अमृत काल की आर्थिक असमानता ब्रिटिश शासन से अधिक खतरनाक।

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वर्तमान समय में भारत की आर्थिक असमानता उन्नीस सौ सैंतालीस के आजादी के पहले की आर्थिक असमानता से कई अधिक हैं। रिपोर्ट बताती हैं कि, वर्तमान में भारत की आर्थिक असमानता की स्थिति ब्रिटिश राज की आर्थिक असमानता से कई गुना अधिक हैं।

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हाल ही में जारी वर्ल्ड इनक्वॉलिटी डेटाबेस की रिपोर्ट बताती हैं कि, मोदी कार्यकाल के अमृत काल में आर्थिक असमानता ब्रिटिश राज से भी अधिक है।

आंकड़ों के मुताबिक वर्तमान में भारत की कुल संपत्ति का लगभग चालीस फीसदी हिस्सा मात्र एक फ़ीसदी सबसे अमीरों के पास सिमट चुकी हैं।

वर्ल्ड इनक्वॉलिटी डेटाबेस के भारत से संबंधित आर्थिक असमानता पर लिखे गए रिपोर्ट के मुताबिक, सन उन्नीस सौ बाईस (1922) में भारत के शीर्ष एक प्रतिशत अमीरों की कुल आय में हिस्सेदारी तेरह फीसदी (13%) थी, जो उन्नीस सौ चालीस (1940) में बढ़कर बीस फीसदी (20%) हो गई थी।

जबकि वित्तीय वर्ष दो हजार बाईस-तेईस ( 2022-23 ) आते-आते शीर्ष एक प्रतिशत अमीरों के पास भारत की कुल आय का बाईस दशमलव छह ( 22.6 ) प्रतिशत हिस्सा आ चुका हैं। जबकि कुल संपत्ति का चालीस दशमलव शून्य एक ( 40.01 ) प्रतिशत हिस्सा शीर्ष एक फ़ीसदी अमीरों के पास सिमट कर रह गई हैं।

वर्ल्ड इनक्वॉलिटी डेटाबेस द्वारा जारी रिपोर्ट का शीर्षक, भारत में आर्थिक असमानता: ‘अरबपति राज’ हैं। जिसे नितिन कुमार भारती, लुकास चैन्सल, थॉमस पिकेटी और अनमोल सोमंची ने लिखा है।

रिपोर्ट के मुताबिक, भारत अब ब्रिटिश औपनिवेशिक राज से भी अधिक असमान है । मतलब भारत की आर्थिक असमानता में अरबपतियों का राज है।

अरबपतियों के राज में चल रहा भारत अंग्रेजों की गुलामी के दौर से भी ज्यादा आर्थिक असमानता वाला देश बन गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, जब भारत में अंग्रेजों की हुकूमत थी तब सन उन्नीस सौ बाईस में भारत के शीर्ष एक प्रतिशत अमीरों की कुल आय में हिस्सेदारी तेरह फीसदी (13%) थी।यह आंकड़ा उन्नीस सौ चालीस (1940) में बढ़कर बीस फीसदी (20%) हो गई।

जबकि साल दो हजार बाईस – तेईस (2022-23) आते-आते भारत में अमीरी और गरीबी की खाई इतनी ज्यादा बढ़ गई कि शीर्ष एक प्रतिशत अमीरों के पास भारत की कुल आय का बाईस दशमलव छह (22.6) प्रतिशत हिस्सा और कुल संपत्ति का चालीस दशमलव शून्य एक (40.01) प्रतिशत हिस्सा है।

यह आंकड़े सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के उन दावों का खण्डन करती हैं जिन दावों में वे भारत को सबसे समृद्ध और विकसित देशों की सूची में गिनवाते हैं।

केंद्र सरकार वर्तमान समय को अमृत काल बताती हैं, लेकिन यह कैसा अमृत काल हैं? जहा मात्र एक फ़ीसदी अमीरों के पास देश की लगभग आधी संपत्ति हैं। जबकि अस्सी करोड़ लोग पांच किलो प्रति माह मिलने वाले चावल पर निर्भर हैं।

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