श्राद्ध के प्रति श्रद्धा, कमंडल के कंधे पर मंडल का जनाजा…दयाराम

              
      भारत के शहर से गांव तक इस समय 10 सितंबर से 25 सितंबर तक प्रति वर्ष की भांति श्राद्ध अर्थात पितृपक्ष समारोह का आयोजन चल रहा है। पन्द्रह दिन तक पितृ पक्ष किंतु मातृपक्ष गोल है क्योंकि आर्य संस्कृति पुरुष प्रधान संस्कृति है। आर्य सांस्कृतिक मान्यताओं के आधार पर इन पन्द्रह दिनों में स्वर्ग से पितर जमीन पर उतरते हैं जिन्हें कोई पहचान नहीं सकता क्योंकि यमराज उन्हें कौवे, बिल्ली, गाय और कुत्ते के भेष भेजता है। पितृदोष से बचने के लिए लोग कुत्ते बिल्ली गाय कौवा आदि पशु पक्षियों को पकवान खिलाते हैं तथा ब्रह्म भोज देकर ब्राह्मणों को तृप्त करते हैं क्योंकि ब्रम्ह भोज सीधे पितरों को तृप्त करता है क्योंकि अन्य को भोज देना पितृ दोष है चाहे वह व्यक्ति भूखा ही क्यों न हो। लोग आर्य ब्राह्मणों के कमंडल को दान दक्षिणा से इतना भर देते हैं कि ब्राम्हण पुरोहित अपने कमंडल की कमाई से मंडल का जनाजा निकालता है अर्थात उन्ही की दान दक्षिणा से  वह उन्हीं का घर उजाड़ता है। अपने अगले जन्म को बनाने की धार्मिक धारणा से लोग  ब्राम्हण पुरोहितों द्वारा बताए गए सारे कर्मकांड करते हैं और इन्हीं दिनों में वे आर्य ब्राह्मणी षड्यंत्र के शिकार हो जाते हैं। अपनी बेबसी और लाचारी को पिछले जन्म के कर्मों का फल मानकर  जैसा कि ब्राह्मण पुरोहित उन्हें सांस्कृतिक पाठ पढ़ाते है अपने पितरों की तृप्ति के लिए वह ब्रह्म भोज और दान दक्षिणा में अपने मुक्ति का मार्ग खोजते हैं। 
     वे आर्य ब्राम्हण भारत के मूल निवासियों को स्वर्ग का मार्ग बताते है साथ ही साथ स्वर्ग का महिमामंडन भी करते है किंतु भारत का मूल निवासी उससे सवाल नहीं करता कि यदि स्वर्ग अच्छी जगह है तो ब्राम्हण पुरोहित स्वयं स्वर्ग क्यों नहीं जाना चाहते? वह भारत के गरीब गुरबों  को ही क्यों स्वर्ग भेजना चाहता है? भारत का गरीब व्यक्ति स्वर्ग नर्क मोक्ष के रहस्य को नहीं जानता क्योंकि भारत में बहुसंख्यक नागरिक अशिक्षित हैं।अमेरिकी वैज्ञानिकों ने सौर्य मंडल के रहस्य को जानने के लिए भारतीय महिला वैज्ञानिक कल्पना चावला और सुनीता विलियम को भेजा। जिन्होंने शौर्य मंडल के रहस्य की खोज में बहुत बड़ा खतरा मोल लिया किंतु भारत का आर्य ब्राम्हण जो स्वर्ग नरक और अगले जन्म के रहस्य को लोगों के सामने प्रस्तुत करता है वह कौन सा ब्राह्मण पुरोहित है जो स्वर्ग नर्क और अगले और पिछले जन्म की रिपोर्टों उपर से लाकर भारत में परोसता है। इसका कोई भी विवरण भारत में उपलब्ध नहीं है। क्योंकि पिछले जन्म और स्वर्ग की रिपोर्ट लेने के लिए जो भी कोई जाएगा तो उसे सबसे पहले मरना होगा किंतु मरने के बाद न कहीं स्वर्ग है ना कहीं नर्क है न कोई पिछला जन्म है न कोई अगला जन्म है यह वैज्ञानिक सत्य है।भारतीय नागरिकों को आर्य ब्राह्मण अपने धर्म के धंधे से लूटता है और भारत का मूल निवासी ब्राह्मणवाद को अपने कंधे पर ढोता है जिसमें ब्राह्मणों का हित है अन्य किसी का नहीं।  