अनुकरण उनका किया जाता है जिनका चरित्र होता है। चरित्रवान और नैतिक लोग ही समतावादी व्यवस्था का निर्माण करते हैं। मूलनिवासी बहुजन समाज का इतिहास ऐसे प्रेरणादायी महानायक और महनायिकाओं की सुवर्णगाथाओं से सुसज्जित है। मध्ययुगीन इतिहास काल में कुलवाड़ी भूषण छत्रपति शिवाजी महाराज ने 16 वी शताब्दि में अपने कर्तुत्व, नैतिकता और संगठन के बल पर समताधिष्टित राज्य स्थापित किया। जिसका आधार स्वतंत्र,समता बंधुत्व और न्याय जैसे मूल्य थे। इस राज्य को उन्होंने रैयत का राज्य कहा। जिसे हम हिंदी में लोगों का राज्य, जनता का राज्य और अंग्रेजी में पीपल्स पावर या पीपल्स रूल कह सकते हैं।
राजे शहाजी और माँ जिजाऊ के घर 19 फरवरी 1630 को महाराष्ट्र के पुणे स्थित शिवनेरी किलेपर शिवाजी का जन्म हुआ। किला शिवनेरी बौद्ध गुंफाओं से घिरा होगा है। घर का माहौल नैतिकता के मूल्यों से अनुशासित और आचारणशील था। वारकरी धर्म के प्रभावित वातावरण में बाल शिवाजी पले-बढ़े। पिताजी शहाजी राजे आदिलशाही के रिहासत में सरदार की ज़िम्मेदारी के कारण अपने परिवार के साथ कर्नाटक में स्थायी हुए। 12 साल तक कर्नाटक में रहने के बाद 1642 में माता जिजाऊ के साथ बाल शिवाजी बंगरुल से पूना आये. पुणे से राजे शहाजी अपनी रियासत चलना चाहते थे।राजे शाहजी के मन में स्वतंत्र राज्य की संकल्पना थी. माँ जिजाऊ ने भी बाल शिवाजी द्वारा आदर्श राज व्यवस्था के सपनों को पूरा करने की कोशिश की और ठीक उसी तरह का प्रशिक्षण दिया। माँ जिजाऊ ने बाल शिवाजी को केवल युद्धशास्त्र का ही प्रशिक्षण नही दिया बल्कि इसके साथ ही नैतिकता के पाठ भी पढ़ाए। नारी का सम्मान, जातिवाद का धिक्कार और किसानों के हितों को सर्वपरी मानकर उस तरह के नैतिकता के बीज बोये। शिवाजी भी उनकी कसौटी पर खरे उतरे। युवा अवस्था में ही उन्होंने अपने कर्तुत्व और आचरण के बल पर माता पिता का विश्वास सिद्ध किया।
जब युवा राजे शिवाजी महाराज अपने माता और पिता के सपनों का राज स्थापित करने में जुट गए तब उन्हें मोगल और अन्य मराठा सरदारों से संघर्ष करना पड़ा। एक-एक किला, दुर्ग को उन्होंने उनसे जित लिया। पुराने और दुर्लक्षित किलों की मरम्मत करके उन्हें ठीक किया। इस तरह से अपना राजकारोबार प्रारंभ किया। छत्रपति शिवाजी महाराज का शासन आम जनता को बेहद प्रिय था। उनके राज्य में प्रत्येक व्यक्ति “यह राज्य मेरा अपना है” यह अनुभव करता था। यह एक प्रकार का लोकतंत्र का ही अनुभव था। उनके साथ जो साथी थे वे अपनी जाती और धर्म को दूर रखकर कंधे से कंधा मिलाकर काम करते थे। मावल प्रान्त में रहने के कारण उनको ‘मावला’ इस नाम से जाना जाता था। ‘यथा राजा तथा प्रजा’ जैसे राजा बर्ताव करता है वैसे ही प्रजा अनुकरण करती है। छत्रपति शिवाजी महाराज आदर्शवादी थे। उनको आदर्श गुरु तुकोबाराय से मिला। इस आदर्शवादी राजा और संत की कारण कारण जानता भी आदर्शवादी बनी थी। न्याय, स्वतंत्रता, समता, बंधुता का प्रतिबिम्ब था।
