सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फ़ैसले में बुधवार को कहा की सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (सीबीआई) बिना राज्य सरकार की इजाज़त के किसी मामले की ज़ांच नही कर सकती इसके साथ ही केन्द्र सरकार राज्य की अनुमति के बग़ैर सीबीआई का अधिकार क्षेत्र नहीं बढ़ा सकता है। यूपी के एक भ्रष्टाचार के मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह फ़ैसला दिया है।
ग़ैर बीजेपी राज्यों पंजाब , महाराष्ट्र, झारखंड, केरल, राजस्थान, बंगाल, महाराष्ट्र , छत्तीसगढ़ और मिज़ोरम ने अपने राज्यों में केसों की ज़ांच के लिए सीबीआई को दी गई आम सहमति वापस ले ली है।
कुछ मीडिया रिपोर्ट के अनुसार जस्टिस एएम खानविलकर और बीआर गवई की पीठ ने कहा, ‘कानून के अनुसार, राज्यों की सहमति आवश्यक है और केंद्र राज्यों की सहमति के बिना सीबीआई का अधिकार क्षेत्र नहीं बढ़ा सकती है।
कोर्ट ने कहा कि डीएसपीई अधिनियम की धारा 5 केंद्र सरकार को केंद्र शासित प्रदेशों से परे सीबीआई की शक्तियों और अधिकार क्षेत्र का विस्तार करने में सक्षम बनाती है, लेकिन जब तक कि डीएसपीई अधिनियम की धारा 6 के तहत राज्य संबंधित क्षेत्र के भीतर इस तरह के विस्तार के लिए अपनी सहमति नहीं देता है, तब तक यह स्वीकार्य नहीं है। जाहिर है, प्रावधान संविधान के संघीय चरित्र के अनुरूप हैं, जिसे संविधान की बुनियादी संरचनाओं में से एक माना गया है
फेरटिको, मार्केटिंग एंड इन्वेस्टमेंट प्राइवेट लिमिटिड से जुड़ा था। इस फ़ैक्ट्री पर सीबीआई ने एक सरप्राइज रेड की थी। रेड में पता चला कि जो कोयला कंपनी ने कोल इंडिया लिमिटिड से फ्यूल सप्लाई अग्रीमेंट के तहत खरीदा था उसकी कथित तौर पर काला बाजारी हो रही थी। जिसके बाद सीबीआई ने केस रजिस्टर किया था।
अगस्त 2019 में इलाहबाद हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया था। इसको चुनौती देते हुए कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटकटाया जिस पर आज जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस बीआर गवई की पीठ ने फैसला सुनाया है।







