मामला यह है कि 2020-21 में यूजी, पीजी मेडिकल और डेंटल कोर्स में आरक्षण की याचिका दायकर की गयी थी। गुरूवार को सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस एल नागेश्वर राव की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने इस मामले को वापस हाईकोर्ट में ले जाने के लिए कहते हुए कहा की कोई भी आरक्षण के अधिकार को मौलिक अधिकार नहीं कहा जा सकता। इसलिए कोटा का लाभ नहीं देना किसीसंवैधानिक अधिकार का उल्लंघन नहीं माना जा सकता है।

सीपीआई, डीएमके और अन्य नेताओं द्वारा यह याचिका दायर की गयी थी। याचिका में कहा गया था की तमिलनाडु में 50 प्रतिशत सीटों को यूजी पीजी चिकित्सा और दंत चिकित्सा (मेडिकल) 2020-21 के पाठ्यक्रमों के लिए अखिल भारतीय कोटा में तमिलनाडु में आरक्षित रखी जानी चाहिए।
तामिलनाडु में ओबीसी, एससी, सटी के लिए 69 प्रतिशत आरक्षण है और इसमें ओबीसी को करीब 50 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था हैं इसके बावजूद शैक्षणिक सत्रों में देश के मेडिकल काॅलेजों में प्रवेश के लिए आल इंडिा कोटा सीट में अन्य पिछडे वर्ग का प्रतिनिधित्व कम रहा है। याचिकाकर्ताओं ने कहा की तामिलनाडु में नीट(मेडिकल) की परिक्षा में ओबीसी को 50 प्रतिशत आरक्षण दिया जाए और कोर्ट इस बारे में संविधान के अनुच्छेद 32 का उपयोग करके इसमें दखल दें। सीपीआई, डीएमके और उसके कुछ नेताओं द्वारा यह याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की गयी थी। सुप्रीम कोर्ट की नागेश्वर की अध्यक्षतावाली पीठ ने कहा कि आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है अतः इस केस को हाईकोर्ट में दायर करें।
इस याचिका में यह भी बात उठायी गयी है की “केंद्र सरकार के मंत्रालयों और सांविधिक निकायों के तहत केवल 12 प्रतिशत कर्मचारी अन्य पिछड़ा वर्ग के सदस्य हैं। आंकड़ों से पता चलता है कि 79,483 पदों में से, ओबीसी के सिर्फ 9,040 हैं।”