आज जब देश को हिन्दू और गैर हिन्दू की राजनीति करके शासक जातियां सत्ता में बने रहना चाहते हैं लेकिन छत्रपति शिवाजी महाराज का राजकाज सभी नागरिकों का था। ठीक भारत के आज के लिखित संविधान जैसा ही था। भारत के संविधान में अनुच्छेद 15 (१) में लिखा है की राज्य किसी नागरिक के साथ धर्म, वंश, जाति या जन्मस्थल के आधार पर भेदभाव नहीं करने देता, लेकिन अगर नारी, बच्चे और शोषित तथा वंचित तबके के लोगों विशेष रूप से प्रावधान करने लिए कहता है। ठीक यही बात छत्रपति शिवाजी महाराज के राजकाज में दिखाई देती है।
छत्रपति शिवाजी महाराज की राज्य व्यवस्था का बाबासाहब डॉ. अम्बेडकर द्वारा लिखित संविधान के नजरिया से विश्लेषण करते है तो सही मायने में वे प्रजा के राजा सिद्ध होते है। संविधान का आर्टिकल 15 (1) कहता है कि राज्य,किसी भी नागरिकों के साथ धर्म, वंश,जाति, लिंग या जनस्थल के आधार पर भेद नही किया जाएगा। लेकिन आज कुछ समाजविरोध लोग शिवाजी महाराज को मुस्लिम विरोधी चित्रित करने की नाकाम कोशिश करते हैं। लेकिन वास्तविक सत्यता कुछ अलग ही है। शिवाजी महाराज के तोफखाना का प्रमुख एक मुस्लिम था, जिसका नाम था इब्राहिम खान। नौसेना का प्रमुख दर्या सारंग दौलतखान,अंग रक्षक मदारी मेहतर। इसके अलावा कई मुस्लिम साथियों के नाम गिनाये जा सकते हैं जैसे की काजी हैदर, सिद्दी हिलाल इन विश्वसनीय साथियों ने शिवाजी महाराज का साथ दिया। कई लोगों ने शिवाजी महाराज के लिए अपने जान की कुर्बानी दी। मोगल मुस्लिम थे, उनके साथ शिवाजी महाराज का संघर्ष हुआ, उसमें इन सभी मुस्लिम साथियों ने छत्रपति शिवाजी महाराज का साथ दिया। वहां मोगल और अन्य मुस्लिम शासकों के साथ मिर्जा राजे जयसिंह जैसे लोग औरंगजेब के साथ थे और शिवाजी महाराज के खिलाफ लड़ रहे थे। अफजलखान के रक्षक कृष्णा भास्कर कुलकर्णी नाम का ब्राह्मण ने शिवाजी महाराज को मारने के लिए जानलेवा हमला किया था। इससे यही सच सामने आता है कि उनकी लड़ाई मोगल तथा अन्य मुस्लिम राजाओं के साथ हुयी जोकि धर्म के नाम पर नही बल्कि सत्ता स्थापित करने के लिए यह संघर्ष था। छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा एक भी मस्जिद गिराई जाने का सबूत या टिप्पणी नही। इसके विपरीत उन्होंने मुसलमान प्रजा के लिए रायगढ़ किले पर मसजिद बांधी थी। उनके द्वारा मसजिद को सरकार के तिजोरिसे दान दिया जाने के कई सबूत ईतिहास के पन्नों में दर्ज है। अफजल खान की समाधी प्रतापगढ़ किले पर बांधकर वहां धूपबत्ती की व्यवस्था की। मुस्लिम साधु, पीर-फकीरों का वे सम्मान करते थे। याकूब बाबा को तो उन्होंने अपना गुरु ही माना था। शिवाजी महाराज का चरित्र और व्यवहार इतना स्वच्छ था कि उनके इस बर्ताव से उनके समकालीन विरोधक भी कायल थे।
