मूलनिवासी पुरखों के आंदोलन से सामाजिक चेतना का उभार तथा मूल निवासियों में भाग्यवाद पुनर्जन्म अंधविश्वास पाखंड और चमत्कार जैसे आर्य ब्राह्मणी सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति क्षोभ और विद्रोह का वातावरण बन ही रहा था कि मूलनिवासी बहुजन समाज के कुछ राजनेता अपने निजी स्वार्थ में आंदोलन की दिशा ही बदल दी। सत्ता के स्वाद में सिद्धांत और मूल्यों से समझौता कर सत्ता के शिखर पर चढ़ा तो जा सकता है किंतु उसका भविष्यगामी परिणाम अपेक्षा के अनुरूप निकलना संदेहास्पद होता है। उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव के दौरान राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने घोषणा किया कि उत्तर प्रदेश की जनता यदि सत्ता सपा को सौंपती है तो वे भगवान विष्णु का मंदिर बनाएंगे जैसे भगवान विष्णु के मंदिर में लाखों लोगों को रोजगार मिलेगा। बसपा सुप्रीमो सुश्री मायावती ने भी उसी चुनाव के दौरान उत्तर प्रदेश की जनता से आवाहन किया कि यदि उत्तर प्रदेश की जनता बसपा के हाथों में सत्ता सौंपती है तो वे भगवान परशुराम की ऊंची कद की प्रतिमा लगायेंगी। फिर क्या था अखिलेश यादव से रहा नहीं गया उन्होंने पुनः घोषणा कर दी कि वे भगवान परशुराम की सबसे ऊंची कद की प्रतिमा चुनाव जीतने के बाद लगवाएंगे। किंतु मूलनिवासी बहुजन समाज के दोनों नेताओं ने इस बात की घोषणा नहीं की कि मंदिरों के पुजारी वे मूलनिवासी बहुजन समाज से उनकी जनसंख्या के अनुपात में ही रखेंगे जैसा कि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन ने घोषणा किया था। हैरत तो इस बात की कि उन्होंने जिस धर्मनिरपेक्ष संविधान की शपथ लेकर मुख्यमंत्री पद को सुशोभित किया था वही लोग एक धर्म विशेष के होकर संवैधानिक मर्यादाओं का उल्लंघन किया। इन अद्भुत घोषणाओं के बाद भी जिनसे उन्हें अपेक्षा थी कि वे उन्हें अपने वोट की ताकत से सत्ता के शिखर पर् उन्हें बैठाएंगे किंतु वैसा नहीं हुआ। आखिर ऐसा कुछ करने के बाद भी उन्हें मिला क्या? “न खुदा ही मिला न विसाले सनम न इधर के हुए न उधर के हुए”। लम्हों की लालच ने उनके मंसूबे पूरे नहीं होने दिये।
भारतीय संविधान में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से बिछड़े हुए नागरिकों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व प्रदान करने की व्यवस्था है जैसा कि एस सी/एस टी के लिए संविधान में व्यवस्था है। सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन का कारण जाति व्यवस्था है। जाति व्यवस्था का जनक ब्राम्हण, संचालक ब्राम्हण संरक्षक ब्राम्हण संवर्धक ब्राम्हण और लाभर्थी भी ब्राह्मण ही है। आर्य ब्राह्मण एक आदिवासी संथाल से जाति व्यवस्था का महिमामंडन करते हुए कहते हैं-“अशुद्धो शुद्धतां जाति नाति शुद्धति किल्विषं।न गंगा न गया काशी जाति गंगा गरीयसी”अर्थ-यदि कोई अशुद्ध है तो उसे जाति से ही शुद्ध किया जा सकता है। गंगा में स्नान करने काशी और गया की तीर्थ यात्रा करने से नहीं बल्किजाति की गंगा में गोता लगाने से ही शुद्धता प्राप्त हो सकती है। एक तरफ जहां जाति प्रथा लोगों को शुद्धता प्रदान करती है तो दूसरी तरफ जाति व्यवस्था शूद्र वर्ण की जातियों को नफरत प्रदान करती है-व्यास स्मृति अध्याय 1 श्लोक नंबर 11, 12, 13, 14 के अनुसार, ” बर्धकी नापितो गोप: आशाप: कुंभ कारक:।वणिक किरात कायस्थ मालाकार कुटम्बिन:। ये चान्ये च वहव: शूद्र: स्वकर्मभि:। चर्मकारो भटो भिल्लो रजक:पुष्करो नट:।वरटो मेद चाण्डाल दास स्वपचकोलका। येते अन्त्यजा समाख्याता ये चान्ये च गवासन:।एषाम सम्भाषणात स्नानम दर्शनादर्क वीवीक्षणम”।
