जो लोग वाकई में बहुजन समाज का निर्माण करना चाहते हैं उन्हें सर्वजन, दलित, ग्रेट चमार, परिवारवाद सुप्रीमोवाद का मोह छोड़ना होगा।
वह भी केवल वैचारकी में नहीं बल्कि चुनाव के समय भी।
आप बहुजन समाज निर्माण की घोषणा करते हैं परंतु चुनाव के समय आप सर्वजनवाद, दलितवाद, ग्रेटचमारवाद, परिवारवाद, सुप्रीमोवाद या जातिवाद के साथ चले जाते हैं तो इससे आपका दोहरा मापदंड उजागर हो जाता है। आप की घोषणा का खोखलापन भी सबको नजर आ जाता है कि वास्तव में आप बहुजन समाज निर्माण के प्रति ईमानदार नहीं हैं। चुनाव के समय आपका व्यवहार ही वास्तविक मापदंड होता है कि आप बहुजन समाज चाहते हैं या फिर आप सुप्रीमोवाद परिवारवाद जातिवाद ग्रेट चमारवाद दलितवाद में ही उलझे हुए हैं। यदि आप वाकई में बहुजन समाज निर्माण करना चाहते हैं तो चुनाव के समय भी बहुजन वैचारकी के साथ काम करने वाले लोगों के साथ आपको खड़ा होना पड़ेगा। कहते हैं कि समाज को आप वास्तव में वैसे ही दिखते हैं जैसे आप वास्तव में होते हैं ना कि जैसा आप होने का बहाना बनाते हैं। इसलिए मूलनिवासी बहुजन समाज के सभी बुद्धिजीवियों को जिसमें प्रोफेसर एडवोकेट डॉक्टर इंजीनियर और लेखक शामिल है को बौद्धिक ईमानदारी दिखाते हुए एक ही विचारधारा वैचारिकी के समय और चुनाव के समय दिखानी चाहिए और जो वाकई में बहुजन समाज के निर्माण में गंभीर हैं उन्हें चुनाव के दौरान भी ऐसे दलों का समर्थन करना चाहिए जो एससी एसटी ओबीसी और इनसे कन्वर्टेड माइनॉरिटी को जोड़कर मूलनिवासी बहुजन राजनीति के प्रति लोकतांत्रिक ढंग से सक्रिय है।

यदि आप केवल वैचारकी के समय बहुजनवाद की बात करते हैं परंतु चुनाव में आप सर्वजन, दलित, ग्रेट चमार, जातिवाद, सुप्रीमोवाद या फिर परिवारवाद के मोह में उलझ कर उनका समर्थन करते हैं तो इससे न केवल आपका दोहरा चरित्र उजागर होता है बल्कि बहुजनवाद के लिए वाकई में काम करने वालों के बारे में समाज में गलत मैसेज भी जाता है। आप भले चार साल बहुजनवाद पर भाषण देते हैं लेकिन चुनावी वर्ष के समय दलितवाद ग्रेटचमारवाद या सर्वजनवाद को समर्थन देते ही आपके 4 साल की मेहनत पर पानी फिर जाता है। आप के इस दोहरे व्यवहार से उनके लिए चुनौती और बढ़ जाती है जो वाकई में बहुजनवाद के लिए समर्पित होकर ईमानदारी से काम कर रहे हैं। आप जैसे लोगों के व्यवहार को देखकर लोग उन पर भी शक की निगाह से देखते हैं कि यह भी वास्तव में बहुजनवाद के लिए काम नहीं कर रहे होंगे या नहीं? इसलिए आपके इस व्यवहार से उसकी चुनौती और बढ़ जाती है जो वाकई में बहुजन समाज निर्माण के लिए काम कर रहे हैं।
