पिछले पांच सालो में हजारो मूलनिवासी छात्रों ने छोड़ी पढ़ाई।

Casteism

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पिछले कुछ सालो में केंद्रीय शिक्षण संस्थानों जैसे केंद्रीय विश्वविद्यालयों, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान यानी आईआईटी और भारतीय प्रबंधन संस्थान यानी आईआईएम से ड्रॉपआउट होने वाले अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्गो के छात्रों की संख्या उन्नीस हजार से अधिक हैं।

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उच्च शैक्षणिक संस्थानों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्ग के छात्रों को कैसा माहोल मिलता हैं ? यह किसी से छुपी नही हैं।

हम अक्सर देखते है की देश के बड़े बड़े शैक्षणिक संस्थाओं में कई जातिवादी घटनाएं घटती हैं। जिसका शिकार मूलनिवासी समाज के होनहार छात्रों को होना पड़ता हैं।

उन्हें कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता हैं। जिसमे से कई छात्र अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ने पर मजबूर हो जाते हैं। तो कई छात्र मौत को अपनाने में मजबूर हो जाते हैं।

बताते चले की पिछले साल सरकार से पिछले पांच वर्षों में आईआईटी, आईआईएम और अन्य केंद्रीय विश्वविद्यालयों से ड्रॉपआउट करने वाले अनुसूचित जाति,जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के उम्मीदवारों की संख्या का विवरण मांगा गया था।

जिसके जवाब में केंद्रीय शिक्षा राज्यमंत्री ने बताया कि पिछले पांच सालों में छह हजार नौ सौ एक (6,901) ओबीसी (OBC) , तीन हजार पांच सौ छियानवे (3,596) एससी (SC) और तीन हजार नौ सौ उनचास (3,949) एसटी (ST) छात्रों ने केंद्रीय विश्वविद्यालयों से ड्रॉपआउट किया हैं।

वही इस दौरान दो हजार पांच सौ चौवालिस (2,544) ओबीसी (OBC), एक हजार तीन सौ बासठ (1,362) एससी (SC) और पांच सौ अड़तीस (538) एसटी (ST) छात्र आईआईटी में पढ़ाई बीच में ही छोड़कर चले गए।

जबकि इसी अवधि में एक सौ तेतीस (133) ओबीसी (OBC), एक सौ तियालिस (143) एससी (SC) और नब्बे (90) एसटी (ST) छात्रों ने भारतीय प्रबंधन संस्थान यानी आईआईएम से ड्रॉपआउट किया हैं।

बताते चलें कि, दो हजार अठारह से दो हजार तेईस के बीच यानी इन पांच सालो में केंद्रीय विश्वविद्यालयों, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान और भारतीय प्रबंधन संस्थान से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्ग से आने वाले उन्नीस हजार से अधिक छात्रों ने पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी।

जब सरकार से इसका कारण पूछा गया तब सरकार ने इसका कारण छात्रों की निजी कारणों को बताया । लेकिन कई अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्गो के संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने लंबे समय से यह आरोप लगाया हैं की इन समुदायों से आने वाले छात्र इन प्रतिष्ठित संस्थानों में बहुत अधिक दबाव और भेदभाव का सामना करते हैं। जिसके कारण छात्र अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाते हैं और उनमें से कुछ मौत को गले लगा लेते हैं।

रोहित वेमुला, पायल तड़वी जैसे हजारों मूलनिवासी छात्र हैं। जिनकी जान जातिवादी मानसिकता ने ली हैं।

मालूम हो की, पिछले साल आईआईटी बॉम्बे में अठारह वर्षीय दर्शन सोलंकी ने अपने छात्रावास से कूद कर अपनी जान दे दी थी ।

दर्शन के मौत का जिम्मेदार परिजनों ने कैंपस में हुए जातिगत भेदभाव को बताया था। लेकिन जांच टीम ने पहले इन आरोपी को खारिज कर दिया था। लेकिन बाद में एक सुसाइड नोट मिला था, जिससे जांच टीम ने यह स्वीकार किया था की, संस्थान में उसे प्रताड़ित किया जाता रहा।

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