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बीते 26 मार्च, 2023 को चिपको दिवस के अवसर पर अम्बेडकर भवन, गोपेश्वर में दिशूम फ़ॉर चिशूम ग्रुप के साथ बामसेफ, मूलनिवासी संघ और मूलनिवासी विद्यार्थी संघ ने संयुक्त बैठक की। जिसमे बीएसफोर (भारतीय संविधान सम्मान, सुरक्षा संवर्धन ) पर विशेष चर्चा हुई। अंत मे बैठक में उपस्थित सदस्यों द्वारा यह संकल्प लिया गया कि भारतीय संविधान की सुरक्षा करना हम सब का दायित्व हैं।
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उत्तराखंड के गोपेश्वर में स्थित अम्बेडकर भवन में बीते 26 मार्च, 2023 को दिशूम फ़ॉर चिशूम ग्रुप, बामसेफ, मूलनिवासी संघ और मूलनिवासी विद्यार्थी संघ ने संयुक्त रूप से बैठक की।
मू० सुपिया सिंह राणा की अध्यक्षता में यह बैठक सफलतापूर्वक संपन्न हुई। वही इस सभा मे मुख्य अतिथि के रुप में मू० सुनीता कपरवाल, विशिष्ट अतिथि के रूप में मू० पुष्कर बैछवाल, मू० गुड्डी गडोरिया, मू० गिरीश आर्य, सेवास्तम के अध्यक्ष मू० धरवीर शैलानी, मू० आशा टम्टा समेत आदि उपस्थित रहे ।
इस बैठक में पूरे भारत मे चल रहे राष्ट्रीव्यापी महाअभियान बीएसफोर यानी भारतीय संविधान सम्मान, सुरक्षा , संवर्धन के बारे में चर्चा हुई। उपस्थित संविधान प्रबोधकों द्वारा इस राष्ट्रीव्यापी महाअभियान के विषय मे विशेष जानकारी दी गयी।
वक्ताओं ने भारतीय संविधान में लिखित मौलिक अधिकारों औऱ नीतिनिर्देशक तत्व के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि क्यों हमे भारतीय संविधान का सम्मान , सुरक्षा और संवर्धन करना चाहिए?
वक्ताओं के बातों को सुनने के बाद कई लोगो ने संविधान प्रबोधक बनने में अपनी रुचि दिखाई। जिन्हें संविधान प्रबोधक बनाया गया। उपस्थित सभी सदस्यों ने यह संकल्प लिया कि भारतीय संविधान की सुरक्षा करना हम सब का दायित्व हैं।
इस संयुक्त बैठक में विश्व प्रसिद्ध चिपको आंदोलन की अगुवाई करने वाली चिपको वुमन के नाम से प्रसिद्ध यशकयी गौरा देवी और गोबिंद रावत को पर्यावरण के क्षेत्र में उनके द्वारा किये गए उल्लेखनीय कार्य की सराहना करते हुए उन्हें याद किया गया
बताते चलें की चिपको आंदोलन खेल सामग्री निर्माता कंपनी के ठेकेदारों द्वारा पेड़ो को काटने से रोकने का आंदोलन था। 24 मार्च, 1976 को रैणी के जंगलों के चौबीस हजार पेड़ो को काटने का आदेश दिया गया ।
लेकिन पेड़ काटने के लिए जैसे ही मजदूर जंगल की तरफ बढ़ने लगे वैसे ही गौरा देवी की अगुवाई में महिलाएँ पेड़ो के साथ चिपक गई। इसी लिए यह आंदोलन ‘चिपको आंदोलन’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। महिलाओ का कहना था कि , पेड़ों को काटने से पहले आरी उनके शरीर पर चलेगी ।
जिसके बाद कंपनी के मजदूरों को मजबूरन वहाँ से भागना पड़ा और यह आंदोलन सफल हुआ। भले ही गौरा देवी 1991 में दुनिया को अलविदा कह गयी । लेकिन उनके कार्य को भुलाया नहीं जा सकता।
चिपको वूमन के नाम से प्रसिद्ध गौरा देवी कहती थी कि, “जंगल हमारी माता के घर जैसा है। यहां से हमें फल ,फूल ,सब्जियां मिलती हैं। अगर यहां के पेड़ – पौधे काटोगे तो निश्चित ही बाढ़ आएगी।







