वीडियोकॉन और डीएचएफएल को दिया बैंकों ने 84000 करोड़ का कर्ज
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वर्ष 1986 में शुरू हुई निजी क्षेत्र की वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज भारत की पहली ऐसी कंपनी मानी जाती है जिसे रंगीन टीवी बनाने का लाइसेंस मिला था। बैंकों के करीब 46000 करोड़ रुपये कर्ज लेकर भी यह कंपनी दिवालिया हो गयी. जिसके चलते बैंको का भारी नुकसान हुआ है। यह कंपनी अब 3000 रु करोड़ में बेची जा रही है। अर्थात 46000 करोड़ में से केवल 3000 करोड़ ही बैंकों को मिलेंगे।
दिवालियापन मामलों को देखने वाली नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल अर्थात एनसीएलटी ने ट्विन स्टार इस कंपनी को 3,000 करोड़ रुपये में वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज का अधिग्रहण करने की मंजूरी दे दी है। अनिल अग्रवाल जो वेदांता ग्रुप के मुखिया हैं उनकी यह ट्विन स्टार यह कंपनी है। निजी क्षेत्र पर नजर रखनेवालों का कहना है कि वेदांता ग्रुप सरकार का चहेताहै।
आपको बता दें कि वीडियोकॉन और डीएचएफएल जैसी कंपनियों में रिटेल निवेशकों की पूरी रकम गई है। दोनों कंपनियां डीलिस्ट हो गई और NCLT के आदेश के बाद शेयर होल्डर्स की इक्विटी जीरो हो गई है।
मनी कंट्रोल इस बिजनेस न्यूज की वेबसाइट ने लिखा है वीडियोकॉन कंपनी पर बैंको का 46,000 करोड़ रुपए का लोन था। जो SBI, IDBI Bank जैसे बैंकों से लिया गया। साथ ही डीएचएफएल पर बैंकों का 38,000 करोड़ रुपए का कर्ज था। इस कंपनी को SBI, BoB, Indian Bank ने लोन दिया था।
आपको बता दें कि, वीडियोकॉन को दिया गया कर्ज कोई एक दो वित्तीय संस्थाओं ने नहीं दिया है, बल्कि इस समूह को कुल 54 वित्तीय संस्थाओं ने लोन दिया है।
आपको बता दें कि निजि क्षेत्र के साथ हमेशा सरकारी कंपनियों की तूलना कर सरकारी क्षेत्र को नीचा दिखाया जाता है। लेकिन इस प्रकार से निजी क्षेत्र की कंपनिया डूब जाती है तो कोई इसकी क्षमता और विश्वसनीयता पर सवाल नहीं उठता है.
आपको बता दें कि वीडियोकॉन पर कुल 90,000 करोड़ और DHFL पर कुल 87,000 के दावे थे। जाहिर है कि बैंको के साथ साथ इन कंपनियों में जिन्होंने अपना शेयर के रूप में छोटा बड़ा निवेश किया था उनको भी नुकसान हुआ है।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि सरकारी वित्तीय संस्थानों में सरकार और नागरिकों का पैसा होता है। बैंको में पैसा रखनेवाले नागरिक देश के टैक्स पेयर होते हैं। बैंकों और सरकारी वित्तीय संस्थाओं के पैसे डूबने का अर्थ यह होता है जनता द्वारा जमा किये गए टैक्स से मिले पैसे का डूबना। इसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था, देश की तिजोरी और सरकार के बजट पर पड़ता है।
इन कंपनियों के डूबने से न केवल वित्तीय संस्थानों और सरकार का नुकसान होता है बल्कि इनपर निर्भर हजारों कर्मचारियों पर भी बेकारी की मार पड़ती है।







