समाज के किसी एक क्षेत्र में कार्यरत कोई व्यक्ति इतना लोकप्रिय हो जाता है कि उसका राजनीतिक गतिविधियों पर भी प्रभाव पड़ना शुरू होता है। लोग उसे नेता मानना शुरू कर देते हैं। लेकिन भारतीय राजनीति में व्यक्तिवादी राजनीति से अधिक विचारधारा की राजनीति महत्वपूर्ण है। वह इसलिए क्योंकि व्यक्तिवादी राजनीति व्यक्ति के साथ समाप्त हो जाती है।
इसका ताजा उदाहरण तामिलनाडु के रजनीकांत का है। रजनीकांत ने अपना सामाजिक संगठन रजनी मक्कल मंदरम बंद किया है। रजनीकान्त ने कहा है कि ‘उनका भविष्य में राजनीति में आने का कोई इरादा नहीं है। इसलिए, रजनी मक्कल मंदरम अब काम नहीं करेगा।’
रजनीकांत ने तामिलनाडु की राजनीति में एक दबाव जरूर बनाया लेकिन उसे वे संगठन का रूप नहीं दे पाए। बताया जाता है कि उनपर भाजपा ने अपनी राजनीतिक लाभ के लिए दबाव डाला था। तामिलनाडु में द्रविड़ और गैर द्रविड़ विचार का प्रभाव है। कोई राष्ट्रीय दल वहां अपनी जड़ें जमा नहीं सका है।
“काला” इस मूवी के कारण रजनीकांत काफी चर्चा में भी रहे। इसमें लिखें गए संवाद और किये गए चित्रण के कारण भी उनके बारे में अलग अलग चर्चा हुयी थी। तमिल में काला को ‘इरुमभाई थिराई’ नाम से रिलीज़ किया गया था। इस मूवी की रेकॉर्ड तोड़ कमाई हुयी थी।
आपको बता दें कि रजनीकांत द्वारा अपने संगठन को बंद करने और राजनीति में आगे न आने की खबर को अलग अलग लोग अलग अलग प्रकार से चर्चा कर रहे हैं। लेकिन इस खबर में से हमें यही सबक लेना है कि इसप्रकार से व्यक्तिआधारित संगठन उस व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर होते हैं, जिसने उसे बनाया है। व्यक्तिवादी संगठन के नेता अपने व्यक्तिगत हित के लिए संगठन का किसी भी प्रकार से उपयोग कर सकते हैं। इसलिए व्यक्तिवाद से बचें, विचारधारा को अधिक महत्व दें। मूलनिवासियों के लिए अपने पुरखों की विचारधारा पर आधारित लोकतांत्रिक संगठन ही हित में हैं।








