EWS 10% कोटा के लिए संसद में बिना चर्चा हुए संविधान संशोधन के असंवैधानिकता को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जोरदार बहस जारी।


मुख्य न्यायाधीश सहित पांच जजों की संविधान पीठ के सामने सुनवाई शुरू हो गयी।
103 वें संविधान संशोधन से जुड़े 32 मामलों पर सुप्रीम कोर्ट में एकसाथ सुनवाई।
सुप्रीम कोर्ट में पीपीआईडी की ओर सीनियर एडवोकेट डॉ. के. एस. चौहान ने 68 पेज की लिखित दलील दी।
EWS 10% कोटा के संविधान संशोधन के विरोध में पीपीआईडी ने भी 2019 में की थी याचिका। प्रोफेसर डॉ. जी. मोहन गोपाल ने जस्टिस वी. ईश्वरैया की तरफ से दलीलें रखीं।

मेरा नाम अरुण मिश्रा है। मेरी जाति के लोग नौकरशाही में भरे पड़े हैं। मेरे पास भी पुरखों की हड़पी सैकड़ों एकड़ जमीन थी।लेकिन मैं जुआ खेलता था, दारूबाज़ हूँ, कोठे पर पैसा लुटाता था। सब जमीन बिक गई। मैं गरीब हो गया। क्या अब मुझे #EWS 10% कोटा में IAS बनने का मौक़ा मिलना चाहिये? यह सवाल पूछा है जानेमाने लेखक व पत्रकार दिलीप मंडल ने। समय है EWS कोटा को लेकर देश के उच्चतम न्यायालय में चल रही सुनवाई।

भले ही EWS 10% कोटा आरक्षण को लेकर को लेकर संसद में चर्चा नहीं की गयी लेकिन आरक्षण समानता के लिए ऐतिहासिक रूप से वंचित रखे गए वर्ग को प्रतिनिधित्व प्रदान करने वाली व्यवस्था है, यह समाज अथवा वर्ग को दी जाती सकती है न कि व्यक्ति को, आरक्षण पाने वाला व्यक्ति उस समाज या वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है इस तत्व को लेकर जोर-दार बहस छिड़ चुकी है।

केंद्र में बैठी बीजेपी नेतृत्व वाली सरकार ने बहुमत के बल पर वर्ष 2019 में EWS 10% कोटा आरक्षण को लेकर किये 103 वें संविधान संशोधन को चुनौती देने वाली कई जनहित याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दायर की गयी हैं। जिसको लेकर मंगलवार, 13 सितम्बर 2022 से सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हो चुकी है।

EWS 10% कोटा आरक्षण को लेकर किये गए 103 वें संविधान संशोधन की संवैधानिकता को लेकर जिन्होंने 2019 में चुनौती याचिकायें दायर की हैं उनमें जनहित अभियान यह संस्था, पिछड़ा वर्ग आयोग के पूर्व चेयरमैन जस्टिस वी. ईश्वरैया और पीपल्स पार्टी ऑफ इंडिया डेमोक्रेटिक प्रमुख है। जाति आधारित आरक्षण का विरोध करने वाली युथ फॉर इक्वलिटी भी के पार्टी है। सुप्रीम कोर्ट में चल रही इस सुनवाई को जनहित अभियान बनाम भारत सरकार केस के नाम से जाना जाएगा। आपको बता दें कि EWS 10% कोटा आरक्षण को लेकर किये गए 103 वें संविधान संशोधन से जुड़े 32 मामलों पर सुप्रीम कोर्ट एकसाथ सुनवाई कर रही है।

जाने माने विधिज्ञ व संविधानवेत्ता इसमें अपनी दलीले दे रहें हैं। जिनमें प्रमुख रूप से प्रोफेसर डॉ. जी मोहन गोपाल, मिनाक्षी अरोड़ा सीनियर एडवोकेट, संजय पारीख सीनियर एडवोकेट, प्रोफेसर रवि वर्मा कुमार सीनियर एडवोकेट, सलमान खुर्शीद सीनियर एडवोकेट, पी विल्सन सीनियर एडवोकेट, डॉ. के. एस. चौहान सीनियर एडवोकेट, डॉ. यादव नरेंद्र सिंह आदि शामिल है।

सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच के सामने यह सुनवाई चल रही है। पांच जजों की इस पीठ में भारत के मुख्य न्यायाधीश यूयू ललित, जस्टिस दिनेश माहेश्वरी, जस्टिस एस रवींद्र भट, जस्टिस बेला एम त्रिवेदी और जस्टिस जेबी पारदीवाला शामिल है।

हालांकि इन जजों में से कुछ को लेकर समाज जीवन से आपत्तियां आ रही है। जिनमें से जस्टिस जे बी पारदीवाला ने अपनी एक सुनवाई के दौरान आरक्षण के बारे में व्यक्त किये विचारों को सोशल मीडिया में शेयर किया जा रहा है। यह भी सवाल उठाए गए हैं कि पांच न्यायधीशों की इस पीठ में बैकवर्ड क्लासेज का एक भी न्यायाधीश नहीं है। स्वयं मुख्य न्यायाधीश यूयू ललित के बारे में, उन्होंने एससी एसटी एट्रोसिटी प्रिवेंशन एक्ट पर किये वक्तव्य पर भी चर्चा हो रही है।

चल रही सुनवाई पर मीडिया में कुछ खबरें छपी जरूर है लेकिन उससे यह पता नहीं चलता कि 103 वें संविधान संशोधन को चुनौती की वास्तविक दलीलें क्या है? हालांकि यह सुनवाई कई दिनों तक चल सकती है, फैसला आने को अभी समय लग सकता है। लेकिन सुनवाई की शुरुआत में ही जबरदस्त दलीलें दी गयी है।

मंगलवार 13 सितंबर 2022 को पहले दिन की सुनवाई में प्रोफेसर डॉ जी मोहन गोपाल ने संविधान सभा की बहसों का हवाला देते हुए कहा कि वंचित समूहों के लिए प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए आरक्षण की शुरुआत की गई थी। उन्होंने यह भी कहा कि समानता हमेशा पिछड़े वर्गों की मांग रही है न कि कुलीन वर्गों की क्योंकि पिछड़े वर्गों को ही समानता की आवश्यकता थी। उन्होंने प्रतिनिधित्व मांगा, आर्थिक उत्थान नहीं। उन्होंने कहा कि संविधान में आरक्षण का प्रयोग केवल प्रतिनिधित्व के साधन के रूप में ही किया गया है।

आर्थिक आधार पर दिए 10 प्रतिशत आरक्षण को लेकर उन्होंने बताया कि वित्तीय स्थिति एक क्षणिक स्थिति है, जो लॉटरी जीतने या जुआ हारने जैसी परिवर्तनशील घटनाओं से बदल सकती है। हालांकि, कुछ संरचनात्मक स्थितियां हैं जो कुछ समुदायों को गरीब रखती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि “ईडब्ल्यूएस व्यक्तियों और परिवारों को दिया जाता है। यह बहुत महत्वपूर्ण है। अंततः संविधान एक दस्तावेज है जो अल्पसंख्यकों की रक्षा करता है- शब्द के एक बड़े अर्थ में, जो कमजोर हैं। और 103 संशोधन हमें इससे दूर कर देता है और परिवारों और व्यक्तियों को देखते हैं।”

मंगलवार को हुयी सुनवाई में डॉ जी मोहन गोपाल, सीनियर एडवोकेट मीनाक्षी अरोड़ा और सीनियर एडवोकेट संजय पारिख ने अपनी दलीलें रखीं थी। सीनियर एडवोकेट मीनाक्षी अरोड़ा ने अपनी दलीलों में रखा कि आरक्षण ऐतिहासिक अन्यायों का प्रतिकार करने के लिए वर्ग आधारित बनाया गया था जबकि आर्थिक आरक्षण व्यक्तिवादी होता जा रहा है। उन्होंने आरक्षण के लिए 50 प्रतिशत सीमा की भी बात रखी।

