केंद्र की मोदी सरकार एक के बाद एक सरकारी कम्पनियों को निजी हाथों में बेचने की तैयारी कर रही है। इसी के चलते अब सार्वजनिक बैंकों का निजीकरण करने की मोदी सरकार ने राह पकड़ी है। अगर ऐसा होता है तो इन बँकों पर केंद्र सरकार का कोई नियंत्रण नहीं होगा। याने इन बैंको पर निजी क्षेत्र का मालिकाना हक़ होने के बाद इन बैंकों में सरकार कोई दखल नही देगी। सरकार इसके लिए भारतीय रिझर्व बैंक से उस नियम में बदलाव चाहती है, जिसके तहत निजी बैंको का मालिकाना हक तय होता है।
अन्य सरकारी बैंकों जैसे की बैंक ऑफ इंडिया, यूनियन बैंक, इंडियन ओवरसीज बैंक, सेंट्रल बैंक और इंडियन बैंक में सरकार अपनी हिस्सेदारी बनाए रखना चाहती है। इसके अलावा नीति आयोग ने पंजाब एंड सिंध बैंक, बैंक ओफ़ महाराष्ट्र और युको बैंक का निजीकरण करने की सलाह दी है। इन बैंकों में सरकार अपनी हिस्सेदारी को 26 पर्सेंट तक सीमित कर सकती है। नीति आयोग का कहना है कि बैंकिंग सिस्टम में स्थिरता और मजबूती के लिए यह जरूरी है। जिससे सरकारी बैंकों की संख्या कम होगी और सरकार का उनपर नियंत्रण होगा। दरअसल सरकार कम संख्या में ऐसे बैंक चाहती है, जिनका पूंजीकरण ज्यादा हो। सरकार या तो बैंकों का विलय करेगी या फिर उनमें हिस्सेदारी घटाएगी।
मालूम हो कि इससे पहले निजी बैंक का सरकारी कारण किया जाता था। अब मोदी सरकार में उलटा चक्र घूम रहा हैं। जिसका लाखों बैंक कर्मचारियों पर असर होगा। इसके अलावा इन क्षेत्र में एससी, एसटी और ओबीसी का आरक्षण खत्म हो जाएगा।







