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जिस प्रदेश में मुख्यमंत्री द्वारा आदिवासियों के पैर धोए जाते हैं। उन्हीं के राज्य में आदिवासियों के हजारों एकड़ जमीनें गलत तरीके से गैर आदिवासियों को बेची जाती है। आंकड़ों के अनुसार पिछले बीस साल में बिरानवें हजार एकड़ जमीन गैर आदिवासियों को बेच दी गई।
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इस देश में मूलनिवासियों की आबादी देश की कुल आबादी का लगभग नब्बे फीसदी हैं। लेकिन देश की संपत्ति में उनकी हिस्सेदारी न के बराबर हैं। जबकि इनकी संख्या के अनुपात में इनकी हिस्सेदारी होनी चाहिए थी।
अगर जमीन की बात करे तो आज इस समाज के पास बहुत ही कम हिस्से में जमीन हैं। वो भी आज गैर कानूनी तरीके से इनसे छीना जा रहा हैं।
आंकड़ों की माने तो पिछले बीस साल में सिर्फ मध्य प्रदेश में अनुसूचित जनजातियों की बिरानवें हजार एकड़ जमीन गैर अनुसूचित जनजाति को बेची गई है।
जी आपने सही सुना, यह दस – बीस या सौ – दो सौ एकड़ नहीं बल्कि बिरानवें हजार एकड़ यानी इकतीस हजार छह सौ अड़तीस हेक्टेयर ज़मीन हैं। जो पिछले बीस साल से सिर्फ मध्य प्रदेश में अनुसूचित जनजातियों की जमीन गैर अनुसूचित जनजाति को बेची गई ।
मालूम हो की यह उसी राज्य के आंकड़े हैं जिस राज्य के मुख्यमंत्री आदिवासियों के पैर धोते और उनके साथ खाना खाते नज़र आते हैं। काश अगर मुख्यमंत्री ने संविधान का विशेष रूप से प्रचार प्रसार कर इन्हे इनके अधिकारो से अवगत कराया होता तो आज इनको शायद किसी के पैर धोने न पड़ते और शायद आज इस समाज की हजारों एकड़ जमीनें न बेची जाती।
इसमें गौर करने वाली बात यह है की मध्य प्रदेश भूराजस्व संहिता उन्नीस सौ उनसठ (1959) की धारा एक सौ पैसठ (165) के तहत प्रदेश के समस्त कलेक्टर ही आदिवासियों की जमीन गैर आदिवासियों को बेचने के संबंध में अनुमति दे सकते हैं।
लेकिन इन बिरानवे हजार एकड़ जमीन की खरीद बिक्री के ज्यादातर मामलों में एडीएम, एसडीएम और तहसीलदार स्तर के अधिकारियों की अनुमति से खरीद बिक्री हुई हैं।