यशकाई डीके खापर्डे साहब का मानना था की वही समाज शासक करती जमात बन सकता है जो समाज में सैद्धांतिक रूप से अपने को बहुसंख्यक सिद्ध करता है और यही बहुजनवाद है। बुद्ध से लेकर ज्योतिबा फुले और बाबासाहेब आंबेडकर तक इसी बहुजनवाद के कंसेप्ट पर काम किये। इन महापुरुषों ने जाति नहीं जमात के लिए काम किया। इन्होंने जातियों को जोड़कर जमात बनाने का काम किया। जहां ज्योतिबा फुले ने शूद्र और अति शूद्र को एक साथ जोड़ कर बहुसंख्यक सिद्ध किया वही बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर ने एससी, एसटी, ओबीसी को एक साथ जोड़ कर बैकवर्ड क्लास के रूप में परिभाषित कर बहुसंख्यक सिद्ध किया। मान्यवर कांशी राम ने अपना पूरा जीवन बहुजनवाद को स्थापित करने में लगाया।
परंतु दुख इस बात का है कि हमारे में से ही कुछ दिग्भ्रमित लोग और कुछ ब्राह्मणवादी शक्तियों के इशारे पर काम करने वाले लोग कभी दलितवाद, कभी जातिवाद, कभी सर्वजनवाद तो कभी ग्रेटचमारवाद के नाम पर समाज को दिग्भ्रमित करते हैं। सर्वजनवाद बहुजन समाज पार्टी में तब लाया गया है जब ब्राह्मणों ने उसमें घुसपैठ किया क्योंकि सर्वजनवाद से वर्ग संघर्ष समाप्त हो जाता है और दोस्त और दुश्मन की पहचान खत्म हो जाती है और आपके आंदोलन का उद्देश्य भी समाप्त हो जाता है और आप का आंदोलन भी समाप्त हो जाता है। दलितवाद, ग्रेट चमारवाद या जातिवादी संगठन ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद के लिए कोई चुनौती पेश नहीं करते हैं। इसीलिए ब्राह्मणवादी मीडिया ग्रेट चमारवाद, दलितवाद, सर्वजनवाद को प्रचारित करता है परंतु मूलनिवासीवाद या बहुजन वाद की चर्चा परिचर्चा नहीं करता है। सर्वजनवाद, दलितवाद ग्रेट चमार वाद या जाति के आधार पर राजनीति करने से किसी नेता विशेष का थोड़े समय के लिए फायदा हो सकता है परंतु दीर्घकालिक रूप में यह समाज को बहुत नुकसानदाई होगा। हमें फूले और अंबेडकर सहित मूलनिवासी बहुजन समाज में जन्मे सभी महापुरुषों की विचारधारा पर चलते हुए 6743 जातियों में विभक्त एससी एसटी ओबीसी और इनसे कन्वर्टेड माइनॉरिटी को एक साथ जोड़कर बहुजन बनाना होगा और यह काम मूलनिवासी बहुजन पहचान के आधार पर आसानी से किया जा सकता है। सुप्रीमोवाद या व्यक्तिवाद परिवारवाद के माध्यम से 6743 जातियों को एक साथ नहीं जोड़ा जा सकता क्योंकि व्यक्तिवाद सुप्रीमोवाद और परिवारवाद से अंत में जातिवाद स्थापित हो जाता है। अगर हमें 6743 जातियों को जोड़कर बहुजन बनाना है तो यह कार्य लोकतांत्रिक और संस्थागत नेतृत्व के अधीन ही हो सकता है। यह कार्य कठिन है परंतु असंभव नहीं है और बामसेफ संगठन इस कार्य को करने में लगा हुआ है जिसमें आप सभी साथियों का सहयोग वांछित है। सभी मूलनिवासी बहुजन साथियों को चाहिए कि वह सर्वजनवाद, दलितवाद, ग्रेटचमारवाद, परिवारवाद, सुप्रीमोवाद और जातिवाद को छोड़कर मुलनिवासी बहुजन पहचान पर लोकतांत्रिक एवं संस्थागत नेतृत्व के आधार पर संगठित हों जाय इसी में समाज का हित सुरक्षित है।
संदर्भ मूलनिवासी टाइम्स (हिंदी पाक्षिक, दिल्ली)




