आशा कार्यकर्ता देश भर में उठा रहे है आवाज लेकिन नहीं बना पा रहे दबाव।

आपने आउटसोर्सिंग, संविदा भर्ती, कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम यह शब्द बार बार सुने होंगे। यह शब्द और कुछ नहीं बल्कि निजीकरण के पर्यायी शब्दों के रूप में इसका अर्थ आप समझ सकते हैं। आज कल सरकारों द्वारा कुछ कामों के लिए अस्थायी भर्ती की जाती है। हालांकि इन्हे दिए गए काम कोई अस्थायी नहीं होते बल्कि सालों साल चल रहे होते हैं।

सरकार में बैठने वाले एमपी एमएलए आउटसोर्सिंग, संविदा भर्ती, कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम से इतने खुश रहते हैं क्योंकि इससे काम भी होता है, दूसरा उन्हें कर्मियों की जिम्मेदारी लेने की जरुरत भी नहीं होती। ऐसे में इस प्रकार से अस्थायी कर्मियों को हड़ताल और धरना जैसा रास्ता अपनाना पड़ता है। लेकिन इन छोटे छोटे पदों पर कार्यरत कर्मियों की राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर ताकत नहीं होने से इनका कोई दबाव भी नहीं निर्माण होता और न ही उनकी कोई आवाज उठाता।

इनमें से ही एक है आशा कर्मचारी। सरकारी भाषा में इन्हे अक्रेडिटेड शोशल हेल्थ एक्टिविस्ट अर्थात आशा कहा जाता है। केंद्र सरकार के राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत इनकी भर्ती होती है।

आपको बता दें कि प्रत्येक राज्य में हजारों की संख्या में आशा कर्मी होते है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत इनकी भर्ती आशा कर्मियों की देशभर में दस लाख से अधिक संख्या बताई जा रही है। इन्हे स्वास्थ्य संबंधी जागृति और सर्वे के कई काम करने होते हैं। इन्हे अक्सर इंसेंटिव के नाम पर अत्यंत काम मानधन पर रखा जाता है।

इनके छोटे छोटे संगठन है, इन संगठनों के सहारे यह आशा कर्मी अब पुरे देश भर से जगह जगह आशा कर्मी अपनी मांगो को लेकर आवाज उठा रहे है। देश भर से यह खबरें आ रहे है।

मध्यप्रदेश के जबलपुर के आशा कर्मचारियों ने उन्हें सरकारी कर्मचारी के तौर पर मान्यता देने, वेतनमान बढ़ाने और अनुकम्पा नियुक्ति आदि मांगो को लेकर धरना दिया। इसी प्रकार से पुरे देश भर में जगह जगह आशा कर्मी अपनी आवाज उठा रहे हैं।

मध्यप्रदेश की इन आशा कर्मियों ने कहा कि कील कोरोना सर्वे के तहत गांव में सर्दी खांसी या जुकाम के मरीज का पता कर उसे नजदीकी अस्पताल में उपचार के लिए जाने के लिए प्रेरित करना, साथ ही ऐसे मरीज के बारे में अस्पताल को जानकारी देना यह काम आशा कर्मी कर रही हैं।

आपको बता दें की मध्यप्रदेश में डॉक्टरों ने इसी प्रकार से अपना हड़ताल किया था। जिसके कारण दबाब निर्माण हुआ और उनकी मांगो को लेकर कमिटी बनायी गयी। इसके बाद अब जबपुर में मध्यप्रदेश राज्य की नर्सेस असोसिएशन ने भी रोज दो घंटे काम बंद हड़ताल की घोषणा की है। स्वास्थ्य विभाग के डॉक्टर, नर्स के साथ साथ आशा कर्मचारी भी अपनी मांगों को लेकर सरकार के सामने गुहार लगा रही है। नेशनल हेल्थ मिशन के तहत मध्य प्रदेश में करीब 57000 से ज्यादा आशा कर्मी है।

आपको जानकारी दें कि उत्तरखंड के आशा कर्मियों ने सभी आशाओं को 10 हजार रुपये मासिक कोरोना भत्ता और 10 लाख रुपये का स्वास्थ्य बीमा देने की मांग की है। उधर जम्मू कश्मीर के डोडा ज़िले में आशा कार्यकर्ताओं ने अपनी मांगो को लेकर धरना दिया। बिहार के नवादा, मुंगेर, कटिहार, पूर्वी चंपारण, सीवान, पटना समेत कई जिलों के आशा कार्यकर्ताओं ने पीएम और सीएम को खत लिखा है। बिहार की आशा कर्मियों ने मांग की है कि उन्हें 10 हजार का मासिक भत्ता, 10 लाख का स्वास्थ्य बिमा और 50 लाख का जीवन बीमा दिया जाएं। महाराष्ट्र के 72000 से अधिक आशा कर्मियों ने अपनी मांगो को लेकर हड़ताल की नोटिस दी है। उधर तेलंगाना के आशा कर्मियों ने भी अपनी मांगो को लेकर सरकार को अर्जी की है।

कई राज्यों की आशा कर्मियों ने कहा कि उनकी साथियों की कोरोना काल में सेवा में उन्हें कोविड संक्रमण हुआ और अनेकों की इससे मृत्यु हुयी है और उनके परिवार को मुआवजा मिलना चाहिए।

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