बीजेपी नेतृत्ववाली केंद्र सरकार ने अपने 102 वे संविधान संशोधन के द्वारा किये गए निर्णय को आज 10 अगस्त को 127 वें संशोधन विधेयक के जरिये बदल दिया। आपको बता दें वर्ष 2019 के केंद्र सरकार के 102 वें संविधान संशोधन विधेयक के तहत राज्यों का पिछड़े वर्ग (ओबीसी) की अपनी सूची में जातियों को शामिल करने या हटाने का अधिकार समाप्त हो गया था। बताया जा रहा है कि अभ संविधान संशोधन 127 के तहत यह अधिकार राज्य को पुनः मिल गया है। अर्थात राज्य अपनी पिछड़े वर्ग (ओबीसी) जातियों की सूची सकते हैं।
सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री डॉ. वीरेन्द्र कुमार ने इस विधेयक को सदन में चर्चा के लिए पेश करते हुए जो कहा उससे स्पष्ट होता है कि ओबीसी जातियों की सूची राज्यों की सामाजिक आवश्यकता के अनुसार तय करने का अधिकार मिल जायेगा। इससे राज्यों एवं केन्द्र शासित प्रदेशों की नौकरियों एवं शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश प्रक्रियाओं में स्थानीय सूचियों में वर्णित ओबीसी जातियों को लाभ मिलेगा। आपको बता दें कि इस संशोधन के तहत राज्य ओबीसी आयोग से परामर्श की शर्त को भी समाप्त कर दिया गया है। हालंकि इस संशोधन को लगभग सभी विरोधी दलों ने समर्थन दिया है।
महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण को लेकर उच्चतम न्यायालय के एक निर्णय के बाद राज्य सरकार ने इसके लिए केंद्र सरकार को जिम्मेदार बताया था। अब बताया जा रहा है कि इस विधेयक के जरिए अब महाराष्ट्र में मराठा समुदाय से लेकर हरियाणा और उत्तर प्रदेश के जाट समुदाय को ओबीसी में शामिल करने और उन्हें आरक्षण देने की जिम्मेदारी राज्य के पाले में हैं। एक तरह से केंद्र ने अपनी जिम्मेदारी को पलटते हुए पुनः राज्यों की तरफ यह फांसा फेका है।
आपको बता दें कि राज्यों की ओबीसी की सूचियों में कई ऐसी जातियां शामिल है, जो केंद्रीय ओबीसी सूची में शामिल नहीं है। इसलिए इस बात पर गौर करना जरुरी है कि राज्य की नौकरियों एवं शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश प्रक्रियाओं में इससे आरक्षण मिल सकता है लेकिन अगर केंद्र की सूची में समावेश नहीं है तो केंद्र की सेवाओं और शिक्षा कोटा में आरक्षण नहीं मिल सकता।
आपको यह भी बता दें भले ही केंद्र सरकार ने फांसा राज्यों की तरफ फेका है लेकिन आरक्षण की 50 फीसदी की सीमा को लेकर सवाल अब भी बाकी है। मई 2021 में मराठा आरक्षण पर उच्चतम न्यायालय कहा था कि मराठा आरक्षण से 50 फीसदी सीमा का साफ तौर पर उल्लंघन हो रहा है। 50 फीसदी की सीमा को हटाने का मुद्दा इसलिए भी चर्चा में हैं क्योंकि आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों को दिया गया 10 फीसदी आरक्षण, यह वर्तमान ओबीसी एससी एसटी के आरक्षण से अलग है, और खुले तौर पर आरक्षण की 50 प्रतिशत की सीमा को लांघता है।
आपको बता दें कि मांग यह भी उठायी जा रही है कि केंद्र सरकार और राज्य सरकारें ओबीसी के मान्य पदों का बैकलॉग तुरंत भरें। केंद्र सरकार के अधीन विश्वविद्यालयों में ओबीसी की 47.8 प्रतिशत पद खाली पड़े हैं, भरे नहीं गए हैं। सवाल केवल केंद्रीय विश्वविद्यालयों का नहीं है केंद्र सरकार के अधीन कई विभाग है जिसमें ओबीसी की क्या स्थिति है इसको लेकर बार-बार जानकारी मांगी जा रही है।
इसके अलावा ओबीसी की जाति आधारित जनगणना की मांग बार बार हो रही है। महाराष्ट्र और बिहार राज्यों की विधानसभाओं ने केंद्र सरकार को निवदेन करने के बाद भी बीजेपी नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने जाति आधारित जनगणना को नहीं करने का निर्णय लिया है। हालांकि बीजेपी के नेता राजनाथ सिंह गृहमंत्री रहते वक्त 31 अगस्त 2018 में यह निर्णय लिया गया था कि 2011 में ओबीसी की जाति आधारित जनगणना होगी। बताया जाता है कि तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह, गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू और रजिस्ट्रार जनरल ऑफ़ इण्डिया के अधिकारीयों के बिच हुयी एक उच्चस्तरीय बैठक में यह निर्णय लिया गया था। लेकिन अब केंद्र सरकार अपने निर्णय से पलट गयी है।
आपको यह भी बता दें कि राष्ट्रीय विमुक्त, घुमंतू एवं अर्ध घुमंतू जनजाति आयोग (इदाते कमीशन) ने वर्ष 2018 में लिखित रूप से रिपोर्ट देते हुआ कहा है कि जातिवार जनगणना 2011 के आंकड़े प्रकाशित किए जाएं। साथ ही आगामी 2021 की जनगणना में जातियों विशेषकर विमुक्त एवं घुमंतू समुदायों की जनगणना की जाए।