उनके राज्य की रैयत में सभी धर्मों के लोगों का सहवास था, वारकरी धर्म, वैष्णव धर्म, शैव धर्म, लिंगायत धर्म के साथ-साथ मुस्लिम धर्म के नागरिक थे। यह लोग खेती और अन्य कामकाज करते थे। जैसे की खेती के और यूद्ध के अवजार बनाना, धातु और मिट्टी के बर्तन बनाना, जेवरात गढ़ना, कपडे तैयार करना, पशुपालन करना ऐसे कई काम लोग करते थे। शिवाजी महाराज ने इन सभी को महत्व दिया। उन्होंने खेती से जुड़े उद्यम और व्यापार को बढ़ावा दिया। खेती पर विशेष ध्यान दिया. शिवाजी महाराज स्वयं एक किसान थे। श्रमण परम्परा के अनुसार श्रम का सम्मान उनके मन और व्यवहार था। हल जोतना, बीज बोना और खेती के सभी काम वे बाल्यावस्था से ही सिख गए थे। खेती के साथ उनका ऐसा रिश्ता था जैसे एक माँ और बच्चे का का होता है। कई उजड़े गांवों को उन्होंने फिर से बसाया था। जमीन जोतने वालों को कृषि औजार और बीज देकर खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया। ठेकेदारों और जमींदारों की मनमानी पर उन्होंने महाराज ने रोक लगाई थी। युद्ध के समय किसी किसानों के फसल का नुकसान ना हो इस बात के प्रति वे गंभीर थे। युद्ध के वक्त ही नहीं बल्कि युद्ध नहीं होता था तब भी इसके प्रति वे इतने गंभीर और सजग की उन्होंने अपने सैनिकों को हिदायत दी थी की किसानों के सब्जी की एक कली को भी नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए, तथा सैनिकों ने अपनी उपजीविका की चीजें खरीदने के लिए कहा था। वे सैनिकों को तनख्वाह देते थे।
जनता के प्रति हमेशा सजग रहनेवाले राजा के रूप में शिवाजी महाराज लोगों के दिल में बसे थे। सर्वसाधारण जनता के लिए शासन संचालन हेतु सेना और प्रजा के बीच उनके गहरे संबंध थे। स्वराज की कृषि के साथ ही,वाणिज्य-उद्दोमों की भी महाराज चिंता करते थे। महाराष्ट्र में डच व्यापारी व्यापार करते थे। उन्होंने व्यापार करने की अनुमति मांगी थी।तब महाराज ने अनुमति प्रदान कर दी।और साथ ही कुछ प्रतिबंध भी लगाये।उनमे कर भी शामिल है। 24 अगस्त 1677 को लिखित करारनामा आज भी हमारे लिये पथ दर्शक है।
कहा जाता है की उसवक्त मोगलों का राज्य था अर्थात मुगलशाही थी। लेकिन यह वास्तविक सच्चाई नहीं है, वास्तविकता तो यह है की मोगलों की सत्ता के आड़ उनके सरदारों, सुभेदारों की सामंतशाही इस देश में राज कर रही थी। इस सामंतशाही में महिलाओं की प्रतिष्ठा और मान-सम्मान का कोई मूल्य नही था। विशेषकर उन महिलाओंका जो गरीब, शोषित वंचित समुदाय से थीं। सरदार, सुभेदार, वतनदार, जमींदार, मुखिया, कुलकर्णी आदि का दृष्टिकोन था कि ऐसे गरीबों शोषितों वंचितों की बहू-बेटियां उनकी उपभोग्य वस्तुएं है। मोगलों की सत्ता के साथ साथ इनसे सामान्य लोग परेशान थे की जिनके हाथ मे सूबों का न्याय था वही इज्जत लूट थे। ऐसी परिस्थिति में इनसे न्याय की अपेक्षा करना व्यर्थ हो गया था।
किंतु ऐसे युग में छत्रपति शिवाजी महाराज का नारी के तरफ देखने का दृष्टिकोण ही बिल्कुल भिन्न था। वे मानवी मूल्यों के पक्षधर होने के कारण नारी को अपनी माँ के समान देखते थे। रांझा के पाटिल का प्रकरण इतिहास के पन्नों में दर्ज है। हुआ यह था कि गरीब किसान की बेटी का दिन दहाड़े सबके सामने अपहरण कर किया गया था।उस इज्जतदार लड़की ने अपमानित जीवन जीने की बजाये उसने मौत को गले लगाना ठीक समझा और उसने आत्महत्या कर ली। यह बात जब शिवाजी महाराज तक पहुंची तो उन्होंने राँझा के पाटिल के हाथ-पैर तोड़ने की सजा दी। ऐसे न्यायप्रिय राजा के लिये जनता जान न्यौछावर नहीं करेगी तो आश्चर्य किस बात का?
