महाराष्ट्र में स्थानिक स्वराज्य संस्थाओं में ओबीसी के राजनैतिक आरक्षण निश्चिती के लिए ओबीसी की सांख्यिकी (इम्पेरिकल डेटा) इकट्ठा की जा रही है। इसके लिए एक आयोग स्थापन किया गया है। यह आयोग ओबीसी के जातिगत आंकड़े इकठ्ठा कर रहा है। पूर्व मुख्य सचिव जयंत बांठिया की अध्यक्षता में यह आयोग गठित किया गया है।
यह चर्चा फैली है कि इस आयोग द्वारा ओबीसी जाति के आंकड़े इकठ्ठा करने के लिए सरनेम का आधार लिया जा रहा है। लेकिन महाराष्ट्र जैसे राज्य में केवल टाइटल नेम से ओबीसी जाति को पता करना मुश्किल है।
महाराष्ट्र में केवल सरनेम से ओबीसी की जाति को पहचानना गलत है। क्योंकि महाराष्ट्र में कई सारे सरनेम ऐसे हैं जो ओबीसी एससी और मराठाओं में सामान रूप से पाए जाते हैं उदहारण के लिए भोसले, मोरे, जाधव, यादव, गावंडे, पवार, इंगले, तायडे, पाटिल… इसकी लिस्ट लंबी है।
इसलिए यह जरूरी है कि जातिआधारित सांख्यिकी के लिए जाति प्रमाणपत्र को भी देखना जरूरी है।
उधर खबर है कि महाराष्ट्र सरकार के मंत्री छगन भुजबल ने भी आयोग की इस प्रकार की कारवाई पर आपत्ति जताई है। दूसरा बीजेपी नेता देवेन्द्र फड़नवीस के अनुसार राज्य ओबीसी की संख्या कम दिखाने का काम कर रही है। लेकिन महाराष्ट्र के कई ओबीसी संगठन अलग भूमिका रखते हैं।
महाराष्ट्र के कई ओबीसी संगठनों के अनुसार जनगणना यह केंद्र सरकार का विषय है, इसलिए केंद्र सरकार द्वारा ही जाति आधारित जनगणना की जानी चाहिए। जाति आधारित जनगणना के लिए जनगणना के फॉर्म में ओबीसी का कॉलम जोड़ने की मांग ओबीसी संगठन कर रहे हैं।







