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वैज्ञानिकों ने चांद पर देश का झंडा गाड़ दिया हैं, लेकिन आजादी के सात दशक बाद भी सरकार मैनुअल स्केवेंजिंग यानी हाथ से मैला ढोने की प्रथा को रोक नहीं पाई हैं। आंकड़ों के मुताबिक आज भी हजारों लोग हाथ से मैला ढोने पर मजबूर हैं। जिससे हर साल कई लोग अपनी जान गवां देते हैं।
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बीते तेईस अगस्त, दो हजार तेईस को शाम के ठीक छह बजकर चार मिनट में चंद्रयान तीन चांद के दक्षिणी ध्रुव के पास लैंड करता हैं।
यह पल देशवासियों के लिए वाकई गौरव का क्षण था, लेकिन देश के उन करोड़ों लोगो के लिए नहीं जो आज भी दो वक्त की रोटी के लिए अपनी जान को दांव में लगा देते हैं।
जिसका सबसे बड़ा उदाहरण है देश में लगातार बढ़ रही मैनुअल स्केवेंजिंग यानी हाथ से मैला ढोने की प्रथा। कठोर कानून बनने के बाद भी सरकार मैनुअल स्केवेंजिंग को रोक नहीं पाई और आज हजारों लोग हाथ से मैला ढोने के लिए मजबूर हैं।
साल दो हजार इक्कीस में राज्यसभा में एक सवाल पर सामाजिक न्याय मंत्रालय ने कहा था कि वर्तमान में भारत में छियासठ हज़ार से ज्यादा सफाईकर्मी काम कर रहे हैं जो हाथों से मैला साफ करते हैं।
इन हजारों सफाई कर्मी की जाति की बात करे तो उनमें से लगभग सभी अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ा वर्ग से संबंध रखते हैं।
सामाजिक न्याय मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक तियालिस हजार सात सौ संतानवे (43,797) मैनुअल स्कैवेंजर की जाति की पहचान की गई थी। जिनमे पाया गया कि बयालीस हजार पांच सौ चौरानवे (42,594) यानी संतानवे (97%) प्रतिशत से भी ज्यादा मैनुअल स्कैवेंजर अनुसूचित जातियों से संबंध रखते हैं।
इसके अलावा चार सौ इक्कीस (421) अनुसूचित जनजातियों से, चार सौ इकतीस (431) अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) से और तीन सौ इक्यावन (351) अन्य वर्गों से हैं।
हाथ से मैला ढोने वाले लोगो की मौत की बात करें तो सरकारी आंकड़ों के मुताबिक बीते चार सालों में देशभर में दो सौ तेतीस लोगों की जानें गईं हैं। इनमें से दो हजार बाईस में देश भर में अड़तालिस मैनुअल स्कैवेंजर की जाने गई हैं।
इसी साल सिर्फ हरियाणा में तेरह लोगों की मौत सेप्टिक टैंक और गटर साफ करने के दौरान हुईं है। वही महाराष्ट्र में इस साल बारह लोगो की मौत सेप्टिक टैंक और गटर साफ करने के दौरान हुईं है।
द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार देश भर में हर पांच दिन में एक मैला ढोने वाले की मौत होती हैं और ये आंकड़े राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग (एनसीएसके) द्वारा जुटाए गए थे।
एनसीएसके का दावा है की, एक जनवरी, दो हजार सत्रह से देश भर में सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई करते समय औसतन हर पांच दिन में एक व्यक्ति की मौत हो गई है।








