अरबी कलमा पढ़ने से कानपुर में ब्राह्मण बच्चे हुए अशुद्ध?

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उत्तर प्रदेश के कानपुर कि खबर है कि यहाँ के एक स्कूल में अन्य धर्मों के छंद पंक्तियों के साथ साथ अल्लाह के बारे में अरबी कलमा पढ़ाने के कारण कुछ ब्राह्मण बच्चे अशुद्ध हो गए। जिसको लेकर विवाद खड़ा हुआ। क्या है मामला पढिए।

उत्तरप्रदेश के कानपुर में 2003 में चल रहे एक स्कूल में चार धर्मों की प्रार्थना स्कूल के प्रार्थना का हिस्सा थी। जिसमें गायत्री मंत्र, सांची बाणी, दुआ आदि प्रमुखता से शामिल थे। लेकिन ब्राह्मणवादी संगठनों और इनके विचारों से ग्रसित लोगों को इसमें से एक प्रार्थनापर अचानक आपत्ति हो गयी। स्कूल के खिलाफ पुलिस कम्प्लैन्ट की गयी।

लेकिन पुलिस भी इसमें क्या करेगी? स्कूल न तो किसी धर्म का समर्थन कर रही थी और न किसी का विरोध। वह अलग अलग धर्मों को मानने वाले लोगों के धार्मिक पुस्तकों के कुछ पद्य पंक्तियां प्रार्थना के रूप में बच्चों से कहलवा रही थी।

आपको बता दें कि “ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुन रसूल अल्लाह” अर्थात अल्लाह एक है, और मुहम्मद, अल्लाह के रसूल हैं यह प्रार्थना पढ़ने में कुछ अभिभावकों को परेशानी हुई। उनके समर्थन में कुछ ब्राह्मणवादी संगठन खड़े हुए हुए।

जब स्कूल की टीचर पत्रकारों से बात कर रही थी तब टीचर से एक पत्रकार इतने ताव से बोल रहा था कि क्या कहें। एक पत्रकार ने सवाल में स्कूल टीचर को जानकारी दी कि “कुछ ब्राह्मण बच्चे कलमा पढ़ रहे तो अशुद्ध हो गए थे।” इस पर टीचर ने जवाब दिया कि हमारे स्कूल में मुस्लिम बच्चे भी पढ़ते हैं और वह गायत्री मंत्र कहते हैं।

साथियों इन लोगों के बारे में आपके सुझाव बहुत महत्वपूर्ण रहेंगे कि बच्चों को यह लोग किस प्रकार का धर्म सीखा रहे हैं?

आपको बता दें वर्ष 2003 में स्थापित कानपुर के इस फ्लॉरस्ट स्कूल में गायत्री मंत्र, गुरुबानी और कलमा प्रार्थना में पढ़ाया जा रहा है। इस स्कूल में यह प्रथा एक दशक से चल रही है। बताया गया कि स्कूल की डायरी में हिन्दू, सिख, ईसाई, इस्लाम सहित सभी प्रमुख धर्मों के छंद लिखे गए हैं। सभी धर्मों को समान सम्मान देने के लिए छंदों को पढ़ना एक अभ्यास के रूप में शुरू किया गया था।

विवाद खड़ा होने के बाद स्कूल प्रशासन ने फैसला लिया कि अब केवल राष्ट्रीय गीत ही प्रार्थना के रूप में पढ़ाया जाएगा। आपको बता दें कि यह स्कूल किसी मुस्लिम व्यक्ति ने स्थापन नहीं किया है।

हालांकि स्कूलों को इस प्रकार के धार्मिकता से दूर ही रहना चाहिए। यह अच्छा हुआ कि स्कूल ने केवल राष्ट्रीय गीत को ही प्रार्थना के रूप में कहने का निर्णय लिया। कई स्कूलों में नैतिकता व समता, बंधुता, न्याय व स्वतन्त्रता इन मूल्यों को पढ़ाने के लिए धार्मिक छंदों का आसरा लिया जाता है। लेकिन वास्तविकता यह है कि ब्राह्मणवादी धर्म के ग्रंथों के कुछ पंक्तियों को निकाल दिया जाए तो वह जातिवाद और ब्राह्मणवाद को ही प्रमुखता से बताते हैं। इसके अलावा अन्य धर्म मानवता, समानता, बंधुता, न्याय, एकता के पाठ को पढ़ाते हैं।

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