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सरकारी योजनाओं से आज भी वंचित हैं राघानेसडा के निवासी।
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गुजरात के बनासकांठा का राघानेसडा गांव उन गांवों में एक हैं जो आजादी के सात दशक बाद भी अंधेरा हैं। यह गांव भारत-पाकिस्तान सीमा से मात्र 30 किलोमीटर दूर हैं। जहां बिजली, शिक्षा, रोजगार, खेती आदि की समस्याओं को लेकर ग्रामीण परेशान हैं ।
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गुजरात में चुनाव का माहौल हैं। हमेशा की तरह सत्ता पाने के लिए नेता बड़े-बड़े वादे करते नज़र आ रहे हैं। लेकिन सच तो यह हैं कि आजादी के सात दशक बाद भी गुजरात का एक गांव ऐसा भी हैं जो आज भी अंधेरा हैं। यहाँ के एक पचहतर वर्षीय बुजुर्ग का कहना हैं कि, “मैंने अपनी पचहतर वर्ष के जीवन में आज तक इस गांव में बिजली नहीं देखी हैं !”
बताते चलें कि यह गांव गुजरात के बनासकांठा में स्थित हैं। कई दशकों तक सरकारी योजनाएं इस गांव में नहीं पहुंची। इस राज्य में कई सालों तक कांग्रेस और फिर बीजेपी ने राज किया । लेकिन किसी ने इस गांव की समस्याओं का समाधान करने की नहीं सोची। आज इस गांव में न ही अच्छी शिक्षा की व्यवस्था हैं और न ही युवाओं को ढंग की नौकरी की सुविधा। यहाँ की आबादी का आधे से अधिक आबादी कृषि पर निर्भर हैं । लेकिन वे खेती भी बारिश के भरोसे करते हैं।
हालांकि गांव में एक बड़ा सोलर पार्क बनाया गया हैं। जिससे थोड़ी बहुत काम चलाऊ रोशनी आ जाती हैं। लेकिन सोलर पार्क के पास का यह 200 परिवारों वाले गांव में अब भी पूरी तरह रोशनी नहीं पहुंची हैं।
बीबीसी के अनुसार यह गांव दो सौ परिवारों वाला हैं। जहाँ लगभग एक हजार से अधिक वोटर हैं। लेकिन फिर भी इस गांव की समस्याओं का समाधान आज तक किसी ने नही किया। पूछ-ताछ करने पर गांव वालों का कहना हैं कि उन्होंने अब तक अपने गांव में बिजली नहीं देखी है और इसे वे आख़िरी दर्जे का गांव बताते हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, गांव में बने ऊर्जा पार्क 1400 हेक्टर से ज़्यादा ज़मीन पर 700 मेगावट से ज़्यादा की क्षमता का हैं। यहाँ कई किलोमीटर दूर तक हज़ारों सोलर पैनल्स बिछाए गए हैं। लेकिन इस प्रोजेक्ट से इस गांव वालों का कोई लाभ नहीं मिला।
इन गांव वालों को इस प्रोजेक्ट से न ही बिजली मिली और न ही रोजगार । इतने बड़े प्रोजेक्ट्स के आने से लोगों को उम्मीद थी कि उन्हें रोज़गार मिलेगा, लेकिन गांव वालो के मुताबिक, कुछ लोगों को वहां केवल मज़दूरी का काम और छोटी-मोटी नौकरी ही मिल पा रही है।
ग्रामीणों का कहना हैं कि इस गांव में आज भी शिक्षा की व्यवस्था बेहद चिंताजनक हैं। ग्रामीणों के मुताबिक, यहां ऐसे बहुत कम लोग हैं जिन्होंने 10वीं या 12वीं तक पढ़ाई पूरी की होगी। ज़्यादातर लोग खेती या खेतों में मज़दूरी के काम पर निर्भर हैं ।
बीबीसी के मुताबिक, गांव के सरपंच ने बताया कि, ‘2017 से पहले गांव में सरकारी योजना के तहत सोलर पैनल दिए गए थे, हालांकि उसका लाभ सभी लोग नहीं उठा सके थे। इतने सालों बाद कुछ लोग उन सोलर पैनल्स की बैटरी को बदलवा सके हैं। रात में इस बैटरी से एक-दो बल्ब का मुश्किल से कुछ देर के लिए इंतज़ाम हो पाता है।’ उन्होंने कहा कि गांव की समस्याओं को लेकर वे कई बार अधिकारियों के सामने अपनी बात रख चुके हैं। लेकिन अभी तक कुछ हल नहीं निकला।







