कांग्रेस के दलित और गांधी के हरिजन का ‘आंबेडकरनामा’..दयाराम (राष्ट्रीय उपाध्यक्ष,पी.पी.आई-डी)

एक बार की बात है, मेरे आवास पर मेरे ही विभाग के एक डाकघर के पोस्टमास्टर जो ब्राह्मण थे आए और मेरे कमरे की अलमारी में लगे वेद, पुराण, रामायण, महाभारत, धर्मसूत्र आदि देखकर कहने लगे कि दयाराम जी तुम् तो आज मुझे अंदर से कुछ और बाहर से कुछ नजर आ रहे हो। आज ही मुझे पता लगा कि तुम वास्तव में असली हिंदू हो। आपके घर में मैं जो हिंदू धर्म शास्त्रों को देख रहा हूं, ब्राह्मण होते हुए भी ए सब मेरे घर में नहीं है। आपके अंदर हिंदुत्व कूट-कूट कर भरा हुआ है। फिर भी आप फील्ड में बहकी बहकी बातें क्यों करते हो? मैंने उनसे कहा पंडित जी धन्यवाद आपको। सच्चाई तो यह थी कि जो पंडित जी मेरे बिषय सोचते थे वैसा मैं नहीं था। मैं तो अर्जक संघ और बामसेफ जैसे महान संगठनों की विचारधाराओं का प्रोडक्ट था, जो संगठन ब्राह्मणवाद के विनाश के लिए प्रतिबद्ध हैं। एक कांग्रेसी दलित और गांधी के हरिजन बंन्धु 'आंबेडकरनामा' चलाते हैं। लोग सोचते होंगे की वे सच्चे अंबेडकरवादी हैं। यह उनकी बहुत बड़ी भूल है। 
पूर्वी उत्तर प्रदेश बिहार और झारखंड के गांवों में एक कहावत है- "नाम चीनी प्रसाद लज्जत चोटों की नाहीं" अर्थात नाम चीनी है किंतु उसमें जले हुए गुड़ का भी स्वाद नहीं है। 'आंबेडकरनामा' की यही दशा है क्योंकि 'आंबेडकरनामा' कांग्रेसी दलितवन्धु की उपज है, वह एकमात्र अपने सुनिश्चित उद्देश्य के लिए चलाया गया है। हकीकतन वह 'आंबेडकरनामा' नहीं बल्कि 'दलितनामा' है। 'आंबेडकरनामा' के परिचर्चाओं में कांग्रेसी दलित बंधु बार-बार दलित शब्द का प्रयोग करते हैं जिस पर बाबासाहब डॉक्टर अंबेडकर ने अपने साहित्य संपदा में आपत्ति जताई है। डॉक्टर अंबेडकर संपूर्ण वांग्मय खंड 4 (हिन्दी) पृष्ठ संख्या 228 "नामकरण" शीर्षक के अंतर्गत वे लिखते हैं, "संविधान में प्रस्तावित परिवर्तनों के फलस्वरूप मतदाता सूचियों में जो संशोधन हो रहा है वह इस प्रश्न पर विचार के लिए एक अति उत्तम अवसर है कि दलित वर्गों का एक उचित और उपयुक्त नामकरण किया जाए। अतः मैं इस प्रश्न पर अपनी राय व्यक्त करना चाहता हूं। जिन जातियों को इस समय दलित वर्ग कहा जाता है। उन्हें इस शब्द के प्रयोग पर काफी आपत्ति है। कमेटी के सामने जो अनेक साक्षी उपस्थित हुए हैं उन्होंने इस भावना को व्यक्त किया है। इसके अलावा दलित वर्ग शब्द ने जनगणना में काफी संभ्रम पैदा कर दिया है क्योंकि इसमें उन दूसरे लोगों का भी समावेश है जो वास्तव में अश्पृष्य नहीं है। दूसरी वह यह धारणा पैदा करता है कि दलित वर्ग एक निम्न और असहाय समुदाय है, जबकि वास्तविकता यह है कि हर प्रांत में उनमें से अनेक सुसंपन्न और सुशिक्षित लोग हैं और समूचे समुदाय में अपनी आवश्यकताओं के प्रति चेतना जागृत हो रही है, उनके मानस में भारतीय समाज में सम्मानजनक दर्जा प्राप्त करने की प्रबल लालसा पैदा हो गई है और वह उसे प्राप्त करने के लिए भागीरथ प्रयास कर