सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान चार मूलनिवासियों की मौत।

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इस देश में मैला ढोने की प्रथा पूर्ण रूप से प्रतिबंध है, लेकिन फिर भी आए दिन सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान हुई मौतों की खबर आती रहती हैं। हाल ही में उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान चार लोगो की मौत हो गई जबकि एक गंभीर रूप से घायल हो गया।

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इस देश में सर्वप्रथम उन्नीस सौ तिरांवें में मैला ढोने की प्रथा पर प्रतिबंध लगाया गया था। इसके बाद साल दो हजार तेरह में कानून बनाकर इस पर पूरी तरह से बैन लगाया गया।

हालांकि आज भी समाज में मैला ढोने की प्रथा मौजूद है। और समय समय पर इस काम के चलते लोग अपनी जान भी ग्वांते हैं। हैरान करने वाली बात यह हैं की इस काम को करने वाले लगभग सभी लोग देश के मूलनिवासी यानी एससी, एस्टी और ओबीसी वर्ग से ही आते हैं।

हाल ही में उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले में सेप्टिक टैंक में गिरने से चार लोगों की मौत हो गई। जिसमे से एक पिता और उसका बेटा भी शामिल हैं।

मिली जानकारी के मुताबिक पैतालीस वर्षीय मूलनिवासी नंदकुमार को रामनगर गांव में सेप्टिक टैंक साफ करने के लिए बुलाया गया था। सफाई के दौरान वे गिर गए और अंदर ही फंस गए, जिसके बाद उनका पच्चीस वर्षीय बेटा मूलनिवासी नितेश उसकी मदद के लिए दौड़ा और वह भी टैंक में फंस गया। बाद में तीन लोग और आए लेकिन वे भी फंस गए।

बाद में पुलिस द्वारा उन्हें बाहर निकाला गया और अस्पताल ले जाया गया। लेकिन अस्पताल में नंदकुमार, नितेश, चालीस वर्षीय दिनेश और बाइस वर्षीय आनंद को मृत घोषित कर दिया गया। वही मदद के लिए पहुंचा एक अन्य शख्स गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती है। जिसका इलाज चल रहा हैं।

मालूम हो की मैनुअल स्कैवेंजिंग एक्ट दो हजार तेरह के तहत किसी भी व्यक्ति को सीवर में भेजना पूरी तरह से प्रतिबंधित है। अगर किसी विषम परिस्थिति में किसी सफाईकर्मी को सीवर के अंदर भेजा जाता है तो इसके लिए सताइस तरह के नियमों का पालन करना होता है।

हालांकि इन नियमों के लगातार उल्लंघन के चलते आए दिन सीवर सफाई के दौरान श्रमिकों की जान जाने की खबर आती रहती हैं। इस कानून के अस्तित्व में आने के दस साल बाद भी भारत में सेप्टिक टैंक से होने वाली मौतों की खबरें अभी भी आए दिन सुनने और देखने को मिलती हैं।

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