बौद्ध धर्म के प्रति क्या था बाबा साहेब का नज़रिया?

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बाबा साहेब के आंदोलन ने कैसे पकड़ी गति?

बाबा साहेब बुद्ध की शरण मे ही क्यों गए?

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मूलनिवासियों के बुद्ध की शरण मे जाने से मनुवादियों और मनुवादी मीडिया में कितनी हलचल है ये तो आप देख ही रहे होंगे । लेकिम आज हम उस समय की बात करेंगे जब बाबा साहेब ने बुद्ध की शरण मे जाने का मन बनाया था। साथ ही जानेंगे कि आखिर बाबा साहेब ने अपने अनुयायियों से क्या कहा? और हिन्दू धर्म से आखिरकार बौद्ध धर्म मे ही क्यों गए?

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बाबा साहेब ने शुरू से ही हिन्दू धर्म के ग्रंथों का गहन अध्ययन किया हैं। जिसे उन्हें उनके समाज के लोगो की दयनीय स्थिति का कारण और इस दलदल से बाहर निकलने का समाधान बहुत पहले ही मिल गया था, जो था हिन्दू धर्म का त्याग।

लेकिन बाबा साहेब के सामने सबसे बड़ा सवाल था कि आखिर हिन्दू धर्म से निकलकर किस धर्म को अपनाया जाए। जहा मेरे समाज के लोगो को वे सारे हक अधिकार मिले जो हजारों साल से हिन्दू धर्म मे नहीं मिला। उन्होंने सभी धर्मों के ग्रंथों का गहन अध्ययन करना शुरू किया।

बाबा साहेब ने उन्नीस सौ छप्पन में अपने लाखो अनुयायियों के साथ भले ही बौद्ध धर्म को अपनाया । लेकिन बुद्ध का प्रभाव बाबा साहेब पर वर्षो पहले से रह है। उन्होंने कई किताबें और लेख लिखकर ये तर्क देते रहे थे कि क्यों अपृश्यों के लिए बराबरी पाने के लिए बौद्ध धर्म ही क्यों एकमात्र रास्ता हैं।

उन्नीस सौ पैतीस में बाबा साहेब ने अपने भाषण से शोषितों की आंखे खोल दी । उन्होंने अपने इस भाषण से मनुवादियों के सदियों के वर्चस्व को चुनौती दी।
उन्होंने उस भाषण में साफ शब्दों में कहा था कि ताकत चाहते हैं, सत्ता और समानता चाहते हैं तो धर्म बदलिए। उस भाषण में उन्होंने कहा था की, “आप एक सम्मानजनक जीवन चाहते हैं तो आपको अपनी मदद खुद करनी होगी और यही सबसे सही मदद होगी, अगर आप आत्मसम्मान चाहते हैं, तो धर्म बदलिए। अगर एक सहयोगी समाज चाहते हैं, तो धर्म बदलिए। अगर ताकत और सत्ता चाहते हैं, तो धर्म बदलिए। समानता , स्वराज , और एक ऐसी दुनिया बनाना चाहते हैं, जिसमें खुशी-खुशी जी सकें तो धर्म बदलिए।

बाबा साहेब ने कहा था कि, “मैं हिंदू धर्म में पैदा ज़रूर हुआ, लेकिन हिंदू रहते हुए मरूंगा नहीं।” उन्नीस सौ पैतीस के भाषण में ही अंबेडकर ने यह साबित कर दिया था कि वे हिंदू धर्म छोड़ देंगे । हालांकि बाबा साहेब के इस भाषण का कई लोगो ने विरोध भी किया लेकिन बाबा साहेब ने लगभह बीस साल बाद अपनी बातों को सही साबित किया और चौदह अक्टूबर उन्नीस सौ छप्पन में अपने लगभग चार लाख अनुयायियों के साथ दीक्षाभूमि नागपुर में हिन्दू धर्म का त्याग कर बौद्ध धर्म को अपना लिया।

अक्सर ये सवाल उठता रहा कि आखिर, बाबा साहेब ने बौद्ध धर्म को ही क्यों अपनाया। इसका जवाब बाबा साहेब ने खुद दिया है। साल उन्नीस सौ चालीस में अपने अध्ययन के आधार पर डॉ० अंबेडकर ने “द अनटचेबल्स” में लिखा कि, भारत में जिन्हें अछूत कहा जाता है, वो मूल रूप से बौद्ध धर्म के अनुयायी थे। ब्राह्मणों ने इसी कारण उनसे नफरत पाली।

इसके बाद अंबेडकर ने उन्नीस सौ चौवालीस में मद्रास में एक भाषण में कहा और साबित किया कि बौद्ध धर्म सबसे ज़्यादा वैज्ञानिक और तर्क आधारित धर्म है। कुल मिलाकर बौद्ध धर्म के प्रति बाबा साहेब का झुकाव और विश्वास बढ़ता रहा। आज़ादी के बाद संविधान सभा के प्रमुख बनने के बाद बौद्ध धर्म से जुड़े चिह्न अंबेडकर ने ही चुने थे।

लेकिन बाबा साहेब के मृत्यु के बाद उनका आंदोलन जैसे थम सा गया। लेकिन आज बामसेफ, मूलनिवासी संघ आदि जैसे संगठन बाबा साहेब के आंदोलन को निरंतर गति प्रदान कर रहे हैं । और इसका परिणाम यह रहा कि बीते पांच अक्टूबर दो हजार बाईस में दस हजार लोगों ने दिक्षाभूमि नागपुर में बुद्ध धम्म की दीक्षा ली और यह सिलसिला लगातार चल रहा हैं।

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