रहा है। इन सब कारणों के आधार पर "दलित वर्ग" शब्द अनुपयुक्त और अनुचित है"। डॉक्टर अंबेडकर संपूर्ण वांग्मय (हिंदी) खंड 5 पृष्ठ संख्या 207 के "संज्ञा" शीर्षक के अंतर्गत डॉक्टर अंबेडकर लिखते हैं,"इस प्रश्न के इस भाग पर विचार करते समय हम यह उल्लेख करना चाहते हैं कि दलित वर्ग की मौजूदा संज्ञा के बारे में दलित वर्ग के सदस्यों द्वारा आपत्ति की गई है और उन्होंने तथा इस वर्ग से बाहर के व्यक्तियों ने जिन्हें दलित वर्गों में रुचि रही है इस बारे में विचार किया है। यह संज्ञा अप्रतिष्ठाकारी और तिरस्कार पूर्ण है। किसी विशेष संज्ञा के बारे में जोर देने के लिए हमारे पास कोई अधिकार नहीं है हम उनको सिर्फ सुझाव दे सकते हैं और हमारा विश्वास है कि यदि दलित वर्ग को इस बारे में ठीक ढंग से समझा दिया जाए तब वे ऐसी संज्ञा को स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं करेंगे जो उनके लिए सबसे अधिक उचित होगी"। जो व्यक्ति 'आंबेडकरनामा' चला रहे हैं उसको दलित शब्द का ज्ञान नहीं फिर वे कैसे अंबेडकरवादी?  'आंबेडकरनामा' उर्फ दलितनामा के कांग्रेसी दलित बंधु को दलित कौन की सही परिभाषा को महा मना रामस्वरूप वर्मा के विचारों से ग्रहण करना चाहिए। महामना रामस्वरूप वर्मा के अनुसार," जो अन्याय के खिलाफ संघर्ष करने में अपना साहस खो बैठता है वह दलित है। दलित वह नहीं जो दबाया गया है। संयुक्त राज्य अमेरिका ने जापान को तहस-नहस कर दिया था किंतु जापान अपना साहस नहीं खोया और वह पुनः उठ खड़ा हुआ। आज जापान का मुकाबला करने में संयुक्त राज्य अमेरिका को बहुत सोचना पड़ेगा"।
    बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर ने अपने जीवन काल में जब देखा कि मूलनिवासी बहुजनो में बिखराव के कारण उनका मनोबल गिरा हुआ है तो उन्होंने उन्हें संदेश देते हुए कहा,"I hope that the good sense will prevail and we shall ,achieve what we want untimately. what will count with us is an organisation. you must also remember all political rights that we might get by our prepetual efforts are bound to be for a period. there will be time when these right will vanish not only for us, but for every body in this country. when these rights vanish what we shall have to depend upon is our organization, our strength and unity".

अर्थ-“मैं उम्मीद करता हूं कि समझदारी प्रभावी होगी और अंततोगत्वा हम वह हासिल करेंगे जो हम चाहते हैं। हमारे लिए जिस चीज को बेहद अहमियत है वह है !संगठन ! आपको यह अवश्य स्मरण रखना होगा कि हम अपने अनवरत प्रयत्नों से जो समस्त राजनीतिक अधिकार हासिल करेंगे उनका एक अवधि के लिए ही होना लाजमी है। एक समय ऐसा होगा जब सारे अधिकार खत्म हो जाएंगे न सिर्फ हमारे लिए बल्कि इस देश के हर व्यक्ति के लिए। जब यह अधिकार खत्म हो जाएंगे तो हमें अपने संगठन अपनी ताकत और अपनी एकता पर ही निर्भर रहना होगा|”
