अमेरिकी आयोग ने फिर की भारत को विशेष चिंता वाले देशों की सूची में डालने की शिफारिश।

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भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षो से भारत मे ऐसे कई धार्मिक मुद्दे देखे गए जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की निंदा हुई और हो रही हैं। अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता पर अमेरिकी आयोग की वार्षिक रिपोर्ट ने लगातार चौथी बार भारत को ‘विशेष चिंता वाले’ देशों की सूची में रखने की सिफ़ारिश की हैं।

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हाल में जारी अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट में
अमेरिकी विदेश विभाग से एक बार फिर भारत को विशेष चिंता वाले देशों की सूची में रखने की सिफारिश की हैं।

यही नहीं आयोग ने भारत में सरकारी एजेंसियों और अधिकारियों को धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघन का जिम्मेदार ठहराया है। साथ ही उनकी संपत्तियों से जुड़े लेनदेन और उन्हें अमेरिका में बैन किये जाने की सिफारिश की हैं।

आयोग ने आरोप लगाया है कि पूरे साल भारत सरकार ने राष्ट्रीय, राज्य और स्थानीय स्तर पर धार्मिक तौर पर भेदभाव की नीतियों को बढ़ावा दिया और उन्हें लागू किया। जिसमें धर्मांतरण, अंतर्धार्मिक संबंध हिजाब पहनने और गोहत्या जैसे कानून शामिल हैं। ये कानून मुसलमानों, ईसाइयों, सिखों, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को नकारात्मक तौर से प्रभावित करते हैं।

यह पहली बार नहीं बल्कि ऐसा लगातार चौथी बार देखा गया हैं जब आयोग ने भारत को विशेष चिंता वाले देशों की सूची में रखने की सिफारिश की हैं। आयोग, दो हजार बीस से भारत को इस सूची में शामिल करने के लिए सिफारिश कर रहा है।

हाल में जारी अमेरिकी आयोग की वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया है कि, साल दो हजार बाईस में भारत में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति बिगड़ती रही। राज्य और स्थानीय स्तर पर धार्मिक रूप से भेदभावपूर्ण नीतियों को बढ़ावा दिया गया।

अमेरिकी अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (यूएससीआईआरएफ) के
अध्यक्ष नूरी तुर्केल ने बीते सोमवार को रिपोर्ट जारी करते हुए बाइडेन प्रशासन से अमेरिकी अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग की सिफारिशों को लागू करने का आग्रह किया ।

रिपोर्ट के भारत खंड में आयोग ने कहा कि, भारत के संविधान ने राष्ट्र को एक धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में स्थापित किया और संवैधानिक प्रावधान हैं जो धर्म की स्वतंत्रता प्रदान करता हैं। इन धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों के बावजूद दो हजार चौदह के बाद से भारत सरकार भाजपा के नेतृत्व में ऐसी राष्ट्रीय और राज्य-स्तरीय नीतियों की सुविधा और समर्थन करती है जो अल्पसंख्यक समूहों की धार्मिक स्वतंत्रता को कमजोर करती हैं।

रिपोर्ट ने आरोप लगाया कि, सरकार ने आलोचनात्मक आवाजों, विशेष रूप से धार्मिक अल्पसंख्यकों और उनकी ओर से वकालत करने वालों को निगरानी, उत्पीड़न, संपत्ति ढहाने और गैर-कानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत नजरबंदी के जरिये दबाना जारी रखा ।

बताते चले कि साल दो हजार बाईस में जारी अपनी रिपोर्ट में आयोग ने कहा था कि, ‘दो हजार इक्कीस में भारत में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति काफी खराब हो गई थी। दो हजार इक्कीस में भारत सरकार ने हिंदू राष्ट्रवादी एजेंडा को बढ़ावा देकर ऐसी नीतियों का प्रचार किया, जिससे मुस्लिमों, ईसाइयों, सिखों, अनुसूचित जातियों/जनजातियों और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा हैं।

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