लिंगभेद की समस्या यह जागतिक समस्या है | लेकिन भारत में इस समस्या ने बहुत ही विदारक स्वरूप धारण किया है। विषमता यह हिन्दू समाज की विशेषता है। विषमता यह जातिवाद की संतान है। जातिवाद को धर्म ने जन्म दिया है। लेकिन सच तो यह है कि जाति को जन्म देने का साधन स्त्री को बनाया गया है। जिस स्त्री के पेट से बच्चे का जन्म होता है उसी के साथ उसकी जाति तय हो जाती है।
जाति व्यवस्था जिसे आधार बनाया गया है उस स्त्री का अगर विचार करते है तो वह समाज मे अस्तित्वहीन जीवन जीती है | वर्ण, जाति तथा वंश यह हिन्दू समाज व्यवस्था की नींव है। स्त्री की अवहेलना करनेवाली पुरुष संस्कृति ने स्त्री को अस्तित्वहीन करते समय यह विचार नहीं किया कि पुरुषों को जन्म देनेवाली एक स्त्री ही है। जगत का व्यवहार स्त्री के बिना अधूरा है। जगत के व्यवहार को चलाने के लिए स्त्री और पुरुष दोनों की आवश्यकता होती है। लेकिन जननी के रूप में स्त्री के महत्व को उजागर करना उतना ही महत्वपूर्ण है।
मानवी जीवन के अस्तित्व को बनाये रखने की महत्वपूर्ण भूमिका स्त्री को निभानी होती है। लेकिन भारत में हिन्दू संस्कृति में स्त्री की प्रतिमा को मलिन कर दिया गया। उस पर निकृष्ट जीवन थोपकर उसे गुलाम बनाया। जिस जगत की निर्मात्री ही गुलाम हो वह देश, समाज कैसा हो सकता है इसकी कल्पना हम कर सकते है | इस देश और समाज की निकृष्ठ और दुरावस्था का प्रमुख कारण उसके निर्मात्री की दुरावस्था ही है। उसकी दुरावस्था का प्रमुख कारण उसके स्वतंत्रता को छीनना तथा उसपर दासता थोपना है। स्त्री को उन्मार्गगामी, दुराचरणी ठहराकर उसे नजरकैद कर दिया गया। पुरूषों को उसका स्वामी बना दिया गया। यह स्वामी उस पर सत्ता चलने लगा।
भारतीय स्त्री के सन्दर्भ में अत्यंत दुखद घटना यह है कि एक मनुष्य के रूप में वह कभी भी कमजोर न थी। बल्कि वह पुरूषों से भी ज्यादा सामर्थ्यवान थी। इसका हवाला हमें इंडस सभ्यता से भी मिलता है। प्राचीन काल से आज तक स्त्रियों ने अपने कार्य और कर्तृत्व से सिद्ध किया है कि वें सामर्थ्यशाली है। आधुनिक समाज के विकास की जननी के रूप में उसका प्राचीन इतिहास हमें देखने को मिलता है| इसलिए पुरुषों ने स्त्रियों पर कितने भी लांछन लगाए हो लेकिन मानवी जीवन में उसके महत्व को कोई नकार नहीं सकते। स्त्री के बिना पुरुष जीवन अधूरा है यह मानने के लिए पुरुष तैयार नहीं है। लेकिन मानव जीवन में स्त्री महत्व वे अमान्य भी नहीं कर सकते। क्योंकि प्रजनन की प्रक्रिया यह स्त्री के बगैर संभव नहीं इसका अहसास पुरुषों को था। इस कमी को पुरुषों में स्त्री को देवता के रूप में स्वीकार कर पूरा किया। एक तरफ स्त्री को देवता बनाकर उसे पूजते है तो दूसरी तरफ उसे चरित्रहीन ठहराकर उसे अपमानित करते है। भारत में ऐसी ही दोगली पुरुषी मानसिकता का प्रचलन है।
आधुनिक काल में स्त्री-स्वतंत्रता तथा स्त्री-सक्षमीकरण के सन्दर्भ में अनेक आंदोलन चलाये जा रहे है। लेकिन स्त्री-सुधार का यह मार्ग इतना सरल नहीं। इस सुधार के मार्ग में जाति, धर्म, वंश यह प्रमुख अड़चनें है। क्योंकि स्त्री-दासता का विचार करते समय हमें इस दासता को धर्म, जाति, वंश, वर्ण के दुष्टिकोण से देखना होता है। उच्चवर्ण के स्त्री की दासता और कनिष्ठ वर्ण के स्त्री की दासता को हमें भिन्न भिन्न माध्यम से देखना होता है | क्योंकि उच्चवर्ण के स्त्रियों की समस्याएं कनिष्ठ वर्ण की स्त्रियों की समस्याओं से भिन्न है। उसके कारण भी अलग है।
