नीडर बनो..लीडर बनो..

धर्म के ठेकेदार कहते हैं कि सबसे पहले हमसे डरो, मतलब
1) रसुखवालों से डरो,
2) फिर भगवान से डरो,
3) फिर शैतान से डरो,
4) पिछले जन्म और अगले जन्म के कर्मों से डरो,
5) ग्रह, तारों नक्षत्रों से डरो,
6) हाथ कि रेखाओं, जन्म कुण्डली से आने वाले भविष्य से डरो,
7) उपवास में उपवास अगर टूट जाये तो डरो,
8) मांगी हुई मन्नत पूरी न कर पाए तो डरो,
9) जादू- टोने से डरो,
10) नींबू- मिर्च के यंत्र से डरो,
11) चौराहों पर उतार के रखे हुये उतारे से डरो,
12) काली बिल्ली रास्ते में आ जाए तो डरो,
13) कव्वों की कांव- कांव से डरो,
14) रात को उल्लू दिखे तो डरो,
15) कुत्ते के रोने से डरो,
16) रात को गुल्लर, पीपल के पेड़ से डरो,
17) जुने पुरानें घरों में डरो,
18) रात को शमशान से गुजरते वक़्त डरो,
19) बायी आंख फड़फड़ाए तो डरो,
20) खाने में बाल आ जाए तो डरो,
21) कोई छींके तो डरो,
22) नये घर पर पुराना जूता न टांगे तो डर
23) बच्चों को काला टीका, काला धागा न बाँधे तो डर।
24) लड़कियों के पैर में काला धागा न बांधें तो डर।
25) बिना पंडित गृह प्रवेश करें तो डर।
26) बिना पंडित विवाह संस्कार करें तो डर
27) बिना ब्राम्हण मृत्यु संस्कार न करें तो डर
28) पति के लिए करवा चौथ न रखे तो पति के आकस्मिक मृत्यु का डर
29) पुत्र के लिए जिउतिया ब्रत न रखें तो आकस्मिक मृत्यु का डर
30) शादी में लाल जोड़ा न पहनें तो डर
31) इस दिन दाढ़ी, बाल बनवाने का डर
32) इस दिन पूरब,पश्चिम, उत्तर दक्षिण दिशा में जाने का डर
33) मंगलवार, वीरवार मांस मदिरा खाने पीने का डर
डरो.. डरो.. डरो.. और सिर्फ धर्म के नाम पर डरते रहो….
इस प्रकार हजारों डरावनी
दिनचर्या स्थापित कर रखी गई है धर्म के ठेकेदारों द्वारा और
भी बहुत सारे डर हैं जो सिर्फ भारत मे बडे़ गर्व से थोपे जाते है!
इसी डर के कारण लोग पूजा, पाठ,व्रत,जागरण,जगराता
अस्टजाम,कीर्तन,कथा, आदि चीजें करवाता है

क्योकि धर्म के ठेकेदार धर्म के नाम पर लोगों के दिमाग को ताला लगाकर, चाबी अपने पास रखते हैं ।
लोगों को अपनी बुद्धि और तर्क से सोचने देते ही नहीं…
धार्मिक रहते हुए में तर्क करना प्रतिबंधित है। यदि
तर्क किया तो राक्षस, कुलद्रोही,राष्ट्रद्रोही, धर्मद्रोही घोषित कर दिया जाता है
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अगर किसी बच्चे को उपहार न दिया जाए तो वो कुछ देर तक रोयेगा, मगर
तर्कवादी, विज्ञानवादी, प्रकृतवादी शिक्षा व संस्कार ना दिए जाएं तो
वह जीवन भर रोयेगा। इसलिए समाज को तर्कशील बनाओं, तााकि हर नागरिक तर्कवादी होकर अपना भला बुरा सोच सके।

…...डाॅ विजय कुमार त्रिशरण, झारखंड

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