- राजर्षि छत्रपति शाहू जी महाराज प्रतिनिधित्व की कानूनन अवधारणा के जनक माने जाते हैं।
- वे 20 मार्च 1886 को कोल्हापुर के राजगद्दी पर बैठे थे।
- उस समय समाज की दशा दयनीय और जातिवाद चरम पर था।
- राजा होने के बावजूद ब्राह्मण उन्हें शुद्र समझ कर घृणा करते थे क्योंकि वे कुणबी (कुर्मी) जाति के सदस्य थे।
- उस समय कोल्हापुर स्टेट में कार्यरत कर्मियों की संख्या 71 थी जिसमे 60 ब्राह्मण थे। पिछड़ी जाति के 11 थे।
- महाराज के निजी कार्यालय में 53 कर्मियों में से 46 ब्राह्मण थे।
- ये सब कोई योग्यता के बल पर नहीं, बल्कि वर्ण व्यवस्था के द्वारा प्राप्त जातीय विशेषाधिकार के कारण पदास्थापित थे।
- उस समय कोल्हापुर में 90% पिछड़े वर्ग और ब्राह्मण सिर्फ 3% थे फिर भी वे साक्षरता में 90% थे।
- जब शाहू जी को सामाजिक भेदभाव का भान हुआ तो उन्होंने 26 जुलाई 1902 को अपने राज्य में सरकारी नौकरियों में पिछड़ी जातियों के लिए 50% आरक्षण का फरमान जारी किया।
- आगे चल कर बाबासाहेब डॉ आंबेडकर ने संविधान में इन्ही की विचारधारा को अनुच्छेद 15 (4), 16(4), 330, 332 और 340 का सृजन कर बहुजन उत्थान के कारवां को अग्रसर किया।
- आरक्षण समस्या नहीं, समाधान है। यह प्रतिनिधित्व है। प्रतिनिधित्व का प्रावधान संवैधानिक है। यह अवसर और रक्षोपाय है।
- शाहू जी महाराज मूलनिवासी बहुजनों के लिए अनेक सामाजिक और शैक्षणिक सुधार किए तथा अस्पृश्यता को खत्म करने का प्रयास किया।
- उन्होंने पिछड़ों के व्यवसाय उद्यम को भी बढ़ावा दिया तथा सत्ता में भागीदारी के लिए साउथ बरो कमीशन के समक्ष अपनी बात रखने के लिए प्रतिनिधि को भेजा।
- शाहू जी महाराज ने बाबासाहेब आंबेडकर को देश का नेतृत्व कहा और उन्हें आंदोलन को आगे बढ़ाने में सभी तरह से सहायता की और सक्रिय सहभाग भी दिया।
- डॉ बाबासाहेब आंबेडकर ने राजर्षि छत्रपति शाहूजी महाराज को “सामाजिक लोकतंत्र के आधारस्तंभ” (The Pillar of Social Democracy) कहा है।
-डॉ विजय कुमार त्रिशरण








बहुत ही बढ़िया लिखा हैं