केंद्र की भाजपा सरकार उन सभी संवैधानिक संस्थाओं को निजी हाथों में सौंपती जा रही है जिसमें देश के समस्त नागरिकों के लिए प्रतिनिधित्व की व्यवस्था है। भारत में वर्ण और जाति व्यवस्था हावी है। जिन निजी हाथों में संवैधानिक संस्थाएं सौंपी जा रही है वह तथाकथित ऊंची जाति से संबंध रखते हैं जिन्होंने स्वतंत्र भारत में भारत के मूल निवासियों को उनके संवैधानिक अधिकार न देने की कसमें खायीं है क्योंकि वह अतीत की सामाजिक व्यवस्था के प्रति प्रतिबद्ध है संविधान के प्रति नहीं। वे चाहते हैं कि जातियों में बांटे गए मूल निवासी जातियां पूर्व की भांति कुम्हार बर्तन बनाए,चमार जूता सिले, अहीर दूध बेचे, कहार पानी भरे, जाट ,गुर्जर खेती करें, भंगी सफाई का काम करें,तेली तेल बेचे और उपरोक्त सभी निंदा रहित होकर ऊपर के तीनो वर्णों (ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य) की सेवा करें यही उनका धर्म है। शासन प्रशासन में उनकी कोई जरूरत नहीं। स्वराज प्राप्ति सवर्णों के लिए है शुद्र अति शुद्रों के लिए नहीं। क्योंकि बाल गंगाधर तिलक से जब पिछड़े वर्ग के लोगों ने स्वराज में अपने भागीदारी की बात उठाई तो उन्होंने उन्हें आगाह करते हुए कहा था, “मेरी समझ में नहीं आता कि ये तेली, तमोली और कुनभटे संसद में क्यों जाना चाहते हैं? तेली संसद में जाकर क्या तेल बेचेगा? कुर्मी संसद में जाकर क्या हल चलाएगा? तमोली क्या संसद में जाकर कपड़ा सिलेगा? “आज वह दृश्य देश की जनता के सामने परिलक्षित हो रहा है।
संवैधानिक संस्थाओं का निजी हाथों में बेचने का मतलब ऊंची जाति द्वारा भारत के मूल निवासियों के हक अधिकारों को नकारना। जिन आर्य पुत्रों के हाथों में संवैधानिक संस्थाएं होगी वे अपनी जाति बिरादरी के लोगों को ही प्रतिनिधित्व प्रदान करेंगे भारत के मूल निवासियों को नहीं क्योंकि मामला नस्लभेद का है। उन्होंने साम-दाम-दंड-भेद की धर्म की राजनीति से सत्ता हासिल किया है इसलिए मूल निवासी बहुजनों का सत्यानाश करना उनका धर्म है और वे वही करेंगे जो शास्त्र सम्मत है संविधान सम्मत नहीं। वे धर्म शास्त्रों के अनुसार मूल निवासियों को शिक्षा संपत्ति आदि सभी अधिकारों से वंचित करेंगे। मनु का धर्मादेश है- “शूद्राय मतिं न दद्दान्नो” शूद्रों को शिक्षा मत दो। मनु के धर्मादेश के अनुसार शूद्रों को संपत्ति रखने का अधिकार नहीं। “शक्तेनापि हि शुद्रेण न कार्यों धन संचय:। शुद्रम हि धनमासाद्द ब्राह्मणान नववाधते”। अर्थात- समर्थ होने पर भी शुद्र धन संचय न करें। उसके पास धन नहीं होना चाहिए अन्यथा वह ब्राह्मणों को दुख पहुंचाएगा। तैतरीय ब्राह्मण ग्रंथ के अनुसार-धृतं दुग्धं च तांबुलम श्रेष्ठं ऽन्नं तथैव च शुद्रं वर्जित:। शुद्र ग्रृहे न बासेत न च शुद्धं जलम पीवेत उच्च स्थानं वर्जित:। एषांम कारुणास्तु दुखम भवेत्। अर्थात-घी, दूध,पान,श्रेष्ठ अन्न आदि शूद्रों के लिए वर्जित है। शूद्रों को घर में नहीं रहना चाहिए। शुद्ध जल नहीं पीना चाहिए। ऊंचा स्थान शुद्रों के लिए वर्जित है क्योंकि इससे ब्राह्मणों को दुख होता है।
केंद्र की भाजपा सरकार आर्य ब्राह्मणों की शास्त्र सम्मत धारणा के अनुसार शासन सत्ता चलाना चाहती है जिसके कारण वह अतीत की पूर्व निर्धारित मूल्यों को सत्ता की ताकत से देश में प्रस्थापित करना चाहती है। भारत की संसद और विधानसभाओं में बैठे हुए मूलनिवासी जनप्रतिनिधि जो विभिन्न दलों से संबंध रखते हैं वह पद और प्रतिष्ठा के लिए अपने समाज का अपने हाथों से ही बेड़ा गर्क कर रहे हैं। उन्हें अभी भी इस बात का एहसास नहीं है कि आज नहीं तो कल शासक जातियां तुम्हें संसद और विधानसभाओं से धक्के मार कर बाहर कर देंगे उन्हें केवल इंतजार है इस बात का कि कब वे इस कार्य को अंजाम दे। हमारे देश में अत्याचार और उत्पीड़न अनाचार और दुराचार की बढ़ती घटनाएं शास्त्र सम्मत हैं और शास्त्र सम्मत धार्मिक धारणाओं को अंजाम देने का कार्य सत्ता में बैठी शासक जातियां कर रही हैं जिसमें मूलनिवासी बहुजन समाज के जनप्रतिनिधि भी शामिल हैं जिसकी उन्हें कोई परवाह नहीं। शास्त्र सम्मत धर्म की राजनीति में आर्य ब्राह्मणों की सावरेंटी है जबकि संविधान सम्मत राजनीति में भारत की समस्त जनता में सावरेंटी है जिसे आर्य ब्राह्मणों को स्वीकार नहीं। इसलिए वे धर्म की राजनीति द्वारा अपने अतीत के प्राचीन गौरव वर्ण और जाति व्यवस्था पर आधारित सामाजिक व्यवस्था को भारत में पुनः प्रस्थापित करना चाहते हैं।
भारत का संविधान भारत के समस्त नागरिकों को सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक न्याय प्रदान करना चाहता है जिसे आर्य पुत्रों को मंजूर नहीं क्योंकि संविधान उन्हें उनकी जनसंख्या के अनुपात में उन्हें हिस्सेदारी देना चाहता है जो भारत के मूलनिवासी संख्या में 90% है उन्हें उनकी जनसंख्या के अनुपात में हिस्सेदारी मिलना तय है। इसलिए शासक जातीयां एन केन प्रकारेण है केंद्र की सत्ता में बनी रहने के लिए साम दाम दंड भेद जो उनके पुरखों की दी हुई विरासत है उससे वे सत्ता में बनी रहना चाहती है। इसीलिए आर्य पुत्रों ने संकल्प लिया है कि वह सत्ता के माध्यम से अतीत का प्राचीन गौरव वापस लाएंगे जिसमें आर्यों के वंशजों को पूर्व की भांति पुनः उन्हें उनको जीवन के सभी क्षेत्रों में एकाधिकार प्राप्त हो सके, यह निजी करण से ही संभव है अन्य किसी मार्ग से नहीं। इसलिए केंद्र की भाजपा सरकार देश की तमाम संवैधानिक संस्थाओं का निजी करण करने पर तुली हुई है।…..






