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छह साल बाद नोटबन्दी पर एक नज़र।
कितनी सफल रही मोदी सरकार की नोटबन्दी ?
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वर्ष दो हजार सौलह में नोटबन्दी के फायदे गिनाकर प्रधानमंत्री मोदी ने पुराने 500 और 1000 के नोटो को बंद कर दिया था। उसके पीछे कई उद्देश्यों को बताया गया था। लेकिन क्या सरकार उन उद्देश्यों को प्राप्त करने में सफल हुई हैं?
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8 नवंबर, 2016 में भारत सरकार ने नोटबन्दी की घोषणा की गई थी। इसके पीछे उन्होंने नोटबन्दी के फायदों को जनता के सामने रखा था। जिस पर आगे विचार करेंगे। और इस बात पर भी चर्चा करेंगे कि सरकार जिन उद्देश्यों को नजर में रखकर नोटबन्दी की घोषणा की थी उसमें सरकार कितना सफल रहीं ? या फिर नोटबन्दी पर पूरी तरह विफल रही मोदी सरकार ?
नोटबन्दी के पक्ष में सरकार की सबसे बड़ी दलील थी कि इस फैसले से सिस्टम से काला धन पूरी तरह खत्म हो जायेगा। लेकिन इस उद्देश्य में सरकार पूरी तरह विफल रहीं।
वर्ष दो हजार सतरह में इस पर जानेमाने वरिष्ठ अर्थशास्त्री झुनझुनवाला ने कहा था कि, ” मैं इसे असफल मानता हूं। नोटबंदी का उद्देश्य काले धन को सिस्टम से बाहर करना था, अगर वो किसी न किसी रूप में बैंक में आ गया तो इसका मतलब है कि धन किसी तरह से काले धन में बदला गया है और सफेद धन बनकर बैंकिंग सिस्टम में आ गया है। ये इसकी असफलता दर्शाता है।”
नोटबन्दी का अगला जो सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य था, वो था डिजिटलीकरण का । यानी नगदी खरीद-बिक्री की व्यवस्था को कम करके, अधिक से अधिक खरीद बिक्री की प्रक्रिया को ऑनलाइन करना। लेकिन आज भी लोगो का एक बड़ा हिस्सा ऑनलाइन ट्रांजेक्शन की प्रक्रिया से अछूता हैं।
हां ये सच हैं की ऑनलाइन लेनदेन में वृद्धि हुई हैं। लेकिन इसका असर बहुत कम, एक ऐसे वर्ग तक हुवा हैं जो ज्यादातर शहरों में रहते हैं। आज भी गांवों में अधिकतर लोग नगदी से ही लेनदेन करते हैं।
नोटबन्दी में पुराने 500 और 1000 रुपये के नोटो के बदले नए 500 और 2000 के नोट छापे गए। नए नोटो की छपाई में आए खर्चे को कई लोग इसे घाटे का सौदा समझते हैं।
जिन उद्देश्यों के लिए सरकार ने नोटबन्दी की थी आज वे उन उद्देश्यों से कोषों दूर हैं। आज सिस्टम में काले धन के साथ भ्रष्टाचार भी तेजी से फल-फूल रहा हैं। आतंकी गतिविधियां भी तेजी से बढ़ रही हैं। इन सबके अलावा नोटबंदी में आम लोगो को हुई परेशानियां वो अलग थी।






