किसानों के साथ खड़ा हो पूरा देश; वर्ना..

बामसेफ के राष्ट्रीय सचिव सुरेश द्रविड़ जी ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ोर्म फ़ेसबुक द्वारा जनता को नए किसान संशोधन बिल्लों के बारे में जागृत किया है। उन्होंने अपने आर्टिकल में कहा कि किसानों द्वारा चलाए जा रहे आंदोलन को देश के हर वर्ग ने समर्थन करना चाहिए। क्योंकि यह केवल किसानों का ही मुद्दा नही है। उन्होंने आगे लिखा कि सरकार द्वारा बनाए गए क़ानूनों का आम उपभोक्ता को भी बहुत बड़ा नुक़सान हो सकता है।

इन क़ानूनों से मजदूर, छात्र, कर्मचारी और नौजवान भी बड़े पैमाने पर प्रभावित होंगे। इस लेख में उन्होंने कुछ उदाहरण देकर उन्होंने लोगों को समझाने का प्रयास किया है। उन्होंने लिखा कि जिस तरह प्राइवेट स्कूलों के आ जाने से सरकारी स्कूल बर्बाद हुए। उसी तरह निजी मंडियों के आने से सरकारी मंडीयां उपेक्षा की शिकार होगी और धीरे धीरे बंद हो जाएगी। पहले तो निजी मंडिया किसानों को बहुत सुख सुविधाएं देंगी, बहुत सारा लाभ भी देंगी, लेकिन जब सरकारी मंडियां बंद हो जाएंगी, तब बड़े पैमाने पर किसानों को, मजदूरों को निजी मंडी में आने-जाने का भी टैक्स देना पड़ेगा। भले ही आप उस निजी मंडी से कुछ खरीदें या ना खरीदें।

उन्होंने आगे लिखा किसानों से संबंधित और किसानी से संबंधित बहुत सारे विभाग है जो कि धीरे धीरे खत्म हो जाएंगे। जैसे जब सरकारी मंडियों के माध्यम से खरीद नहीं होगी तो फ़ूड कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया( भारतीय खाद्य निगम) बंद हो जाएगा। हरियाणा में स्टेट वेयरहाउस, हैफेड, एग्रो, मार्केट कमेटी, हरियाणा कृषि विपणन एवं मंडी बोर्ड और कृषि से संबंधित कुछ अन्य विभाग भी बंद हो जाएंगे। जब यह विभाग बंद हो जाएंगे तो इनमें नए कर्मचारियों की भर्ती बंद हो जाएगी। नए कर्मचारियों की भर्ती बंद होने का मतलब है इस देश के युवाओं लिए रोजगार के अवसर कम होना। अर्थात नौजवानों के लिए बेरोजगारी बढ़ेगी। इसलिए जो छात्र आज विश्वविद्यालय में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं, उनके लिए सीधे तौर पर रोजगार की कमी होगी।

प्राइवेट कंपनियां 1000-1000 पेज के एग्रीमेंट किसानों से करेंगी, इन एग्रीमेंट पर किसान अपनी मजबूरी वश धड़ाधड़ हस्ताक्षर करेगा, उसे कुछ पता भी नहीं चलेगा और निजी कंपनियां धीरे-धीरे उसकी जमीन को गिरवी कर लेगी, जिस प्रकार हम बैंक में जब लोन लेने जाते हैं तो एक पढ़े-लिखे आदमी की भी समझ में कुछ नहीं आता और वह लोन(ऋण) लेने के चक्कर में धड़ाधड़ बैंक के कागजों पर हस्ताक्षर कर देता है, ठीक उसी प्रकार किसान भी इसका बड़े पैमाने पर शिकार होगा और इस किसान की शिकार होने से मजदूरों पर इसका बहुत बड़ा असर पड़ने वाला है। क्या आप इसको जानते हो ? क्या आप इसको समझते हो?

उन्होंने आगे अपने लेख में लिखा की कुछ मूर्ख किसान आंदोलन का फ़ेसबुक पर विरोध कर रहे है। और ये उस तबके के लोग कर रहे है जो हमेशा किसानों से जुड़े है। उन्होंने आगे समझाते हुए लिखा की गांव में जो औरतें आज गाय पालन, भैंस पालन, भेड़ पालन करती हैं और दूध बेचने का काम करती हैं उन्हें भी बड़े पैमाने पर कठिनाई आने वाली है हम सबके यह सब धंधे चौपट हो जाएंगे।

बड़ी बड़ी निजी कंपनियां फसलों की कटाई पर,बिजाई पर उन मशीनों को इस्तेमाल करेंगी,जहां पर कम से कम मजदूरों की आवश्यकता हो। इस प्रकार किसानों के साथ-साथ मजदूरों का भी बड़े पैमाने पर नुकसान होने वाला है।

कृषि भारत के संविधान के अनुसार राज्य का मुद्दा है लेकिन अभी यह धीरे-धीरे सीधे तौर पर केंद्र के हाथों में सिमट जाएगा और सरकारी मंडियों के माध्यम से खरीद बेच पर जो राज्य को 6 प्रतिशत आमदनी होती थी वह बंद हो जाएगी। इस प्रकार राज्य को भी नुकसान होगा।

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