भारत के जिन मूलनिवासी बहुजन बुद्धिजीवियों के दिलो-दिमाग में डॉक्टर अंबेडकर का यह कथन कि ” मुझे पढ़े लिखे लोगों ने धोखा दिया है ” तीर के समान लगा और उन्होंने एहसास किया कि वास्तव में वे धोखेबाज हैं इसलिए धोखेबाजी से निजात पाने के लिए ही उन्होंने बामसेफ जैसे सामाजिक संगठन की नींव डाली और मूलनिवासी बहुजनों की राजनीति देश में प्रस्थापित करने के लिए गैर राजनीतिक जड़ों को मजबूत करना प्रारंभ किया क्योंकि समाज में राजनीति उसी की चलती है जिसकी गैर राजनीतिक जड़े मजबूत होती हैं और उन्होंने ‘बामसेफ’ को परिभाषित किया। ‘बामसेफ’ कर्मचारियों का संगठन है कर्मचारियों के द्वारा चलाया जाता है किंतु कर्मचारियों के लिए यह नहीं है। यह मूलनिवासी बहुजनो को जागृत करने के लिए है। संभवत ‘आंबेडकरनामा’ उर्फ ‘दलित नामा’ के संचालक कांग्रेस के दलित एवं गांधी के हरिजन बंधु एनसीईआरटी हाई स्कूल की सोशल साइंस की बुक को यदि नहीं पढ़ा है तो उन्हें पढ़कर ‘बामसेफ’ की सही जानकारी कर लेना चाहिए जिसमें ‘बामसेफ’ को भारत का सबसे अच्छा संगठन घोषित किया गया है। वे अपने तुल्य कुछ शूद्र और अछूत दलितों को अपने दलित खाने में बुलाकर ‘बामसेफ’ को कोसवातें हैं और संदेश देते हैं कि ‘बामसेफ’ ने चालीस वर्षों में क्या किया? क्या कोई स्कूल बनवाया, क्या कोई संस्थान का निर्माण किया? वे दलित बंधु जब दलित कोठरी से बाहर ही नहीं निकलते तो उन्हें क्या मालूम होगा की बामसेफ देश में क्या-क्या किया है? उन्होंने नागपुर के रिगना बोड़ी में 26 एकड़ जमीन पर खड़े राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले सामाजिक क्रांति संस्थान को यदि देखा होता और शोधकर्ताओं के लिए 39 कमरे का भव्य छत्रपति शाहूजी महाराज हॉस्टल ब्लॉक देखा होता तब पता चलता कि बामसेफ संगठन कैसा वैचारिक आंदोलन चला रहा है? बामसेफ संगठन साधन है साध्य की प्राप्ति के लिए।
बामसेफ संगठन की तमाम शाखाएं एक सुनिश्चित उद्देश्य के लिए पूरे देश में कार्य कर रही हैं। बामसेफ संगठन राष्ट्रपिता फुले और बाबा साहब के कारवां को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है। कांग्रेसी दलित बंधु सारांशत: बामसेफ पर आरोप लगाया कि बामसेफ संगठन नहीं बल्कि गिरोह है। आखिर वे ‘बामसेफ’ से इतना खफा क्यों और बामसेफ संगठन चलाने वालों को कटी जली क्यों सुना रहे हैं? जब देश में किसान आंदोलन चल रहे थे तो एक ब्राह्मण युवती पूनम पंडित अपने खुद के मकसद लेकर किसान आंदोलन में कूद पड़ी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कटी जली सुनाने लगी। लाल सलाम का अलख जगाने वाले कन्हैया कुमार ने भी अपने सुनिश्चित मकसद की पूर्ति के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कोसना शुरू किया। अंततः उन दोनों का मकसद पूरा हुआ। उन दोनों के लिए यह कहावत चरितार्थ हुई नमक लगे न फिटकरी रंग चोखा हो जाए। आखिर कांग्रेस के दलित बंधु को अपना कौन सा मकसद पूरा करना है जिसकी वजह से बामसेफ संगठन पर हमला करने की ठान लिया है?
