इस बात को कोई इनकार नहीं करता की भारत में बड़े पैमाने पर बेरोजगारी है। संगठित और असंगठित क्षेत्र दोनों में बेरोजगारी बड़े पैमाने पर है। समय समय पर इसके बारे में राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय रिपोर्ट प्रकाशित होते हैं। लेकिन आर्थिक समानता के मूल्य के तहत प्रत्येक हाथ को सम्मानजनक काम हो इसके उपाय पर सरकारों का ध्यान नहीं जा रा रहा है। बेरोजगारी की मार इस देश के युवा बड़े पैमाने पर झेल रहे हैं।
आपको बता दें संयुक्त राष्ट्र की 2014 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत दुनिया का सबसे युवा देश है। जहां 35.6 करोड़ आबादी युवाओं की है।
किसी भी देश की तरक्की काफी हद तक वहां के युवाओं को मिलने वाले रोजगार पर निर्भर करती है। अगर युवाओं को रोजगार न मिले तो उनके न सिर्फ सपने टूटते हैं बल्कि अवसाद के कारण उनके गलत कदम उठाने की ओर बढ़ने की संभावना भी रहती है और इसके भयंकर परिणाम भी सामने आ रहे हैं।
केंद्र में सत्ता में बैठे दलों ने रोजगार और नौकरियों की बातें की। लेकिन सरकार की निजीकरण की नीति ने नौकरियां तो कम हो ही गयी साथ थी रोजगार भी घट गया। खुदरे और कच्चे माल के आयात सरकार रोक नहीं लगा पा रही है। व्यापारी दूसरे देशों से सस्ते दाम पर माल लाकर यहाँ बेच रहे हैं। जिसके कारण देश में रोजगार का संकट दिन-प्रतिदिन गहराता जा रहा है।
बेरजोगारी पर भारतीय अर्थव्यवस्था निगरानी केंद्र (सीएमआईई) की 2 मार्च 2020 को जारी की गई ताजा रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि देश में बेरोजगारी की दर बढ़ गयी है।
आपको बता दें कि उच्च शिक्षित युवाओं की बेरोजगारी दर बढ़कर 60 फीसदी तक पहुंच गई है।
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की नवीनतम रिपोर्ट के मुताबिक साल 2018 में किसानों से ज्यादा बेरोजगार लोगों ने आत्महत्या की है।
सरकार की गलत आर्थिक नीतियों के कारण देश 2014 के बाद लगातार आर्थिक संकटों का समाना कर रहा है। गलत नीतियों के कारण भारत को पिछले चार वर्षों से
आर्थिक मंदी का सामना करना पड़ा और संगठित एवं असंगठित क्षेत्र के लोगों को अपनी नौकरियों से हाथ धोना पड़ रहा है।
सत्ता में बैठे राजनैतिक दलों की गलत आर्थिक नीति के कारण देश की अर्थव्यवस्था इतनी ख़राब हो गयी है की सरकारी परिसम्पत्तियों और उद्योगों को घाटे के नाम पर बेचा जा रहा है।
सरकार की न केवल गलत आर्थिक नीति का परिणाम उद्योग व्यापर पर हो रहा है। एक तरफ नीजि कंपनियों की संपत्ति चौगुनी रफ़्तार से बढ़ते हुए संपत्ति का कुछ ही लोगों के हाथों में केन्द्रीकरण हो रहा है। इससे यह बात सामने आयी है कि लोकतन्त्र की संस्थाओं पर कुछ पूंजीपति परिवार प्रभाव डालते हैं और आपसी हित के अनुसार नियम और कानून बनाते हैं।
सरकार रस्ते, पूल बांधने पर जितना जोर दे रही है उससे अधिक जोर उद्योग, व्यापार को बढ़ावा देने पर करना होगा। सरकार को महत्वपूर्ण क्षेत्र में कंपनियों की स्थापना करते हुए स्थायी नौकरियां और रोजगार की निर्मिति करनी होगी। तभी देश को इस गंभीर संकट से निकाला जा सकता है.







