आर्य ब्राह्मणों की सांस्कृतिक धरोहर मनुस्मृति के अध्याय प्रथम श्लोक नंबर 91 में मनु का संदेश है-
एकमेव तु शुद्रस्तु प्रभु कर्म समादिशत। ऐतषामेव वर्णानाम शुश्रुषा मनसेवया।
अर्थ-भगवान ने शुद्रों के लिए केवल एक ही कर्म निर्धारित किया है, वह है अपने से ऊपर के तीनों वर्णों की निन्दा रहित होकर सेवा करना। जो आर्य संस्कृति भगवान भरोसे चल रही हो और लोग उन भगवानों के धर्म को छोड़कर अन्य धर्मो की शरण लें फिर स्वाभाविक है आर्य पुत्रों का उन पर प्रहार करना। ब्राह्मणों को ही नहीं उनके भगवान श्री कृष्ण को भी अन्य धर्मों का भय सताता है। इसलिए वे अर्जुन से कहते हैं- सर्वधर्मान्न परित्यज्य मांमेंकं शरणम ब्रज। अहम त्वाम सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मां शुच:। कृष्णा अर्जुन से कहते हैं हे अर्जुन! सभी अन्य धर्मों का परित्याग कर तुम मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सारे पापों से मुक्त कर दूंगा। देश की राजधानी दिल्ली और उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में बौद्ध दीक्षा समारोह माह अक्टूबर में हुआ जिसमें लोगों ने भारी संख्या में ब्राह्मण धर्म (हिन्दू धर्म)को नकार कर बौद्ध धर्म को स्वीकार किया और प्रतिज्ञा ली कि वे ब्रह्मा, विष्णु, महेश को ईश्वर नहीं मानेंगे। यहां पर विवाद ईश्वर का है जिस ईश्वर को साधन बना कर आर्य ब्राम्हण एन केन प्रकारेण अपना धर्म का धंधा चलाते हैं। फिर जिन्होंने ब्रह्मा, विष्णु, महेश को नकार दिया वह कभी आर्य पुत्रों के हितैषी कैसे हो सकते हैं?उन्हें वे दुश्मन नजर आते हैं।
भारतीय संविधान निर्माता डॉ अंबेडकर ने भी 14 अक्टूबर 1956 को ब्राह्मण धर्म को नकार कर बौद्ध धर्म ग्रहण किया और प्रतिज्ञा ली कि वे ब्रह्मा, विष्णु, महेश को ईश्वर नहीं मानेंगे फिर विवाद किस बात का। डॉक्टर अंबेडकर ने जब आर्य ब्रह्माणी धर्म शास्त्रों में पढ़ा कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश ईश्वर के काबिल नहीं है। उन्हें उनके चरित्र में दोष ही दोष नजर आया। इसलिए उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा में त्रिदेवों के विरोध में संकल्प लिया। राष्ट्रपिता फुले के सामाजिक आंदोलन से आहत स्वामी दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना किया और सनातन धर्म की रक्षा के लिए उन्होंने अपनी रणनीति में परिवर्तन किया मात्र इसलिए कि राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले का सामाजिक आंदोलन अपने हाथ में लेकर आर्य संस्कृति की रक्षा की जा सके। उन्होंने पूरे देश में भ्रमण कर जगह जगह सनातनियों से शास्त्रार्थ किए और उनके इस कार्य को उनके आर्य समाजी ब्राह्मण अनुयाईयों ने आगे बढ़ाया मात्र इसलिए कि राष्ट्रपिता फूले महर्षि दयानंद सरस्वती के कार्य से प्रसन्न होकर उनके साथ होलें किंतु स्वामी जी को अपने बौद्धिक षड्यंत्र में सफलता नहीं मिल सकी। सनातनी जिस ब्रह्मा विष्णु महेश का महिमामंडन करते थे, जिस ब्रम्हा को राष्ट्रपिता फुले ने तथ्यों के आधार परअपनी ही बेटी की आबरू का लुटेरा कहा ठीक उसी तर्ज पर आर्य समाजियों ने ब्रम्हा विष्णु महेश के चरित्र को उजागर किया। सनातनियों और आर्य समाजियों के बीच चले वाक् युद्ध के सारे तथ्य उनकी साहित्य संपदा में आज भी विद्यमान हैं। आर्य समाजियों की पुस्तक “निर्णय के तट पर”शास्त्रार्थ संग्रह भाग दो में ब्रह्मा, विष्णु, महेश के चरित्र का चित्रण किया गया है। यथा-भविष्य पुराण प्रति सर्ग खंड 4 अध्याय 18 श्लोक 27 के अनुसार- स्वकीयां च सुतां ब्रम्हा विष्णु देव स्वमातरम।भग्निर्र भगवान शंभु: गृहीत्वा श्रेष्ठतामगात। अर्थ-ब्रह्मा ने अपनी बेटी को विष्णु ने अपनी मां को शंकर ने अपनी बहन को पत्नी के रूप में ग्रहण कर श्रेष्ठता को प्राप्त किए।