अर्थ-बढ़ाई नाई अहीर आशाप कुम्हार तेली किरात कायस्थ माली और उसके सगोत्री ये सब अपने अपने कर्मों से भिन्न भिन्न प्रकार के शुद्र हैं। चमार भट्ट भील धोबी पुष्कर नट वरट मेद चांडाल दास भंगी कोली तथा गौ भक्षक ये सभी अंत्यज्य अर्थात अछूत हैं। प्रातः यदि ब्राह्मण को इनका दर्शन हो जाए तो वह स्नान कर सूर्य दर्शन से शुद्ध होता है। आर्य ब्राह्मणों ने शुद्र वर्ण की जातियों को जिस मात्रा में निरादर दिया उन्हें उसी मात्रा में दरिद्रता परोसी गयी। समाज में शूद्र और अछूत जातियां मात्र हिकारत की दृष्टि से ही नहीं देखी गई बल्कि उनकी जाति और वर्ण चिन्हित कर उन्हें शिक्षा संपत्ति और शस्त्र धारण करने के अधिकार से वंचित कर दिया गया। आर्य ब्राह्मणी सामाजिक व्यवस्था ने शुद्रों/अतिशुद्रों का जहां एक तरफ सामाजिक स्तर गिराया वहीं दूसरी तरफ शिक्षा के अभाव में उनका बौद्धिक बल कमजोर हुआ इसलिए संविधान सभा ने आरक्षण का आधार सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन स्वीकार किया। आर्थिक आधार पर आरक्षण को नकार दिया,इस धारणा के साथ कि कोई भी गरीब व्यक्ति कभी भी अमीर हो सकता है और अमीर व्यक्ति गरीब हो सकता है इसलिए आर्थिक आधार आरक्षण के लिए कोई मापदंड नहीं हो सकता। सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन का कारण जाति व्यवस्था है
इसलिए आरक्षण का आधार जाति को स्वीकार किया गया। संविधान में आरक्षण का आधार आर्थिक नहीं है फिर भी सवर्णों को आर्थिक आधार पर आरक्षण मिलना चाहिए, इस आशा और विश्वास के साथ बसपा सुप्रीमो सुश्री मायावती ने कि सवर्ण जातियां अपने वोट से उन्हें उत्तर प्रदेश की राजनीतिक सत्ता पर पहुंचाने में अपनी अहम भूमिका निभाएंगी। उन्होंने आर्य पुत्रों पर विश्वास किया किंतु सवर्णों ने उनका साथ नहीं दिया। बसपा मात्र एक सीट पर जाकर सिमट गई। एक बार जब सोनिया गांधी पर भाजपा इस बात पर बहस छेड़ रखी थी कि सोनिया गांधी विदेशी है। किसी विदेशी महिला को सत्ता सौंपना ठीक नहीं होगा। काशीराम जी ने जवाब देते हुए कहा था कि आर्य पुत्रों से अच्छी इटली पुत्री है। इतना ही नहीं बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर ने अपनी पुस्तक अछूत कौन? की भूमिका में बड़े स्पष्ट तौर पर लिखा है कि ब्राम्हण विद्वान हो सकता है, प्रज्ञा वान हो सकता है किंतु वह ईमानदार कभी भी नहीं हो सकता। फिर भी बसपा सुप्रीमो सुश्री मायावती ने सवर्णों को 10% आरक्षण प्रदान करने की वकालत की जिसका फायदा उठाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 5 अगस्त 2020 को सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण आर्थिक आधार पर प्रदान कर ही दिया। संसद में बहस के दौरान बहुजन समाज पार्टी के