ऐसी ही दूसरी घटना – कल्याण के सूबेदार की बहू को बंदी बनाकर महाराज दरबार मे प्रस्तुत किया जाता है। तभी उन्हें अपनी माँ की याद आती है। महाराज कहते है ,” यदि हमारी माँ इतनी सुंदर होती तो हम भी इतने ही सुंदर होते !” उसके संबंध में अशोभनीय बातें न बोलकर और उसके साथ दुर्व्यवहार न करके उसे साड़ी-चूड़ी पहना कर इज्जत के साथ वापस भेजा जाता है। नारी को वे अत्यंत सम्मान देते थे।
तीसरी घटना रायगढ़ किले की है। हिरकनि नामक महिला जब रायगढ़ के बाजार में घी-दूध बेचे आयी थी। बाजार का समय होने के बाद अँधेरा होने के कारण गढ़ के दरवाजे बंद हुए थे। इस हिरकनि का दूधपीता बच्चा घर में था, उसकी याद में हिरकनि रायगढ़ किले के एक कठिन खाईनुमा जगह से वह निचे उतर गयी। जब शिवाजी महाराज को पता चला तो उन्होंने हिरकनि का सत्कार किया और उस जगह एक बुरुज बनाकर उसको हिरकनि का नाम दिया।
छत्रपति शिवाजी महाराज और उनके लिए जान न्यौछावर किये हुए अनेक साथियों का इतिहास आज भी अनसुना है। सच्चा इतिहास बताने की बजाय, शिवाजी महाराज के नामपर कई मनगढंत कहानियां बताई जाती है। इसका एक ही उद्देश्य होता है की उनके सच्चे इतिहास को दबाना। विदेशी आर्यों ने हमेशां इसी तरीके से बहुजन नायक-नायिकाओं के इतिहास को दबाने की कोशिश की है। किसी की हत्या की, तो किसी को का ब्राह्मणीकरण किया। पुराणों में बलि राजा की हत्या का उदहारण यही बताता है। महाराष्ट्र में किसानों को आज भी बलि राजा के नाम से पुकारा जाता है। आज अगर हम देखते हैं तो बहुजन प्रतिपालक, कुलवाड़ी भूषण शिवाजी महाराज के साथ वैसे ही कुछ किया जा रहा है। उन्हें हिन्दू धर्मरक्षक, गौ-ब्राह्मण प्रतिपालक के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। लेकिन छत्रपति शिवाजी महाराज ने खुद के राज्य को रैय्यत का राज्य कहा था अर्थात वे रैयत का राजा थे, जनता उन्हें कुलवाड़ी भूषण अर्थात कुलों का भूषण मानती थी। राष्ट्रपिता जोतिबा फुले ने शिवाजी महाराज पर एक पोवाड़ा की रचना की है। इस वीर रस से भरे पोवाड़ा गीत में वे शिवाजी महाराज को “कुलवाड़ी भूषण” कहते है। लोक गीत के अंत में ज्योतिबा पहले जी ने उन्हें “शुद्र के पूत” कहा।
शिवाजी महाराज के कई पत्र उपलब्ध है। उनमें से एक भी पत्र में छत्रपति शिवाजी महाराज ने स्वयं को “गौ-ब्राह्मण प्रतिपालक” नही कहा। उन्हें “क्षत्रिय कुलोतपन्न श्री राजा शिव छत्रपति” कहने के पत्र उपलब्ध है। महाराज के शासन में,ब्राह्मणों के लिए विशेष रियासतें दी गई हो ऐसा कहीं दिखायी नही देता। इसके विपरीत एक अधिकारी को पत्र लिखते वक्त उन्होंने कहा “कौन ब्राह्मण हुआ तो क्या हुआ? अगर वह राज्य के खिलाफ है तो उसकी परवाह नहीं की जायेगी।”