आर्य समाजी अग्निव्रत नैष्ठिक ने भी अपनी पुस्तक “बोलो किधर जाओगे”के पृष्ठ संख्या 100 पर ब्रह्मा विष्णु महेश के चरित्र का चित्रण किया है। देखें भविष्य पुराण प्रति सर्ग पर्व चतुर्थ खंड 97 के श्लोक नंबर ७३मे लिखा है कि अत्रि ऋषि की पत्नी अनसूया जी तप कर रही थी। उनके पास शिव, ब्रह्मा और विष्णु तीनों देव पहुंचे और उनके साथ क्या किया जिसका विवरण निम्न श्लोक में निहित है। यथा- मोहितास्तन्नते देवा:ग्रहित्वा तां बलान्तदा।मैथुनाय समुद्दयोगं चक्रुमार्या विमोहिता:।७३।
अर्थ-ब्रह्मा विष्णु महेश तीनों देवों ने काम मोहित होकर उस तपस्विनी देवी अत्रि ऋषि की पत्नी अनुसुइया के साथ बलपूर्वक पकड़कर संभोग किया। फिर ऐसे अनाचारी और दुराचारी भगवानों को जिसे डॉक्टर अंबेडकर ने नकार दिया और आज उनके अनुयाई नकार रहे हैं फिर उनके ऊपर प्रहार क्यों? ब्रह्मा विष्णु महेश को नकारने का मतलब आर्य पुत्रों की धर्म के धन्धे को नकारना जिस धर्म की सीढ़ी पर चढ़कर आर्यपुत्र भारत की राजनीतिक सत्ता पर आसानी से पहुंच गये। धम्मदीक्षा की दूसरी प्रतिज्ञा है मैं गौरी गणेश की पूजा नहीं करूंगा।
संविधान की राजनीति से बहुजन समाज पार्टी को उत्तर प्रदेश में राजनीतिक सत्ता हासिल हुई और उन्होंने ज्यों ही आर्य ब्राह्मणों के पदचिन्हों पर चलकर “हाथी नहीं गणेश है ब्रह्मा विष्णु महेश है” का राग अलापना शुरू किया त्यों ही उनके हाथ से राजनैतिक सत्ता चली गई जैसे गणेश ने बहुजन राजनीति कोअपने सूड़ में लिपेटकर पठखनी दे दी हो। देश की राजधानी दिल्ली में दीक्षा समारोह के दिन आम आदमी पार्टी के समाज कल्याण मंत्री राजेंद्र पाल गौतम ने 22 प्रतिज्ञा कर बौद्ध धर्म स्वीकार क्या किया कि उनके ऊपर तीखे प्रहार शुरू हो गए और उनका कहना है कि भाजपा ने उनके ऊपर हमला बोल दिया इस लिए उन्होंने मंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया। लोकतंत्र में विपक्ष का काम ही है विरोध जताना वह विरोध उल्टा भी हो सकता है सुल्टा भी हो सकता है फिर यह जानते हुए भी इस्तीफा क्यों? उनकी पार्टी का तो विरोध नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि हमारे नेता मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के ऊपर भाजपा हमला कर रही थी इसलिए उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दिया किंतु उनकी यह बात जंचती नहीं । ऐसा लगता है कि अरविंद केजरीवाल ने राजेंद्र पाल गौतम से जबरन इस्तीफा लिया और राजेंद्र पाल गौतम अपने पद और प्रतिष्ठा की बचाने के लिए अरविंद केजरीवाल का महिमामंडन किया मात्र इसलिए कि मंत्री पद तो गया ही किन्तु कम से कम विधायकी का पद तो नहीं जाना चाहिए। ऐसे दोहरे मापदंड अपनाने वाले नेताओं को क्या मिलेगा? एक शेर है- “न खुदा ही मिला न विसाले सनम न इधर के हुए उधर के हुए”।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल आर्य ब्राह्मणी संस्कृति के रक्षक है उन्हें तथागत बुद्ध, फुले,अंबेडकर के विचारों से कोई लेना देना नहीं है। वे अपनी मतलब परस्ती के लिए मूलनिवासी बहुजन समाज के महापुरुषों का महिमामंडन करते हैं। मूलनिवासी बहुजनों को उलझाने के लिए ही वे मूलनिवासी महापुरुषों की जय जयकार भी करते हैं। वे भगवानों की श्रृंखला में तथागत बुद्ध को अवतार भी घोषित करते हैं। किन्तु बौद्ध धर्म की दीक्षा लेने वालों पर वे प्रहार भी शुरू कर देते हैं।यदि बौद्ध धर्म की दीक्षा लेने पर राजेंद्र पाल गौतम को मजबूरन इस्तीफा देना पड़ा तो भाजपा की डर से अथवा और किसी कारण से।वे सच को क्यों नहीं उगलते। डबल मंगल सूत्र पहनने वाली महिला अपने पति के प्रति कृतज्ञता नहीं प्रकट कर सकती जो उसका औरस पति है।