आर्य ब्राह्मणों के कमंडल को दान दक्षिणा से भरने वाला भारत का मूल निवासी इस बात को नहीं समझता की अपनी सांस्कृतिक धरोहर को बचाने के लिए ही आर्य पुत्रों ने कमंडल के कंधे पर ही मंडल का जनाजा निकाला था जिस मंडल से उन्हें पिछड़ों को शासन प्रशासन,धन धरती और राजपाट में हक अधिकार मिलता, वे कमंडल का साथ देकर मंडल को उजाड़ने का कार्य आज भी कर रहे हैं। काशीराम जी ने नारा दिया था वोट से लेंगे सीएम पीएम मंडल से लेंगे एसपी,डीएम। उसी समय अपनी संस्कृति के रक्षार्थ लालकृष्ण आडवाणी ने कमंडल रथ यात्रा निकाला था जिसे लालू प्रसाद यादव ने रोका ही नहीं बल्कि आडवाणी को जेल में डाल दिया था। अधिक दिन नहीं बीते थे कि बसपा सुप्रीमो मा.काशीराम और सुश्री मायावती ने उसी लाल कृष्ण आडवाणी को 2004 में लखनऊ में बहुजन समाज पार्टी की रैली में आमंत्रित किया और जिस रैली में भीड़ के कारण वारह लोगों की दबकर मौत हो गई थी और उस भीड़ को देखकर लालकृष्ण आडवाणी को इस बात का एहसास हुआ कि यदि यही स्थिति रही तो भारत के मूलनिवासी दिल्ली की गद्दी पर कब्जा कर वे सत्ता की ताकत से आर्य ब्राह्मणी संस्कृति का सत्यानाश करने में विलंब नहीं करेंगे इसलिए उन्होंने धीरे धीरे अपनी साम दाम दंड भेद की नीति से मूलनिवासी बहुजन आंदोलन को तहस-नहस करने के लिए बहुजन समाज पार्टी में ही नहीं बल्कि सपा और राजद में भी घुसपैठ करना शुरू किया और तब तक वे अपनी साम दाम दंड भेद की नीति को चलाते रहे जब तक उन्होंने मंडल को कमण्डल में समाहित नहीं कर दिया। 
     भारत का मूल निवासी शहर से लेकर गांव तक आर्य ब्राह्मणों के सांस्कृतिक धागों से आज भी इस तरह बध चुका है कि उसे संवैधानिक मूल्यों का पता नहीं जिन संवैधानिक मूल्यों के बल पर वह अपना भविष्य तय कर सकता है। श्राद्ध के प्रति श्रद्धा का एक अद्भुत उदाहरण कि एक महिला श्राद्ध के दिनों में अपने दिवंगत पति की याद में प्रतिवर्ष श्राद्ध कर्म को अंजाम देती रही जैसा कि आज भारत का सांस्कृतिक वातावरण बना हुआ है। उसका छोटा सा बच्चा उससे पूछ बैठता है कि मम्मी आप पकवान बनाकर छत पर क्यों रखती हो? तो मां ने बच्चे से कहती है कि इस पकवान को खाने के लिए हमारे पूर्वज पशु पक्षियों के भेष में छत पर आते हैं और उसे खाकर तृप्त होते हैं। वह अपने बाल स्वभाव के कारण पुन: मां से पूछ बैठता है, क्या पापा भी आते हैं उसने बताया कि हां पापा भी तुम्हारे आते हैं।एक बार वह मां के साथ छत पर चला गया और पकवान रहते ही कौवों का झुंड पकवान पर टूट पड़ा और वे सभी पकवान का स्वाद लेने लगे कि बेटे ने पुन: पूछा! मम्मी इसमें पिता जी कौन है? मां के पास कोई भी जवाब नहीं था वह केवल इधर-उधर की कहानियां सुना कर  उसे चुप करना चाहती थी किंतु वह छोटा सा बच्चा अपनी जिद पर अड़ा हुआ था क्योंकि उस नन्हे से बालक को आर्य संस्कृति का ज्ञान नहीं था। आर्य ब्राह्मणों का सांस्कृतिक षड्यंत्र जन आंदोलन से ही समाप्त किया जा सकता है बशर्ते कि मूलनिवासी बहुजन समाज का बुद्धिजीवी वर्ग आर्य ब्राह्मणी झांसे में फंसे मूलनिवासी बहुजनों से संपर्क संवाद सुसंवाद तत्पश्चात ब्राह्मणवाद के विनाश के लिए संदेश देना प्रारंभ कर दे। आचरण विहीन जागरण से ब्राह्मणवाद का विनाश नहीं किया जा सकता।

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