अमेरिका के न्यूजर्सी में एक ब्राह्मणवादी संस्था पर मंदिर बनाने के लिए भारत से मजदूरों को अवैध रूप से ले जाने और कम वेतन देने के आरोप में मुकदमा दायर हुआ है। इस संस्था पर न्यूजर्सी में एक विशाल मंदिर के निर्माण के दौरान मानव तस्करी करने और न्यूनतम मजदूरी कानून का उल्लंघन करने का आरोप लगा है।
फॉरवर्ड प्रेस पत्रिका के अनुसार – अख़बार ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि एफबीआई, होमलैंड सिक्योरिटी और डिपार्टमेंट ऑफ़ लॉ के अधिकारियों की एक संयुक्त टीम ने मंगलवार की सुबह मंदिर पर छापा मारा। यह छापा मंदिर का निर्माण कर रही समिति द्वारा श्रम और आव्रजन कानूनों के उल्लंघन की सूचनाओं के आधार पर मारा गया था। अधिकारियों ने करीब 90 मजदूरों को आजाद करवाया और मंदिर के निर्माण के काम पर रोक लगा दी गई है।
इस मंदिर को संस्था अमेरिका का सबसे बड़ा और सबसे भव्य मंदिर बनाना चाहती है। जिसके के लिए भारत से श्रमिक मंगाए गए। इन्हें रिलीजियस वीसा (आर-1) के आधार पर अमेरिका लाया गया। अमेरिकी सरकार को यह बताया गया कि ये लोग लोग कुशल कारीगर हैं और स्वयंसेवक के रूप में मंदिर निर्माण में सहयोग करना चाहते हैं।
बता दें कि, यह श्रमिक मूलनिवासी बहुजन है, जिनमे अनुसूचित जाति- अनुसूचित जनजाति अधिकतर हैं। जाहिर सी बात है, इनमें से अधिकतर श्रमिकों को अंग्रेजी नहीं आती। इन मजदूरों को अमेरिका ले जाने के लिए उनसे अंग्रेजी में लिखे कई कागजों पर हस्ताक्षर करवाए गए।
द न्यूयॉर्क टाइम्स’ में छपी खबर में बताया गया कि मंगलवार को दर्ज कराई गई शिकायत में छह लोगों के नाम का जिक्र है, जो धार्मिक ‘आर-1 वीजा’ पर 2018 से अमेरिका में लाने शुरू किए गए , इसमें 200 से अधिक भारतीय नागरिक शामिल हैं।
खबर में बताया गया कि इन लोगों से ‘न्यूजर्सी निर्माण स्थल पर अकसर खतरनाक परिस्थितियों में कई घंटे’ काम कराया जाता था। इस दौरान बड़े पत्थरों को उठाना, क्रेन और अन्य भारी मशीनरी का संचालन करना, सड़कों और सीवरों का निर्माण करना, खाई खोदना और जमी बर्फ हटाने जैसे काम दिए जाते थे। इसके लिए उन्हें 450 डॉलर प्रति माह दिया जाता था। शिकायत में कहा गया है कि उन्हें सिर्फ 50 डॉलर का नकद भुगतान किया जाता था और रकम भारत में उनके खातों में जमा करायी जाती थी।
शिकायत में ‘बंधुआ मजदूरी, बंधुआ मजदूरी के लिए तस्करी, श्रमिकों के दस्तावेज अपने पास रखने, षड्यंत्र रचने और विदेशी श्रम अनुबंध में धोखाधड़ी करने के इरादे से आव्रजन दस्तावेजों को जब्त करने’ तथा न्यूनतम वेतन का भुगतान नहीं करने का आरोप लगाया गया है।
मालूम हो की इसी संस्था ने गुजरात और दिल्ली में विशाल मंदिरों का निर्माण कराया है। बताया जाता है कि इस संस्था का भारत के सत्तारूढ़ दल से घनिष्ठ संबंध है। इसी संस्था ने विदेश के ऑकलैंड, अटलांटा, शिकागो, ह्यूस्टन, लंदन, लॉस एंजेलिस, नैरोबी, सिडनी और टोरंटो में भी मंदिरों का निर्माण करवाया है।
ऐसा अनुमान है कि संस्था वर्षों से सैकड़ों मजदूरों का शोषण कर रही थी, क्योंकि मंदिर का उद्घाटन 2014 में हो चुका है, परंतु निर्माण का काम अब भी जारी है। इस संस्था ने दुनिया भर में मंदिरों का निर्माण किया है और संभवत: वर्षों की निर्माण परियोजना के दौरान सैकड़ों निम्न-जाति के पुरुषों का शोषण किया जा चुका है ।
आपको बता दें कि भारत में भी बंधुआ मजदूरी प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम है। जिसके अनुसार बंधुआ मजदूरी करवाना संज्ञेय दंडनीय अपराध है। लेकिन फिर भी देश में विभिन्न रूप से बंधुआ मजदूरी होते हुए दिखाई देती है। 85 प्रतिशत मूलनिवासी बहुजन समाज के लोगों में जो गरीब और कम पढ़ेलिखे हैं ऐसे लोगों का सस्ता मजदूर के रूप में हमेशा इस्तेमाल होता है और उन्हें आसानी से फसाया भी जाता है। यह लोग अपनी गरीबी और असहायता के कारण परिस्थिति को शरण जाते हैं।
आपको बता दें कि लेबर कॉन्ट्रैक्ट के जरिये पूंजीपति लोग कंपनियां बनाकर मूलनिवासी बहुजन समाज का सस्ते मजदूरों के रूप में इस्तेमाल करते हैं। यह भी पाया गया है कि उन्हें विदेश ले जाते वक्त भारतीय न्यूनतम मजदूरी के आधार पर बात होती है। लेकिन विदेश में अलग अलग देशों के न्यूनतम मजदूरी के अलग अलग मानक है। इसी के चलते अमेरिका में यह कार्रवाई हुयी। देश में चल रही छुपी बंधुआ मजदूरी के खिलाफ क्या भारत में भी इस प्रकार से कार्रवाई होगी? यह सवाल मन में उठ सकता है।