राज्यसभा सदस्य सतीश मिश्रा ने अपने संबोधन में कहा कि मैं आर्थिक आधार पर सवर्णों केआरक्षण के पक्ष में नहीं हूं किंतु हमारी नेता बहन सुश्री मायावती ने इसी संसद में घोषणा की थी कि सवर्णों को 15% आरक्षण आर्थिक आधार दिया जाना चाहिए। इसलिए मैं सरकार द्वारा प्रस्तावित 10% सवर्ण आरक्षण का समर्थन करता हूं। बाबासाहेब डॉक्टर अंबेडकर नेहरू मंत्रिमंडल में कानून मंत्री थे। उन्होंने अन्य पिछड़े वर्ग के आरक्षण एवं हिंदू कोड बिल तथा अन्य कुछ मुद्दों पर जो प्रस्ताव रखा अपनी पद और प्रतिष्ठा के लिए नहीं बल्कि बहुजनों के हित में फिर भी उन्होंने अपना जमीर नहीं बेचा। नेहरू मंत्रिमंडल से उन्होंने इस्तीफा दे दिया। जिस समय सवर्णों के आरक्षण की घोषणा हुई उस समय सत्तारूढ़ भाजपा को लोकसभा में पूर्ण बहुमत था किंतु राज्यसभा में भाजपा के 89 सदस्य तथा विपक्ष के 155 सदस्य थे। फिर भी विपक्ष के सहयोग से सवर्णों का 10% आरक्षण पास कर दिया गया किन्तु हरियाणा, राजस्थान व गुजरात में जाट आरक्षण, गुर्जर आरक्षण और पाटीदार आरक्षण की मांग करने वाले लोगों पर गोलियां बरसाई गयी उन्हें आरक्षण देना तो बहुत दूर की बात उनकी बातें तक नहीं सुनी गई।पद प्रतिष्ठा और सत्ता के लोभ में आर्थिक आधार पर सवर्णों के असंवैधानिक आरक्षण को रोका नहीं जा सका। लंबे समय से लंबित अन्य पिछड़े वर्ग की जाति आधारित जनगणना न करा कर सवर्णों की जाति आधारित जनगणना कराए बिना उन्हें 10% आरक्षण प्रदान कर दिया गया। द्विजातियों की हितेषी भाजपा और कांग्रेस तथा उनकी रक्षक भारत की न्यायपालिका हमेशा यही राग अलापती रही कि 50% से ऊपर आरक्षण नहीं दिया जा सकता किंतु 10% सवर्णों को आरक्षण देकर संवैधानिक मूल्यों को तार-तार कर दिया।फलत: मूलनिवासी बहुजन नेताओं की लम्हों की खता ने उनका भविष्य चौपट कर दिया। शासक जातियों ने 26 जनवरी 1950 से लेकर आज तक भारत के मूल निवासियों एससी/ एसटी/ओबीसी और उनसे धर्मान्तरित अल्पसंख्यकों के आरक्षण को पूरा न करने की स्थिति में कोई ऐसा कानून नहीं बनाया कि जो अधिकारी एससी/ एसटी/ओबीसी के आरक्षण को पूरा नहीं करेगा उसे अमुक दंड दिया जाएगा। किंतु उत्तराखंड की राज्य सरकार ने सवर्ण आरक्षण की घोषणा होते ही आदेश जारी किया कि सवर्णों के 10 प्रतिशत आरक्षण पूरा करने में किसी भी स्तर पर यदि लापरवाही बरती गई तो ऐसे अधिकारियों को तीन महीने की सजा और बीस हजार रूपये जुर्माना होगा।आखिर ऐसे भेदभाव के जिम्मेदार कौन? मूलनिवासी बहुजन समाज के नेता जिन्होंने आर्थिक आधार पर सवर्णों के आरक्षण की मांग और समर्थन किया उनकी जबान पर आज जैसे लकवा मार चुका है। बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर ने जिस जाति प्रथा के संत्रास को स्वयं झेला और समाज को झेलते हुए देखा तो ऐसी दशा में उन्होंने जाति प्रथा के विनाश के लिए “जातिभेद का उच्छेद” पुस्तक लिखा जिसे उत्तर प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने जप्त कर लिया था। माननीय रामस्वरूप वर्मा और ललई सिंह यादव के प्रयास से इलाहाबाद हाई कोर्ट में याचिका दायर कर उसे बहाल कराया गया।