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सरकार की निजीकरण नीति के कारण निर्माण हुयी संविदा कर्मियों को समस्या। – एड डॉ प्रमोद कुमार
कोविड -19 इस राष्ट्रीय आपदा में फ्रंटलाइन वर्कर्स काफी बेहाल हो गए है, जिसके चलते इन हजारों कोरोना वॉरियर्स में से जिनकी कोरोना के कारण मृत्यु हुई है उनके परिवार के लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकारों ने क्या क्या मदद घोषित की है? यह अभी भी चर्चा का विषय बना हुआ है।
उत्तराखंड में पिछले एक साल से ज्यादा समय से कोविड काल में फ्रंटलाइन वर्कर्स के रूप में काम कर रहे 4500 नेशनल हेल्थ मिशन (एनएचएम) से जुड़े कर्मचारी अब अपनी जान और भविष्य की सुरक्षा मांग रहे हैं। राज्य में दर्जनों हेल्थ प्रोग्राम का क्रियान्वयन और संचालन करने के लिए जिम्मेदार यह कर्मचारियों को हड़ताल करना पड़ा। उन्होंने होम आईसोलेशन के तहत अपना प्रतीकात्मक हड़ताल प्रदर्शन किया। अब वे काला फीता लगाकर काम करेंगे।
आपको बता दें कि , कोविड संक्रमण के दौरान एनएचएम के कर्मचारियों ने कई मोर्चों पर काम किया। राज्य में ज्यादातर चेकपोस्टों, बस अड्डों, रेलवे स्टेशनों और एयरपोर्ट पर सैंपलिंग की जिम्मेदारी एनएचएम कर्मचारियों को दी गई थी। इसके अलावा घर-घर जाकर सैंपलिंग करने, होम आईसोलेशन वाले पेशेंट का किट पहुंचाने और समय-समय पर उनकी काउंसिलिंग करने, सचिवालय, सीएम आवास, राजभवन जैसी महत्वपूर्ण जगहों पर सैंपलिंग और वैक्सीनेशन करने, कोविड और वैक्सीनेशन संबंधी सभी तरह के आंकड़े और रिपोर्ट भारत सरकार के पोर्टल पर अपलोड करने, वैक्सीनेशन स्लाॅट मैनेज करने जैसे कई काम इन कर्मचारियों को सौंपे गये थे।
कोविड के अलावा भी उत्तराखंड में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन को कई हेल्थ कार्यक्रमों के संचालन और क्रियान्वयन की जिम्मेदारी दी गई है। इनमें मुख्य रूप से मातृत्व स्वास्थ्य और शिशु स्वास्थ्य, परिवार कल्याण, किशोर एवं बाल स्वास्थ्य, टीकाकरण, हीमोग्लोबिनपैथी, पीएनडीटी, आशा कार्यक्रम, हेल्थ एवं वेलनेस सेंटर, शहरी स्वास्थ्य मिशन, आईडीएसपी, तंबाकू नियंत्रण, आरएनटीसीपी आदि शामिल हैं।
संविदा में भर्ती हुए यह कर्मचारी आवाज उठा रहे हैं। प्रमुखता से इन कर्मचारियों की मुख्य मांग सामूहिक स्वास्थ्य बीमा और जीवन बीमा है, ताकि कोविड संक्रमण के दौरान फ्रंटलाइन वर्कर्स के रूप में काम करने वाले एनएचएम कर्मचारियों का इलाज हो सके और यदि किसी कर्मचारी की मौत हो जाए तो उसके परिवार को आर्थिक सहायता मिल सके।
जानकारी के अनुसार उन्हें राज्य सरकार की ओर से गोल्डन कार्ड तक की सुविधा नहीं दी गई है। इसके अलावा वे लाॅयल्टी बोनस की मांग कर रहे हैं, जो 2018 से नहीं मिला है। संगठन की ओर से 18000 रुपये न्यूनतम वेतन और हर वर्ष 5 प्रतिशत वेतन बढ़ोत्तरी जैसी पुरानी मांगें भी की जा रही हैं।
बता दे की एनएचएम कर्मचारी 1 जून से होम आईसोलेशन पर चले गये थे। पहले उन्होंने 6 जून तक हड़ताल की घोषणा की थी।
इस विषय पर हमने उत्तराखंड के एडवोकेट डॉ प्रमोद कुमार इनके साथ बातचीत की। एड प्रमोद कुमार, पीपल्स पार्ट ऑफ इंडिया डेमोक्रेटिक के उत्तराखंड के प्रदेश अध्यक्ष है। उन्होंने कहा कि यह समस्याएं सरकार की निजीकरण की निति के कारण हुयी है। बीजेपी हो या कांग्रेस इन दोनों की यही नीति रही है। निजीकरण के आड़ यह लोग अपनी ही बनायीं नीतियों के खिलाफ करते हैं।
उन्होंने कहा कि हम इन संविदा एनएचएम कर्मचारियों के हक़ अधिकारों के पक्ष में हैं, उन्हें भर्ती नियमों का पालन करते हुए नियमित सेवा के तहत लिया जाए।