आर्य संस्कृति का चरित्र है- “न मरने की इजाजत है न फरियाद की है। घुट घुट कर मर जाएं यही मर्जी मेरे सैयद की है”। दिल्ली राज्य के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने आर्य संस्कृति की डूबती हुई नैया को बचाने के लिए राजेंद्र पाल गौतम से इस्तीफा मांगा होगा।
देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विदेशों में जाकर कभी यह नहीं कहते कि वे राम की धरती भारत से आए हैं बल्कि वे वहां बुद्ध की धरती से आए हैं और अपने भारत में लुका छुपी और दबी जबान से रामराज्य और हिंदू राष्ट्र का राग अलापते हैं ।। विदेशों में वे बुद्ध के सहारे अपना परिचय देते हैं कि वे बुद्ध की धरती भारत से आए हैं क्योंकि भारत का गौरवशाली इतिहास तथागत बुद्धा से है राम से नहीं क्योंकि राम रामायण का एक काल्पनिक पात्र हैं। अरविंद केजरीवाल के जय भीम के नारे व चुनाव चिन्ह झाड़ू में राजनीतिक सत्ता विद्यमान है।एक उत्तरी भारत में कहावत है,”मुंह में राम बगल में छुरी” यही सब देश में चल रहा है अर्थात “जय भीम बोलो जहां चाहो वहां होलो” जिसे भारत का मूल निवासी आज तक समझ नहीं पाया है। इसलिए वह बार-बार इन आर्य पुत्रों से छला जाता है। यदि आर्य पुत्रों में जरा भी दमखम हो तो जैसे डॉक्टर अंबेडकर के अनुयायियों ने बौद्ध दीक्षा लेते समय प्रतिज्ञा की कि वे ब्रह्मा विष्णु महेश को ईश्वर नहीं मानेंगे उसी तरह देश के प्रधानमंत्री व दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल यह घोषणा करें कि वे तथागत गौतम बुद्ध, फूले, अंबेडकर को नहीं मानेंगे उन्हें दिन में ही आकाश के तारे नजर आने लगेंगे। ऐसी घोषणा मात्र से ही उन्हें अपनी ताकत का एहसास हो जाएगा। तथागत बुद्ध, फूले और अंबेडकर तीनों महापुरुष इन आर्य पुत्रों के लिए आज विज्ञापन है जिसे मूलनिवासी बहुजन समाज समझ नहीं पाता। जिन्हे मूलनिवासी बहुजन समाज अब मानने के लिए तैयार नहीं फिर भी “मान न मान मैं तेरा मेहमान की रणनीति में आर्यपुत्र आज भी सफल हैं। डॉक्टर अंबेडकर ने बड़े साफ शब्दों में कहा है “धर्म मनुष्य के लिए है,मनुष्य धर्म के लिए नहीं है” समता, ममता, करुणा और मैत्री धर्म है। जिस देश का सर्वोच्च न्यायालय हिंदू शब्द को इस धारणा के साथ नकार दिया है कि हिंदू शब्द “गाली गलौच” है फिर गाली गलौज को त्याग कर यदि कोई समता, ममता, करुणा और मैत्री का धर्म अपनाता है तो उन पर प्रहार क्यों? भारत का संविधान देश के हर नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में एक कहावत है “बांधे बनिया बाजार न सजी”अर्थात जो बनिया बाजार को सजाता है यदि उसको बांध कर रखोगे तो बाजार न सौदों से सजेगी और न बाजार में माल ही होगा और न तुम्हारा धंधा ही चलेगा चाहे वह धर्म का धंधा हो अथवा कोई और धंधा हो। यदि बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर के अनुयाई बेड़ियों के धर्म को नकार कर बेड़ी मुक्त धर्म को अपनाते हैं फिर उन पर प्रहार क्यों?