किंतु आज उत्तरी भारत में कुछ अछूत नेता सत्ता के स्वाद और शोहरत की ललक में जाति को ढाल बनाकर जहां एक तरफ वे “द ग्रेट चमार” का बोर्ड लगा कर दुश्मनों के हौसले बुलंद करते हैं तो वहीं दूसरी तरफ उन्हीं की तर्ज पर अन्य पिछड़े वर्ग के कुछ लोग “द ग्रेट गुर्जर का बोर्ड” लगा कर जाति व्यवस्था को प्रबल करने में लगे हुए हैं। वे इस बात से बेखौफ है जहां जाति प्रबल होती है वहां जाति व्यवस्था का जनक ब्राह्मण प्रबल होता है क्योंकि उसकी चाहत है कि एससी एसटी ओबीसी के लोग अपनी अपनी जातियों पर गर्व करें और शासक जातियां इनके बिखराव से फायदा उठाकर देश की सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर यथावत बनी रहकर अपनी आर्य ब्राह्मणी संस्कृति का परचम लहराती रहे। कुछ तो ब्राह्मणों को कोस करके भीड़ इकट्ठा करने में माहिर हैं तो कुछ अपनी जाति को ग्रेट बता कर अन्य को डिग्रेट सिद्ध करने की होड़ में लगे रहते हैं। लालू प्रसाद यादव जब भारत सरकार में रेल मंत्री थे तो उन्होंने बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री के चित्र पर माल्यार्पण कर जब वापस हुए तो सवर्णों ने उस चित्र को गंगाजल से धोकर पवित्र किया। उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के बाद जब आदित्यनाथ योगी मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने मुख्यमंत्री आवास को गंगाजल से धोकर पवित्र करने के बाद उसमें आवासित हुए क्योंकि अखिलेश यादव वर्ण और जाति में शूद्र थे जो अपने आपमें यदुवंशी क्षत्रिय होने का भ्रम पाल रखा था जिनके दर्शन मात्र से ब्राह्मण को स्नान करने पर शुद्धि मिलती है। सुश्री मायावती को सवर्ण पुरुष ही नहीं बल्कि सवर्ण
महिलाओं ने उनका जातिय अपमान कई बार किया फिर भी इन मूलनिवासी बहुजन नेताओं का मोह और विश्वास उन्हीं सवर्ण नेताओं पर बना रहता है, जो लोकतांत्रिक भारत में अल्पजन हैं।वे जिन मूलनिवासियों का दिल और दिमाग आर्य ब्राम्हणी बंधन में बांध कर अपने नियंत्रण में कर रखा है,उन्हें आर्य ब्राह्मणी सांस्कृतिक बंधन से मुक्त किए बगैर शासक जमात नहीं बनाया जा सकता। लोकतंत्र में जो बहुजन हैअगर वह अल्प जन ब्राह्मणों के सामने गिड़गिड़ाए और सत्ता के लिए अपना जमीर बेच दे इससे बड़ी शर्मनाक बात क्या हो सकती है? राष्ट्रपिता फुले ने जहां एक तरफ 24 सितंबर के दिन सत्यशोधक समाज बनाकर दोस्त दुश्मन की पहचान कराई वही बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर ने राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस में कम्युनल अवार्ड जीत कर आर्य ब्राह्मणी संस्कृति पर हमला बोला। राष्ट्रपिता फुले के सामाजिक आंदोलन की प्रतिक्रिया में जहां महर्षि दयानंद सरस्वती आए वही कम्युनल अवार्ड के प्रतिक्रिया में गांधी ने अपनी जान की बाजी लगा दी जिसके कारण पूना पैक्ट हुआ और इस पूना पैक्ट से अछूतों को पृथक निर्वाचन के स्थान पर संयुक्त निर्वाचन प्रणाली प्रदान कर दलालों को पैदा किया जो आपने लिखा है स्वार्थ में संलिप्त दिखाई देते हैं। उनको मूलनिवासी बहुजन समाज के प्रति कोई संवेदना और न कोई सहवेदना ही दिखाई पड़ती है। इसलिए लम्हों की खता से सदियां बर्बाद हो जाती हैं।
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