साथियों, दूसरे दिन बुधवार 14 सितंबर 2022 को हुई सुनवाई के दौरान प्रोफ़ेसर रवि कुमार वर्मा ने दलील दी कि आर्थिक आधार पर आरक्षण को गलत बताते हुए कहा कि “यदि किसी गरीब व्यक्ति को कोई समस्या है, तो उसे पैसे या छात्रवृत्ति दें। उनके लिए छात्रावास खोलें।”

तीसरे दिन गुरूवार 15 सितंबर 2022 को चली सुनवाई के दौरान सीनियर एडवोकेट पी विल्सन ने जोरदार तरीके से संविधान के अनुच्छेद 46, अनुच्छेद 15 और 16 पर बात की। उन्होंने संविधान संशोधन 103 के विरोध में तर्क दिया कि इसने “समानता प्रावधान का उल्लंघन किया गया है और बुनियादी ढांचे को बदल दिया गया है क्योंकि अनुच्छेद 14,15,16 समानता का उपदेश देता है। एक आर्थिक समानता लाकर समानता का स्पष्ट उल्लंघन है जोकि संविधान का विचार नहीं है।”

साथियों आपको बता दें कि इस सुनवाई में पीपीआईडी अर्थात पीपल्स पार्टी ऑफ इण्डिया डेमोक्रेटिक भी एक पार्टी है। पीपीआईडी की ओर से सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट डॉ. के. एस. चौहान ने अपनी भूमिका रखी।

उन्होंने विभिन्न कोर्ट केसेस का हवाला देते हुए कहा कि इस अदालत ने पाया है कि केवल आर्थिक मानदंडों के आधार पर आरक्षण की अनुमति नहीं है। उन्होंने दलील दी कि आर्थिक आधार पर आरक्षण से लोकतंत्र का पहलू नष्ट हो जाएगा क्योंकि लोकतंत्र को प्रतिनिधित्व की जरूरत है। अगर हम आर्थिक मानदंडों पर प्रतिनिधित्व देते हैं, तो यह कृत्रिम है। आर्थिक मानदंड एक अस्थायी चीज है – आज मैं गरीब हो सकता हूं लेकिन अगर मैं लॉटरी जीतता हूं तो मेरी स्थिति बदल जाएगी। लेकिन पिछड़े वर्गों को ऐतिहासिक रूप से वंचित रखा गया है और इसलिए 16(4) जोड़ा गया।

प्रभावी प्रतिनिधित्व तभी संभव होगा जब उसके लिए किसी तंत्र को विकसित किया जाए। उन्होंने कहा कि अगर आर्थिक आधार पर भेदभाव हो रहा है तो उसे लिया जा सकता है, लेकिन समाज में लेकिन समाज में भेदभाव आर्थिक स्थिति पर नहीं, बल्कि सामाजिक स्तिथि से होता है।

साथियों, डॉ. के. एस. चौहान ने अपने दलीलों का 64 पेज का लिखित डॉक्युमेंट संविधानपीठ को दिया है। उन्होंने कहा कि “चूंकि ऊंची जातियों का पहले से ही अच्छा प्रतिनिधित्व (संख्या) है, (ऐसे में) कोई भी तर्कसंगत औचित्य नदी दिखाई देता कि उनका स्तर और ऊँचा करने के लिए उन्हें आगे आरक्षण दें। यह संविधान निर्माताओं का दर्शन कभी नहीं था, और ऐसा करना वास्तव में संविधान के साथ धोखाधड़ी है।”

सवर्णों के लिए आर्थिक आधार पर सरकार की सेवाओं और शिक्षा में आरक्षण देने हेतु किये गए 103 वे संविधान संशोधन को चुनौती को लेकर दायर याचिका पर देश के उच्चतम न्यायालय में मंगलवार 13 सितंबर से सुनवाई चल रही है। पांच जजों की संविधान पीठ वकीलों की दलीलें सुन रहे हैं। मंगलवार, बुधवार व गुरूवार यह करवाई चली। अगली करवाई संभवतः मंगलवार 20 सितंबर को होगी।

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जय भीम जय मूलनिवासी।

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