उच्चवर्ण की स्त्रियों की समस्याएं पारिवारिक है। उनका शोषण भी पारिवारिक स्तर पर ही होता है। बल्कि कनिष्ठ वर्ण की महिलाओं की समस्याएं, दासता तथा शोषण का कारण मुख्य रूप से सामाजिक व्यवस्था के कारण है। कनिष्ठ वर्ग की स्त्रियों की सामाजिक समस्याओं ने उनके पारिवारिक तथा वैयक्तिक स्तर पर भी समस्याओं का निर्माण किया है। कनिष्ठ वर्ग की स्त्रियों का शोषण समाज करते आया है। उपभोग्य वस्तु के रूप में।
जिस प्रकार कनिष्ठ जाति के स्त्रियों का उपयोग हो रहा है उसकी कल्पना भी रोंगटे खड़े करनेवाली है। बहुजन स्त्रियों का उपभोग्य वस्तु के रूप में जो उपभोग किया है उसका इतिहास पढ़कर ही हमें इसका अंदाजा आ सकता है। उच्चजाति की महिलाओं के सन्दर्भ में एक बात कही जा सकती है कि वह पुरुषों के स्वामित्व के बोझ तले दबी हुई है। उसे निजी तौर पर अनेक यातनाएं सहनी पड़ी हो या रूढ़ि परंपराओं के माध्यम से उसे हर तरह से प्रताड़ित किया हो, लेकिन सामाजिक स्तर पर उसका लैगिक शोषण नहीं हुआ है। जबकि कनिष्ठ जाति की महिलाओं को इसका हर रोज मुकाबला करना होता है। इस हिन्दू धर्म संस्कृति के नियम और कायदों ने उच्चवर्णिय स्त्रियों को अनेक समस्याओं से मुक्त कराकर सुरक्षित किया है। लेकिन कनिष्ठ जाति के स्त्रियों को वह सुरक्षितता धार्मिक कायदों के माध्यम से नहीं मिल पायी है। जाति और वर्ण के अनुसार व्यभिचार के अपराध के सन्दर्भ में जो शिक्षाओं का प्रावधान किया गया है, उससे यह स्पष्ट होता है कि सामाजिक तौर पर उच्च जातियों कि स्त्रियों को सामाजिक संरक्षण प्राप्त है | लेकिन कनिष्ठ जाति की महिलाएं सभी के शोषण का शिकार सदियों से होती आयी है और हो रही है |
पुरुष प्रधान संस्कृति के माध्यम से तथा पुरुषी अहंकार ने समस्त स्त्री जीवन को समस्याओं से भर दिया है। उसके स्वाभिमान प्रतिष्ठा को तर-तर कर दिया है। स्त्री-समस्याओं का विचार करते है तो लैगिक अत्याचार यह उसकी प्रमुख समस्या है। लेकिन उसके जीवन के हर क्षेत्र में उसकी स्वतंत्रता छीन कर उसे निहत्था बनाकर उसका जीवन नरकमय बना दिया है। इस नरकमय यातना से मुक्त होने की चाहत जब तक स्त्रियों में निर्माण नहीं होती तब तक वह सही मायने में मुक्त नहीं हो सकती। स्त्रियों की मुक्ति के लिए सविधान में अनेक प्रावधान किये गए हैं। लेकिन मुक्ति की प्राप्ति के लिए स्वयंप्रयत्न करना भी उतना ही जरुरी है। स्त्रियों में कानून की समझ होनी चाहिए। स्त्री की मुक्ति की जिम्मेदारी उसकी अपनी होती है। यह सही बात है। लेकिन स्त्री-मुक्ति के प्रयास में समाज की भूमिका भी अहम् होती है। स्त्री की मुक्ति के लिए सामाजिक सुरक्षा भी अत्यंत आवश्यक है। स्त्रियों के सन्दर्भ में सकारात्मक भूमिका, उनके प्रतिष्ठा और स्वाभिमान के प्रति सजगता, स्त्री सन्मान का विचार, स्त्रियो के विकास में समाज का सहयोग तथा सबसे अहम् और महत्वपूर्ण बात यह की समाज में स्त्री की पहचान ‘स्त्री ‘ न होकर एक ‘मनुष्य’ के रूप में होनी चाहिए, तभी स्त्री की मुक्ति संभव है | क्योंकि स्त्री दासता यह समाज द्वारा उस पर लादी गई है यह उसकी इच्छा से उसने स्वीकारी नहीं है। इसलिए स्त्री मुक्ति के इस आंदोलन में स्त्री मानसिकता के साथ-साथ स्वस्थ सामाजिक मानसिकता कि भी आवश्यकता है, इससे इन्कार नहीं किया जा सकता।
====
डॉ सरोज डांगे (शामकुवर)
लेखक एवं सामाजिक कार्यकर्ता।
आप राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्व विद्यालय के
डॉ आंबेडकर विचाधारा विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर है।