इस बात के पुख्ता साबुत है की महाराष्ट्र के कई ब्राह्मण उनके विरोध में थे तथा विरोधियों को मदद करते थे। मिर्जा राजे जयसिंह जो औरंगजेब एक बड़े सरदार थे वह जब औरंगजेब के कहने पर शिवाजी महाराज के विरोध में सेना लेकर आये थे तब मिर्जा राजे जयसिंह ने रणचंडी यज्ञ किया था और सैकड़ों ब्राह्मणों ने इसका नेतृत्व किया था। इस रणचंडी यज्ञ का उद्देश्य था शिवाजी महाराज का मिर्झाराजे जयसिंह के द्वारा पराभव हो।
जिन सरदारों को मोगल बादशाह ने राजा की उपाधि दी थी वे छत्रपति शिवाजी महाराज को राजा नहीं मानते थे। शिवाजी महाराज ने जो राज्य निर्माण किया वह उन्होंने उनके साथियों के साथ, माँ जिजाऊ और राजा शाहाजी की संकल्पना के अनुसार किया था। इस स्थापित राज्य के बारे में जनता, अन्य राज्यकर्ताओं और व्यापारियों को इस राज्य के नियमों, नए व्यवस्था की, नयी आर्थिक व्यवस्था की जानकारी हो इसके लिए उन्होंने राज्याभिषेक किया, जिसमें डच, पुर्तगाली और अंग्रेज भी शामिल हुए थे। सरदार राजा शाहजी और जिजाऊ का लड़का पातशाह बना यह बात साधारण नहीं थी। लेकिन इस राज्याभिषेक को भी महाराष्ट्र से ब्राह्मण विरोध करते हुए दिखाई दे रहे थे। उन्हें शूद्र कहकर विरोध किया गया। बहुजन प्रतिपालक छत्रपति शिवाजी महाराज का यह अपमान महाराष्ट्र आज तक नहीं भुला है।
बाबासाहब डॉ. अम्बेडकर कहते है, जो इतिहास भूलता है वह इतिहास निर्माण नही कर सकता।” आगे शिवाजी महाराज के वंशज छत्रपति शाहूजी महाराज का भी इसी प्रकार से उनके ब्राह्मण राजपुरोहित ने अपमान किया था। यह प्रकरण वेदोक्त प्रकरण के नाम से जाना जाता है। इस राज पुरोहित को जब शाहूजी महाराज ने नौकरी से निकाल दिया तो कई सारे ब्राह्मणोंने शाहूजी महाराज का विरोध किया। छत्रपति शाहूजी महाराज ने अपने राज्य में ब्राह्मण अधिकारियों की सत्ता देखकर, बहुजन समाज का प्रतिनिधित्व हो इसके लिए उनके लिए खास योजना की। छत्रपति शिवाजी महाराज की रैयत की राज्य की संकल्पना को उन्होंने जाना।
इसी संकल्पना का भारत के संविधान में प्रतिबिंब है। इसको आप भारत के संविधान के प्रस्तावना, मौलिक अधिकार और राज्य के लिए नीतिनिदेशक तत्वों के प्रकरणों में स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। किसान, मजदुर, नारी, बालक, शोषित, वंचित का प्रथम ध्यान भारत के संविधान में रखा गया है। गरीबों की गरीबी समाप्त करने का कार्यक्रम भारत के संविधान में लिखा गया है। भारत के संविधान के मूल हस्तलिखित प्रति में छत्रपति शिवाजी महाराज का चित्र रेखांकित किया गया है।
आज दो विचारधारों का संघर्ष चल रहा है। हम न्याय, स्वतंत्रता, समता बंधुता की विचारधारा के पक्षधर है। यह विचारधारा हमारे पुरखों द्वारा हमे विरासत में मिली है। बहुजन प्रतिपालक कुलवाड़ी भूषण छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन इतिहास से हमें इसी की सिख मिलती है।








