कर्पूरी ठाकुर का जन्म बिहार के समस्तीपुर जिले के पितौझिया गांव में नाई जाती में हुआ था। प्रारंभिक शिक्षा गांव की पाठशाला में हुई। स्नातक की शिक्षा के लिए चंद्रधर मिथिला कॉलेज दरभंगा में प्रवेश लिया ही था कि उसी समय महात्मा गांधी ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ सत्याग्रह आंदोलन चलाया। कर्पूरीजी उससे प्रभावित होकर छात्र जीवन को त्यागकर इस आंदोलन में कूद पड़े और उन्हें 26 महीने की जेल की सजा हुई।
1942 से 1952 तक बिहार के किसान पंचायत के एक अग्रणी नेता रहे और इस दौरान वह उसके महामंत्री भी रहे। 1952 से 1959 में इन्होंने समाजवादी नेता के रुप में यूरोप तथा पश्चिमी एशियाई देशों का दौरा किया। बिहार के समाजवादी दल के सचिव तथा प्रजा समाजवादी दल की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य रहे। 5.3.1968 से 28.1.1968 तक संयुक्त विधायक दल की सरकार में महामाया प्रसाद सिन्हा के मुख्यमंत्रित्व में गठित सरकार में उपमुख्यमंत्री रहे। इस दौरान इन्हें शिक्षा तथा वित्त विभाग का दायित्व सौंपा गया। वर्ष 1969 में अखिल भारतीय संयुक्त समाजवादी दल के अध्यक्ष रहे। 22.12.1970 में कांग्रेस मंत्री परिषद संयुक्त समाजवादी दल के नेता के रुप में बिहार के मुख्यमंत्री बने। 1972-73 में संयुक्त समाजवादी दल की राष्ट्रीय समिति के सदस्य रहे। 24.6.1977-21.4.1979 को आपातकाल के पश्चात जनता पार्टी की सरकार बनी। कर्पूरीजी मुख्यमंत्री मनोनीत किये गये। 1980 के चुनाव में कर्पूरी ठाकुर लोकदल के उम्मीदवार बनाकर समस्तीपुर से जीतकर विधानसभा पहुंचे और विपक्ष के नेता बने।
समाजवादी नेता कर्पूरी जी ने अपने व्यक्तित्व, सादगी और ईमानदारी से बिहार ही नहीं बल्कि देश की राजनीति में ऐसे प्रर्तिमान स्थापित किए, जिनके करीब भी पहुंच पाना बाद की पीढ़ी के नेताओं के लिए दुरूह है। उच्च पदों पर रहते हुए भी अभाव में जीने की कला कोई उनसे सीखे। उन्होंने मोहमाया से विरक्त होकर समस्त मानवता की मंगलकामना में आनंद का अनुभव किया। खासकर दीन-दुखियों, शोषितों, पीड़ितों, प्रताड़ितों, वंचितों की पीड़ा के प्रति संवेदनशील रहे। उनके मन में अहंकार की दुर्गंध नहीं थी।
महान योद्धा, कुशल राजनीतिज्ञ तथा देश के सच्चे सपूत कर्पूरीजी ने 1978 में सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व (आरक्षण) के प्रावधान को क्रियान्वित करके चारित्रिक दृढ़ता, नैतिक साहस और अद्भुत कौशल का परिचय दिया। यह आरक्षण काफी संतुलित था और उसमें सभी वर्गों को शामिल किया गया था।
सामाजिक, राजनैतिक तथा आर्थिक विषमताओ और विसंगतियों के खिलाफ कर्पूरी जी का जीवन संघर्ष चलता रहा लगभग 4 दशक के अपने जीवन में वह एक बार उपमुख्यमंत्री तथा दो बार मुख्यमंत्री रहे। शेष जीवन विपक्षी नेता के रुप में वंचितों के विकास के प्रति समर्पित रहे। कुछ समय तक अपने गांव के विद्यालय में शिक्षक के रुप में भी सेवा की।
संदर्भ
लेखक-एस एस गौतम
पुस्तक-पिछड़ा वर्ग और उसके महापुरुष
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