सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान फिर दो मूलनिवासियों की मौत।

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कानपुर में तीन और गुड़गांव में दो सफाईकर्मी की मौत।

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इस देश में आज भी लोगो के काम देखकर उसकी जाति बताई जा सकती हैं। आज भी हाथ से मैला ढोने वाले लगभग अंठानवे फीसदी कर्मचारी मूलनिवासी यानी एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग के हैं । जिनमे सबसे अधिक अनिसुचित जाति से संबंधित हैं।

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इस देश में आज भी सेप्टिक टैंक साफ करने वाले या हाथों से मैला ढोने वाले लगभग सभी कर्मचारी अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या अन्य पिछड़े वर्ग से आते हैं। सफाई के दौरान इनकी मौत की ख़बर भी लगभग हर दूसरे या तीसरे दिन आ जाती हैं।

हाल ही में आई खबर के मुताबिक उत्तर प्रदेश के कानपुर ज़िले के चौबेपुर क्षेत्र में एक सेप्टिक टैंक की शटरिंग हटाते वक़्त ज़हरीली गैस के संपर्क में आने से तीन लोगों की मौत हो गई। वहीं, हरियाणा के गुड़गांव में एक घर के सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान दम घुटने से एक सफाई कर्मचारी और एक अन्य व्यक्ति की मौत हो गई।

कानपुर में जिन तीन सफाई कर्मचारियों की मौत हुई हैं उनमें से एक कि उम्र मात्र सौलह साल की हैं। जबकि दूसरे और तीसरे की उम्र क्रमशः अठारह और चौबीस साल हैं।

पुलिस उपायुक्त विजय ढुल ने बताया कि चौबेपुर के निवासी अठारह वर्षीय नंदू , उसका बड़ा भाई और पड़ोस में रहने वाला सौलह वर्षीय साहिल बिठूर क्षेत्र में कुछ महीने पहले बने एक सेप्टिक टैंक की शटरिंग हटाने के लिए उसमें दाखिल हुवा था। जहा जहरीली गैस के संपर्क में आने से बेहोश हो गए। उन्होंने बताया कि साहिल शटरिंग हटाने के लिए टैंक में उतरा था, लेकिन जहरीली गैस की वजह से वह बेहोश हो गया। उसे बचाने के लिए नंदू और मोहित भी टैंक में उतर गए लेकिन वे भी बेहोश हो गए। जिसके बाद तीनों को लाला लाजपत राय अस्पताल ले जाया गया जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

वही पुलिस द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक , गुड़गांव के मोहम्मदपुर झाड़सा गांव के एक घर के सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान दम घुटने से एक सफाई कर्मचारी और एक अन्य व्यक्ति की मौत हो गई। दोनों लोग सेप्टिक टैंक की सफाई करने के लिए बिना किसी सुरक्षा उपकरण के घुस गए थे। जहरीली गैस के कारण उनका दम घुटने लगा और वह बेहोश हो गए।

दोनों को टैंक से बाहर निकालने के बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने दोनों को मृत घोषित कर दिया।

इन दोनों ख़बरों के पहले भी महाराष्ट्र के पुणे शहर के वाघोली इलाके में जल निकासी चैंबर एवं सेप्टिक टैंक में काम करने के दौरान तीन मजदूरों की मौत की ख़बर आयी थी। इसके अलावा तमिलनाडु के श्रीपेरुम्बदूर स्थित एक रिजार्ट का सेप्टिक टैंक साफ करने के दौरान तीन लोगों की दम घुटने से मौत की ख़बर आयी थी।
ये कोई एक या दो मामले नही है बल्कि इस तरह के सैकड़ो उदाहरण हैं।

आंकड़ो की माने तो अधिकतर सफाईकर्मी अनुसूचित जाति से सम्बन्धित होते हैं। उसके बाद अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्ग के लोग भी सफाईकर्मी के आंकड़ो में शामिल है।

साल दो हजार इक्कीस तक के सरकारी आंकड़ो की ही माने तो हाथ से मैला उठाने वाले
जिन अंठावण हजार अंठानवे व्यक्तियों की पहचान हुई है, उनमें से सिर्फ तियालीस हजार सात सौ सन्तानवे व्यक्तियों के जाति से संबंधित आंकड़े उपलब्ध हैं। जिनमे बयालीस हजार पांच सौ चौरानवे यानी लगभग सन्तानवे प्रतिशत से भी ज्यादा अनुसूचित जातियों से संबंध रखते हैं। इसके अलावा चार सौ इक्कीस अनुसूचित जनजातियों से, चार सौ इकतीस अन्य पिछड़े वर्गों से और तीन सौ इक्यावन अन्य वर्गों से हैं ।

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