भाऊसाहेब डॉ पंजाबराव देशमुख

Panjabrao-Deshmukh

स्वतंत्र भारत में कृषि क्रांति के पुरोधा
स्वतंत्र भारत के प्रथम कृषि मंत्री
बहुजन समाज के अधिकार के लिए शिक्षा का प्रचार प्रसार करने वाले
भाऊसाहेब डॉ पंजाबराव देशमुख
(जन्म : 27 दिसम्बर 1898
परिनिर्वाण : 10 अप्रैल 1965)

स्मृति दिवस पर
उनके विचार और कार्य की स्मृति में

विनम्र अभिवादन!

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संक्षिप्त जीवन परिचय।
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डॉ पंजाबराव देशमुख इनका मूल कुलनाम कदम था। लेकिन उनका परिवार देशमुख वतनदार था इसिलए देशमुख यह कुलनाम आगे प्रख्यात हुआ।

डॉ पंजाबराव देशमुख को आदर से भाऊसाहेब देशमुख भी कहा जाता है।

उनके माताजी का नाम राधाबाई और पिता जी का नाम शामराव था।

पंजाबराव जी का जन्म 27 दिसम्बर 1898 को अमरावती जिले के पापल गांव में हुआ।

तथा परिनिर्वाण 10 अप्रैल 1965 को दिल्ली में हुआ।

आजाद भारत के वे प्रथम कृषि मंत्री थें।

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उनके जीवन प्रवास की महत्वपूर्ण घटनाएं।
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अमरावती के हिन्दू हाईस्कूल से मैट्रिक परीक्षा (1918) में उत्तीर्ण होकर पुणे के फर्ग्युसन कॉलेज में दाखिला लिया।

फर्ग्युसन कॉलेज से डिग्री लेने के पहले ही वे (1920 में ) इंग्लैण्ड में उच्चशिक्षा के लिए चले गए।

इंग्लैण्ड में उन्होंने एडिनबरों से एमए किया। साथ थी उन्होंने ऑक्सफर्ड से डीफिल किया और बार एट लॉ यह डिग्री हासिल की। वहां उहोंने “वैदिक वाङ्गमय में धर्म का उद्गम और विकास” यह विषय लेकर रिसर्च किया और डॉक्टरेट की डिग्री हासिल की।

उसके बाद उन्होंने ऑक्सफर्ड विश्वविद्यालय में ही संस्कृत रिसर्चर के रूप में कार्य किया।

1926 में वापस भारत आकर यहाँ वकालत शुरू की।

1926 – मुष्टिफंड के माध्यम से बहुजन समाज के जरूरतमंद छात्रों के लिए श्रद्धानंद छात्रालय की स्थापना की।

1927 में उन्होंने अन्तरजातीय विवाह किया। उनकी पटरी का नाम विमलाबाई वैद्य था। वें सुनार जाती से थी। उनके अन्तरजातीय विवाह से काफी हंगामा हुआ था।

उनकी पत्नि विमलाबाई वैद्य इन्होने शादी के बाद बी. ए. एल्एल्. बी. किया। वे राज्यसभा की सदस्य भी चुनकर गयी।

1927 – शेतकरी संघ की स्थापना की।

1927- में उन्होंने किसान संघ के प्रचार के लिए ‘महाराष्ट्र केसरी’ यह समाचार पत्र चलाएं।

1927 में अमरावती का अम्बादेवी मंदिर अछूतों के लिए खुला करने के लिए डॉ बाबासाहेब आंबेडकर और डॉ भाऊसाहेब पंजाबराव देशमुख इन्होने सत्याग्रह किया।

1928 में वे अमरावती जिला परिषद् के अध्यक्ष बनें। उस वक्त उन्होंने सभी सार्वजनिक कुओं को अछूतों के लिए के लिए खोल दिया था। अपने कार्य काल में उन्होने टैक्स को बढाकर उसे शिक्षा पर खर्च किया और प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य किया।

1932 में “श्री शिवाजी शिक्षण संस्था” की स्थापना की जिसमें उन्हें ए. डब्ल्यू. पाटील इनका सहकार्य प्राप्त हुआ।

विदर्भ में बहुजन समाज में शिक्षा का प्रसार हो यह इस संस्था की स्थापना के पिछे उद्देश्य था। इस संस्था के माध्यम से आज हजारों स्कूल हैं। उनकी प्रेरणा से कई महाविद्यालय स्थापित हुए। इंजीनियरिंग कृषि, वैद्यकीय महाविद्यालय स्थापित हुए।

1930 में वे प्रांतीय विधिमण्डल पर सिलेक्ट हुए और वे शिक्षा, कृषि, सहकार और लोककर्म इस विभाग के मंत्री बनें। 1933 में उन्होंने इस्तीफा दिया।

1932 में “हिन्दू देवस्थान सम्पति बिल” पेश किया। मंदिरों की संपत्ति सरकार के पास होनी चाहिए और उस संपत्ति का उपयोग सरकार ने विधायक कार्य के लिए करना चाहिए यह इस बिल का उद्देश्य था।

1933 में उन्होंने किसानों को ऋण से मुक्ति दिलाने के लिए क़ानून पारित करवाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। इसलिए उन्हें आधुनिक भारत के कृषि क्रांति के जनक कहा जाता है।

उन्होंने प्राथमिक शिक्षकों की समस्यायों को सुलझाने के लिए प्राथमिक शिक्षक संघ की भी स्थापना की थी।

1947 वें भारत के संविधान सभा के सदस्य बनें। मसौदा संविधान के कई अनुच्छेदों पर उन्होंने महत्वपूर्ण विचार रखें और सुझाव दिए।

1950 में पुणे में उहोंने लोकविश्वविद्यालय स्थापित किया। जिसका आज नाम बदलकर यशवंतराव चव्हाण महाराष्ट्र मुक्त विद्यापीठ कहा गया। जिसे महाराष्ट्र सरकार स्वयं चलाता है।

1952 संविधान के तहत प्रारंभ हुए पहले स्वतंत्र सरकार में वे कृषि मंत्री बनें।

1955 में उन्होने भारत कृषक समाज की स्थापन की। इसी के माध्यम से उन्होंने “राष्ट्रीय कृषि सहकारी खरेदी विक्री संघ” स्थापना की।

1956 में उन्होंने पिछड़े वर्ग के लिए “अखिल भारतीय पिछडी जाति संघ” की स्थापना की।

विभिन्न देशों में हो रहे आधुनिक खेती के उपाय भारत में करने पर उन्होंने प्रोत्साहन दिया। जापान में की जा रही धान की खेती के तरीके को भारत में भी अपनाने पर उन्होंने जोर दिया।

1952 से 1962 इस कार्यकाल में वे केंद्रीय कृषिमंत्री और एक वर्ष सहकार मंत्री थे।

1960 में उन्होंने दिल्ली में “अंतरराष्ट्रीय कृषि प्रदर्शन” का आयोजन किया था। जिसमें कई देश सहभागी हुए थे।

भारत की लोकसभा में वे 1952, 1957 और 1962 इसप्रकार से तीन बार चुनकर गए।

10 अप्रैल 1965 को दिल्ली में हृदय की गति रुकने से परिनिर्वाण।

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