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1993 से 2022 तक 1,035 मैनुअल स्कैवेंजर (हाथ से मैला ढोने वाले) की मौत।
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इस देश में हाथ से मैला ढोने की प्रथा पुरानी हैं। लेकिन मैला ढोने की प्रथा पर प्रतिबंध लगने के बाद भी आज भी लोग हाथ से मैला ढोने का काम करते हैं। जिससे हर साल कई लोगो की मौत की ख़बर निकल कर सामने आती हैं। आंकड़े यह भी बताती हैं कि हाथ से मैला ढोने वाले लगभग सभी लोग एससी, एसटी औऱ ओबीसी वर्ग से आते हैं।
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हाथ से मैला ढोने की प्रथा इस देश मे पुरानी रही हैं। लेकिन आज भी हाथ से मैला ढोने का काम देश के मूलनिवासी वर्ग के लोग करते हैं। आंकड़ो के मुताबिक मैनुअल स्कैवेंजर के रूप में 58,000 लोगों की पहचान की गई हैं जो हाथ से मैला ढोने का काम करते हैं।
इन 58 हजार लोगों में 97 प्रतिशत लोग अनुसूचित जाति से संबंधित हैं। जबकि बाकी अनुसूचित जनजाति औऱ पिछड़े वर्ग से संबंधित हैं। आंकड़ो के मुताबिक, जिन 58,098 व्यक्तियों की मैनुअल स्कैवेंजर के रूप में पहचान हुई है, उनमें से 43,797 लोगो के जाति से संबंधित आंकड़े उपलब्ध हैं। जिनमे 42,594 यानी 97 प्रतिशत से भी ज्यादा मैनुअल स्कैवेंजर अनुसूचित जातियों से संबंध रखते हैं।
इसके अलावा 421 लोग अनुसूचित जनजातियों से, 431 अन्य पिछड़े वर्गों यानी ओबीसी से और 351 अन्य वर्गों से हैं।
बताते चलें कि पहली बार 1993 में मैला ढोने की प्रथा पर प्रतिबंध लगाया गया था। इसके बाद 2013 में कानून बनाकर इस पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया था। लेकिन आज भी समाज में मैला ढोने की प्रथा मौजूद है और आए दिन सीवर सफाई के दौरान लोगों की मौत की खबरें आती रहती हैं।
आंकड़ो के मुताबिक, साल 1993 के बाद से पूरे भारत में सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान कुल 1,035 लोगों की मौत हुई है। जबकि 2018 से 2022 के दौरान 308 लोगो की मौत सीवर या सैप्टिक टैंक की सफाई के दौरान हुई हैं।







