मक्कम के तत्वावधान में उत्तर-पूर्व राज्यों में कर्मचारियों के साथ बैठकें

उत्तर पूर्वी राज्यों में मूलनिवासी आंदोलन को ले जाने के लिए बामसेफ और उसके स्कंध संगठनों के निर्माण की प्रक्रिया आरम्भ करने के उद्देश्य से बामसेफ के वरिष्ठ कार्यकर्ता व मूलनिवासी कर्मचारी कल्याण महासंघ के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष मू. एस.एस. धम्मी जी ने उत्तर पूर्वी राज्यों का बीते एक जुलाई से सत्रह जुलाई तक दौरा किया।

अपने दौरे पर सबसे पहले उन्होंने एक जुलाई दो हजार बाईस को ऊपरी आसाम के दिबु्रगढ़ में कुछ मूलनिवासी साथियों के साथ बैठक की। उनको मूलनिवासी आंदोलन, बामसेफ और बामसेफ के स्कंध संगठनों जैसे मूलनिवासी संघ, मूलनिवासी विद्यार्थी संघ , मूलनिवासी कर्मचारी कल्याण महासंघ (मक्कम) की जानकारी दी। भविष्य की चुनौतियों को समझाया और मूलनिवासी समाज को एक ठोस समाज बनाने के महत्व को समझाया। दिब्रुगढ़ के साथियों ने विश्वास दिया कि अगली तारीख जब भी दी जायेगी तभी एक मीटिंग का आयोजन कर यूनिट गठित हो जायगी। वहा के स्थानीय लोगों ने बताया कि वहां आर.एस.एस और उसके स्कंध संगठनों का मूलनिवासियों में बोलबाला है। कारण है बंगलादेशी मुसलमानों का मुद्दा।

उसके बाद मेघालय की राजधानी शिलांग में एक मीटिंग हुई। वहाँ का नेतृत्व बामसेफ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मूलनिवासी आर.एस. राम जी ने संभाला । जुलाई को शिलांग में मीटिंग हुई। मीटिंग में संवैधानिक अधिकारों के तहत प्रतिनिधित्व और उनको दिलाने के लिए बाबा साहब के संघर्ष पर विस्तृत जानकारी दी गई। मूलनिवासी समाज के सभी घटकों को उनका प्रतिनिधित्व क्यों नहीं मिला इस पर विस्तृत जानकारी दी गई। राष्ट्रीय स्तर पर सभी सरकारी और न्यायालयी तथा अन्य सरकारी अंगों में अनुसूचित जनजातियों, जातियों और अन्य मूलनिवासियों की स्थिति की वास्तविक स्थिति को समझाया गया। साथ ही सरकारी कर्मचारियों की समस्याओं, उनके कारणों और उनके समाधान पर भी संक्षिप्त चर्चा की गई। उसके बाद सवाल-जवाब सत्र भी हुआ। अंत में बामसेफ और मूलनिवासी कर्मचारी कल्याण महासंघ की इकाइयों का गठन किया गया।

तेरह जुलाई को त्रिपुरा की राजधानी अगरतला में बैठक का आयोजन हुआ। यह बैठक मूलनिवासी प्रबल प्रताप सिंह जी के नेतृत्व में हुई। स्थानीय मूलनिवासियों ने त्रिपुरा में सामाजिक विभाजन की जानकारी दी। मूलनिवासियों में आपसी घृणा और नकारात्मक प्रतियोगिता का जिक्र किया। इस समस्या के कारणों पर चर्चा हुई तो यह निष्कर्ष निकाला कि इन मूलनिवासियों के सभी घटकों में जो संगठन सक्रिय रहा है या रहे हैं उन्होंने ऐसा ही काम किया है जिससे ये घटक आपस में और अपने अंदर भी लड़ते रहें। इनको इस बीमारी से बाहर निकालने के उद्देश्य से काम करने वाला संगठन निर्माण करना आवश्यक है। इसलिए बामसेफ के निर्माण की तत्काल आवश्यकता है। साथ ही कर्मचारियों की समस्याओं पर चर्चा की गई। अंत में यह निर्णय हुआ कि अगली बैठक में यूनिट का गठन किया जायगा।

पंद्रह जुलाई को नागालैंड के दीमापुर में चर्चा हुई। वहां नागालैंड विश्वविद्यालय के एक असिस्टेंट प्रोफेसर डाक्टर सेवक राम जी से विस्तृत विचार-विमर्श हुआ। अगली बार मीटिंग करके वहां बामसेफ और मक्कम की इकाइयों के गठन का निर्णय हुआ।

सौलह जुलाई को गुवाहाटी में चर्चा हुई। केंद्र सरकार के ही कुछ साथियों के साथ शाम को चर्चा हुई। यहां भी मूलनिवासियों में आपसी फूट और नफरत का जिक्र रहा। यहाँ भी अन्य जगहों की तरह सभी मुद्दों पर चर्चा हुई। मूलनिवासी आंदोलन और बामसेफ की रणनीति और मिशन पर भी चर्चा हुई। बाबा साहब के आंदोलन व कार्य करने की रणनीति पर भी चर्चा हुई। यहां भी यही निर्णय हुआ कि अगली बार बैठक का आयोजन किया जायेगा। समय की कमी के कारण अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम में जाना संभव नहीं हो पाया।

सभी जगह पर यह सुझाव दिया गया कि सितम्बर और अक्टूबर के महीने में छुट्टी वाले दिनों में मीटिंग करना उचित रहेगा तथा यह भी जोर दिया गया कि लगातार बैठकों का दौर चलते रहना चाहिए। इन क्षेत्रों में बाहरी मुस्लिम विरोध को आधार बनाकर आर.एस.एस और उसके स्कंधों ने सभी प्रकार के मूलनिवासियों में अपना मिशनरी तंत्र बनाकर उन्हें अपने आंदोलन में शामिल कर लिया है।

राज्यों में उनकी राजनीतिक पार्टी का व्यापक नियंत्राण है। उत्तर पूर्व के हर राज्य में अनेक कबीले हैं वे सभी मिलकर हर राज्य में बहुमत में हैं। ईसाई, बौद्ध और ब्राह्मण धर्म को तथा कुछ इस्लाम को भी मानने वाले लोग हैं। जहाँ बहुमत ईसाइयों का है वहाँ भी आर.एस.एस की पकड़ बन चुकी है। इसका कारण है उसके मिशनरी तंत्र का वर्षों से किया गया अनवरत प्रचार-प्रसार।

फुले-अम्बेडकरवादी मूलनिवासी आंदोलन का मिशनरी तंत्र बनाना संभव है लेकिन लगातार प्रचार-प्रसार करना होगा। वहां सभी बैठकों में बाबा साहब के आंदोलन का लक्ष्य बताते हुए यह स्पष्ट किया गया कि अम्बेडकरवादी आंदोलन का लक्ष्य है – सभी बिखरे हुए मूलनिवासीयों को जोड़ना, मूलनिवासी समुदाय बनाकर उसे भारत का शासक वर्ग बनाना। बामसेफ इस लक्ष्य प्राप्ति के संसाधन निर्माण, आंदोलन नियोजन, संसाधनों का संयोजन और प्रबंधन, रणनीतियों का सृजन, आंदोलन का एकीकृत संचालन कर रहा है। मूलनिवासी आंदोलन के इस लक्ष्य प्राप्ति में सभी क्षेत्रों में सक्रियता के लिए सकंद संगठनों का निर्माण किया जा रहा है और आगे भी यह जारी रहेगा।

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