कुछ सप्ताह पहले और पिछले वर्ष ‘रेल कोविड केयर आइसोलेशन कोच’ की ढेरों तस्वीरें और खबरें आपने अखबारों में और इंटरनेट पर खूब देखें होंगे। इंडियन रेलवे के ट्विटर पर 5 मई 2021 तक का एक पोस्टर जारी किया। उसमे लिखा था कि रेलवे द्वारा 4,400 कोचों को आइसोलेशन कोच में तब्दील कर 70,000 बेड तैयार किये जा चुके हैं। इसपर पीएम नरेंद्र मोदी का अच्छी पोज वाला फोटो भी था।
लेकिन इन कोविड केयर कोच का इस्तेमाल किस प्रकार से और कहां-कहां हो रहा है? इसकी जानकारी आपको मिनिस्ट्री ऑफ रेलवेज या मिनिस्टर ऑफ रेलवेज के ट्विटर पर ढूंढना पड रहा है।
लेकिन आपको वहां ऑक्सीजन एक्सप्रेस की जानकारी जरूर मिलेगी। अडानी और रिलायंस फाउंडेशन के लोगो वाले टैंकर दिखाई देंगे। अन्य कंपनियों के भी टैंकर है।
रेलवे के अनुसार 34 ऑक्सीजन एक्सप्रेस ट्रेनों से विभिन्न राज्यों में तरल ऑक्सीजन भी उपलब्ध करायी जा रही है।
इन सारे प्रयासों को देख कोई भी यह सोचेगा कि यह ठीक है लेकिन यह कोचेस कहा है? इसका कैसे उपयोग हो रहा है?
हाल ही में रेल मंत्रालय के एक केंद्रीय अधिकारी ने एक न्यूज एजेंसी को बताया कि अभी तक अभी तक 348 कोचेस आठ राज्यों में लगाए गए हैं। दिल्ली, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, आसाम, नागालैंड और त्रिपुरा इन राज्यों को यह कोच दिए गए हैं। अधिकारी का यह कहना है कि राज्यों की मांग के अनुसार यह दिए गए है।
आपको बता दें, देश में कई महानगर ऐसे हैं, जहां ऑक्सीजन बेड नहीं मिलने के कारण लोग जान गवां बैठे हैं। कई तहसील ऐसे हैं, जहां मरीजों को मजबूरन पेड के नीचे गद्दे पर रखकर सलाइन दी जा रही। कई जगह ऑक्सीजन बेड, वेंटिलेटर आदि की सुविधा नहीं मिल पा रही है। जो रसूखदार है, जो आर्थिक रूप से कहीं न कहीं से नीजि अस्पतालों का खर्चा उठा रहे रहे हैं उन्हें कहीं कहीं से बेड उपलब्ध हो रहे हैं। लेकिन सामान्य लोगों का क्या? डिजिटल इण्डिया में लोगों को पता नहीं चल रहा कि कौनसे अस्पताल में बेड मिल सकता है। कहां से दवाई मिल सकती है।
ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि क्या रेलवे ने देश के महत्वपूर्ण स्थानकों पर इन कोचेस को खड़ा किया है? या यह भी राज्य की मांग पर निर्भर रहा है? अभी तक 4400 में से 348 कोचेस की जानकारी उपलब्ध हो पायी है। बाकी कहां है? क्या इसके इस्तेमाल करने में कोई कठिनाई है? क्या इसे इस्तेमाल में लाने के लिए डॉक्टर्स, नर्स, दवाई, वेंटिलेटर्स, ऑक्सीजन आदि की कमी है? यह सारे सवाल उठते हैं। क्यों रलवे के ट्विटर आदि पर इसकी जानकारी नहीं प्रकाशित होती है? अगर होती तो प्रचार में आगे रहनेवाले केंद्र सरकार के मंत्रीगण जरूर इसे बतातें।