एक पंडित जी ने तोता पाला उनका तोता प्रातः भोर में राम-राम कहता था। उनका पूरा घर राममय हो गया। पड़ोसी से रहा नहीं गया। वह भी अपने घर में तोता पा लिया और सोचा कि मेरा घर भी राममय हो जाएगा। दोनों के तोते बरामदे में आमने-सामने पिंजड़े में टांग दिए। पड़ोसी के तोते ने परिवार वालों को गाली देने लगा और उधर पंडित जी के तोता राम-राम के साथ सीताराम भी कहने लगा और दूसरी तरफ जब पड़ोसी के तोते को देखने के लिए उसके सगे संबंधी उसके घर आने लगे जैसा कि पंडित जी के तोते को देखने के लिए भीड़ लगी रहती थी तो पड़ोसी का तोता नाम ले लेकर के लोगों को गालियां देना शुरू कर दिया। पड़ोसी परेशान होकर पंडित जी के पास गया और कहा पंडित जी मेरा तोता गालियां बक रहा है आखिर क्या बात है? पंडित जी ने उसे जवाब दिया कि तुम्हारा तोता गलत संगति में पड़कर गालियां बक रहा है, फिर पड़ोसी ने उपाय पूछा तो पंडित जी ने कहा कि तुम आज अपने तोते को मेरे तोते के पिंजड़े में डाल दो उसके साथ रहकर अच्छी संगति में वह भी राम राम और सीता राम कहना शुरू कर देगा। पड़ोसी ने पंडित जी की बात मानकर अपने तोते को पंडित जी के तोते के पिंजरे में डाल दिया और प्रातः होते ही इंतजार करने लगा कि आज उसका तोता भी राम-राम कहेगा और उसका घर भी राममय हो जाएगा किंतु मामला उल्टा हो गया और पंडित जी का तोता राम-राम करना बंद कर दिया और पड़ोसी का तोता गाली देना बंद कर दिया। हकीकतन पंडित जी का तोता नर तोता था और पड़ोसी का तोता मादा तोता था। दोनों एक दूसरे की चाहत में परेशान थे और एक राम राम सीताराम कहता था केवल इसलिए कि पड़ोसी के तोते से मधुर मिलन हो और पड़ोसी का तोता इसलिए गाली देता था कि मालिक मुझे पंडित जी के तोते के साथ क्यों नहीं मिलने देता क्यों उसे पीजडे में बंद कर रखा है? दोनों का मतलब एक ही था। मतलब सध गया उनकी इच्छाएं पूरी हो गई इसलिए एक ने राम-राम कहना बंद कर दिया दूसरे ने गाली देना बंद कर दिया। यह मतलब परस्ती का खेल था जिसे कांग्रेस के दलित और गांधी के हरिजन ऐसी मतलब परस्ती का खेल खेलते रहते हैं क्योंकि उन्हें कांग्रेस से टिकट लेने की दरकार है और टिकट तभी संभव है जब मूलनिवासी बहुजनों में जागृती पैदा करने वाले किसी ऐसे संगठन की निंदा किया जाए जिससे उन्हें टिकट मिलने में कोई दिक्कत न हो। ‘आंबेडकरनामा’ चलाने वाले दलित बंधुओं को यदि जरा भी सामाजिक चेतना होती तो बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर ने कहा था कांग्रेसी जलता हुआ घर है। वे कभी भी ऐसी हरकतें न करते जैसा कि बामसेफ को बदनाम करने में कर रहे हैं और राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा को अंजाम देने में जुटे हुए हैं|

जिस कांग्रेस ने बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर को संविधान सभा में जाने से रोकने के लिए क्या क्या हथकंडे नहीं अपनाए फिर भी कांग्रेस के दलितऔर गांधी के हरिजन बन्धुओं को बाबा साहब के साहित्य को सही परिपेक्ष में पढ़ना चाहिए और दलित नामा को अंबेडकर नामा कह कर बामसेफ संगठन के प्रति जहर उगलना मूलनिवासी बहुजन समाज के हित में नहीं है। उनका मानना है कि भाजपा और आर एस एस को यदि कोई रोक सकती है तो कांग्रेसी रोक सकती है और दूसरा कोई नहीं किंतु यह एक विचारणीय प्रश्न है कि यदि कांग्रेस भारत के मूलनिवासियों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय प्रदान की होती तो भाजपा किसी भी दशा में नहीं आ सकती थी। यदि भाजपा का पदार्पण भारतीय राजनीति में हुआ है तो उसका बुनियादी कारण कांग्रेस की नीतियां है। क्या यह सच नहीं है कि राज्यसभा में विपक्ष का बहुमत होते हुए भी जिसमें कांग्रेसियों की संख्या ज्यादा थी ईडब्ल्यूएस आरक्षण पास कर दिया गया? क्या कांग्रेसी भाजपा एक ही सिक्के के दो पहलू नहीं है? एससी एसटी ओबीसी के संविधान सम्मत आरक्षण के विरोधी पंडित जवाहरलाल नेहरू देश के प्रधानमंत्री होते हुए भी उन्होंने 27 जून 1961 को देश के कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों को लिखे पत्र में आरक्षण का विरोध किया है, जिन्होंने भारतीय संविधान की शपथ लेकर प्रधानमंत्री पद को ग्रहण किया था। कांग्रेसियों की विचारधारा में धूर्तता साफ साफ नजर आती है किंतु डॉक्टर अंबेडकर की विचारधारा में बहुजन हिताय बहुजन सुखाय जैसी पारदर्शिता है। ‘आंबेडकरनामा’ के आवरण में ‘दलित नामा’ को परोसना यह बौद्धिक धूर्तता है।…

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