स्वास्थ्य व्यवस्था ठीक हुयी तो कोरोना क्या, कई रोगों से ठीक हो सकते हैं मरीज।

पिछले कुछ दशकों में सामने आयी अधिकतर संक्रमणशील बीमारियां शहरों से ग्रामीण इलाके में फैल गयी। ग्रामीण क्षेत्र जहां डॉक्टर-नर्स नहीं पहुंचते वहां अब खांसी, बुखार, पेट दर्द, उलटी के मामले तेजी से सामने आ रहे हैं। कोरोना संक्रमण के लक्षण दिखाई दे रहे हैं लेकिन लोगों को इसके बारे में अभी भी जानकारी नहीं है। न कोई स्वास्थ्य सुविधा, न कोई परामर्श। दवाइयां तो बाद की बात है।

आपको यह जानकर बिलकुल हैरानी नहीं होगी कि भारत में एक सरकारी डॉक्टर 10 हजार से अधिक लोगों पर निगरानी कर रहा है। जहाँ देश की ग्रामीण जनसंख्या 70 प्रतिशत है।

दूसरी होर नीति आयोग की के 2019 में प्रकाशित एक रिपोर्ट हेल्दी स्टेट्स प्रोग्रेसिव इंडिया खुद कहती है कि भारत का स्वास्थ्य क्षेत्र एक बड़े संकट से जूझ रहा है। उत्तर प्रदेश, बिहार कर ओड़िशा जैसे राज्य बुरी हालत में है। ग्रामीण स्वास्थ्य अपर्याप्त बुनियादी ढांचा और मानव संसाधन की कमी का सामना कर रहा है।

कोरोना काल में देश की स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाली खुलकर सामने आयी। इसको लेकर कभी राज्यों ने केंद्र की आलोचना की तो कभी केंद्र ने राज्यों को कोसा। आपको बता दें कि केंद्र के अनुसार राज्यों को 38 हजार से अधिक वेंटिलेटर मिले हैं। लेकिन राज्यों ने कहा कि उनमें से कई काम नहीं कर रहे हैं। रिपोर्ट सामने आई की कई जगह वेंटिलेटर इनस्टॉल तक नहीं हुए।

खबरें यह बताती है कि 350 से ज्यादा जिला अस्पताल और तहसील स्तर पर वेंटिलेटर नहीं है। जहां वेंटिलेटर है वहां उसे चलने के लिए प्रशिक्षित लोग नहीं है। यह बात पीएम नरेंद्र मोदी के कथन से स्वयं सिद्ध होती है।

यह बात हमेशा कोरोना के इर्द गिर्द ही घूमती दिखाई देती है। लेकिन देश में फैली अन्य बीमारियों का क्या? बच्चे, गरोदर माताओं की स्वास्थ्य का क्या? सरकार क्यों नहीं अच्छा और मुफ्त दवाइयों वाला स्वास्थ्य केंद्र खोल पायी? क्या इस सभी में सरकार ने जमा खर्च का ही ख्याल करना है।

जानकार यह बताते हैं कि अगर देश की स्वास्थ्य व्यवस्था ठीक की गई तो कोरोना के साथ-साथ कई रोगों से मरीज ठीक हो सकते हैं। बशर्ते यह सरकार की नीति होनी चाहिए। इस देश में जहां एक ओर सरकारें निजी क्षेत्र को ज्यादा तवज्जो दे रही है वहां सरकारी स्वास्थ्य केंद्र के बारे में क्या गंभीरता से सोचा जा सकता है?

हमेशा केंद्र सरकार यह रोना रोती है कि स्वास्थ्य विषय राज्यों का है। लेकिन देश की स्वास्थ्य व्यवस्था को मजूबत करने के लिए बजट में व्यवस्था कर राज्यों को मदद करने के लिए केंद्र सरकार को किसने रोका है?

आपको बता दें कि तथ्य यह बताते हैं कि देश के बीस प्रतिशत लोग ही बीमारी के दौरान आवश्यक दवाइयों को खरीदने में सक्षम होते हैं। वे लोग जो गरीब नहीं माने जा सकते ऐसे लोग भी दवा, परमर्श, अस्पताल संबंधी खर्च उठाने में आर्थिक कठिनाइयां महसूस करते हैं। आपको यह भी बता दें कि एक अध्ययन के अनुसार भारत में बीमारी या चोट लगने के कारण अस्पताल में भर्ती हुए चालीस प्रतिशत लोग खर्चे के भुगतान के लिए या तो उधार लेते हैं, या अपनी संपत्ति का कुछ बेचते हैं।

निजी अस्पताल दर्शनी तौर पर तो बहुत प्रॉम्प्ट आदि लगते हैं लेकिन वे सामान्य वर्ग के मरीजों के लिए महंगे साबित होते हैं। दूसरा जब आपदा की स्थिति आती है तब निजी अस्पतालों के अपेक्षा सरकारी तंत्र ही ज्यादा काम आता है। लोगों में बीमारियों की रोकथाम बारे में जागरूकता और उन्हें गांव स्तर तक सुविधाएं उपलब्ध कराने में सरकारी तंत्र अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों के कारण हरदम कार्यरत रहता है।

लेकिन निजी क्षेत्र के लुभावने आर्थिक पॅकेज के कारण कई डॉक्टर सरकारी क्षेत्र में अपनी सेवा न देते हुए निजी क्षेत्र में काम करना अधिक पसंद करते हैं। आज इसी कारण स्वास्थ्य सेवा का 65 प्रतिशत हिस्सा निजीकरण के तहत चल रहा है। लेकिन कोरोना आपदा में सामने आया की निजी क्षेत्र की यह व्यवस्था भी खोखली है। सरकार को स्वयं अपने अस्पतालों को मजबूत करना पड़ा। अपनी व्यवस्था के तहत बीमारी की जागृति, बीमार व्यक्तियों को परामर्श, दवाइयां, अस्पताल, जरुरी जीवन रक्षक उपकरण आदि सब सरकारी व्यवस्था में ही उपलब्ध कराने पड़े। इससे यह भी सामने आया कि सरकार अगर कर सकती है तो क्यों नहीं कर रही है? अगर स्वास्थ्य व्यवस्था ठीक हुयी तो कोरोना क्या, कई रोगों से मरीज ठीक हो सकते हैं।

1 COMMENT

  1. ये सरकार आरएसएस द्वारा संचालित है इसलिए आम जनमानस की दर्द को वह समझ नहीं सकती?

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