे वर्णव्यवस्था के आधार पर वर्षो तक मूलनिवासी बहुजन समाज का शोषण किया गया।
मूलनिवासी डॉ० संजय इंगोले ने कहा की, भारतीय समाज व्यवस्था को आर्य ब्राह्मणों ने अपने अनुरूप बनाने के लिए उसे आकर दिया। उसका ढांचा निर्माण किया और इस भारतीय समाज को विभिन्न वर्गो में विभाजित कर इस ढांचे में इस देश के मूलनिवासियों को सबसे निचले पायदान पर रखा, जहा उसके (मूलनिवासियों) पास कर्तव्य सारे है परंतु अधिकार कुछ भी नहीं हैं।
“मूलनिवासी महामानवों का प्रतिभालेख” जैसे विषय पर मूलनिवासी दीपा श्रावस्ती ने महिलाओं को प्रशिक्षित किया।
इन्होंने मुख्य रूप से सामाजिक आंदोलनों में मूलनिवासी महिलाओं की भागीदारी, समर्पण और त्याग पर प्रकाश डाला।
मूलनिवासी दीपा श्रावस्ती ने यशोधरा से लेकर सम्राट अशोक की पुत्री संघमित्रा। फूलो बानो से लेकर गौरा देवी तक के बारे में वर्णन किया।
इसके अलावा उन्होंने, जीजाबाई, माता सावित्री बाई फुले, ताराबाई शिंदे, फातिमा शेख, अहिल्याबाई बेल्कर, झलकारी बाई और माता रमाबाई के संघर्ष, त्याग और सामाजिक आंदोलनों में उनकी भूमिकाओं पर प्रकाश डाला।
कार्यक्रम में उपस्थित मूलनिवासी नीलिमा बागड़े ने संगठन के आठ तत्वों के बारे में चर्चा की। जैसे उद्देश्य, विचारधारा, कार्यक्रम, नीति/राजनीति, अनुशासन, नेतृत्व, कार्यकर्ता और सदस्य।
मूलनिवासी एस० आर० मौर्य जी ने संगठनात्मक व्यवहार पर प्रकाश डाला। बामसेफ के संस्थापक सदस्य मूलनिवासी डी० के० खापर्डे साहब की कही गई बातों को याद करते हुए कहा कि, “संगठन बनाने से ज्यादा मुश्किल कार्य संगठन को चलाना हैं।
उन्होंने संगठनात्मक व्यवहार का महत्व समझाते हुए कहा कि, संगठन का स्थायित्व हमारे संगठनात्मक व्यवहार पर निर्भर करता हैं। यह संगठनात्मक व्यवहार केवल कार्यकर्ताओं के लिए सीखना आवश्यक नहीं हैं, इसके लिए विशेष प्रशिक्षण नेतृत्व से लेकर सदस्य तक में होना बहुत आवश्यक हैं।
बताते चलें की कार्यक्रम के अंतिम सत्र की अध्यक्षता बामसेफ के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष मूलनिवासी नीतिन गनोरकर जी ने किया।
मूलनिवासी नीतिन गनोरकर जी ने महिलाओं को उनकी समाज के प्रति महत्वपूर्ण जिम्मेदारी का अहसास दिलाते हुए आंदोलन में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेने के लिए कहा।
कार्यक्रम के अंत में मूलनिवासी नीतिन गनोरकर जी ने सभी को प्रशिक्षण के सफल आयोजन की बधाई दी। साथ ही मूलनिवासी सुनीता एन० कुमार द्वारा सभी का आभार व्यक्त किया गया।








